राफेल डील में ऑफसेट पार्टनर को लेकर सारा विवाद है तो चलिए समझते है क्या होता है ऑफसेट और राफेल में कौन हैं ऑफसेट पार्टनर
किसी भी रक्षा डील में ग्राहक की घरेलू कंपनी से जो करार होता है वो ऑफसेट पार्टनर कहलाता है।

ऑफसेट व्यवस्था की नीति साल 2005 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने बनाई थी।

ऑफसेट व्यवस्था के तहत रक्षा ओ ई एम (ओरिजनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर) को 2 हजार करोड़ रुपए से ऊपर के तमाम थेंकों की कीमत का 30 से 50 फीसदी के बीच ग्राहक के घरेलू उद्योग से लेना अनिवार्य होता है।

ऑफसेट व्यवस्था का मकसद पूंजी अधिग्रहण का लाभ उठाकर भारतीय रक्षा अनुसंधान और विकास को विकसित करना है साथ ही एयरोस्पेस और आंतरिक सुरक्षा को प्रोत्साहित करना है।

मौजूदा राफेल डील में तीन मुख्य निर्माता कंपनी है, जिसमें दासो प्रमुख है, जबकि थेल्स और सफरां उसकी पार्टनर हैं।

राफेल डील में दो भारतीय कंपनियां प्रमुख रूप से ऑफसेट पार्टनर हैं।जिसमें डीआरडीओ और अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस शामिल हैं।

खास बात ये है कि ऑफसेट नीति निर्माता कंपनी को अपना भारतीय रक्षा पार्टनर चुनने का अधिकार देती है।

हालांकि फ्रांस के राष्ट्रपति मैनक्रो ने भारत यात्रा के दौरान भारत सरकार को 6 पन्नों का दस्तावेज सौंपे जिसमें राफेल सौदे में कुल 72 ऑफसेट पार्टनर का जिक्र था।

यूपीए के कार्यकाल के दौरान 2012 में राफेल को लेकर जो डील चल रही थी, उसने ए च ए अल और मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस ए यरो स्पेस टेक्नोलोजी लिमिटेड में दासो की ऑफसेट पार्टनर थीं।

साभार इंडिया टुडे