सैकड़ों साल से किले में बंद एक बट वृक्ष को निहारते पीएम मोदी । भगवान राम-सीता को प्रणाम करने के बाद कभी बटवृक्ष शाखाओं को देखते हैं तो कभी चहलकदमी करते हैं । अब इस वृक्ष का दर्शन आम श्रद्धालु भी कर सकता है । पीएम मोदी, सीएम योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल ने भी इस वृक्ष का दीदार किया । बार-बार नष्ट किये जाने के बाद भी ये वृक्ष आज भी आपके सामने खड़ा है। इसका वजूद एक अद्भुत चमत्कार से जुड़ा है । कोई इसे मोक्ष वृक्ष कहता है तो कोई अक्षयवट।

कथाओं में जिक्र है कि वन जाते वक्त भगवान राम और मां सीता इसी अक्षयवट के नीचे तीन रात विश्राम किया था । इसी वृक्ष के नीचे से ही अदृश्य सरस्वती नदी भी बहती है। संगम में स्नान के बाद अक्षयवट का दर्शन और यहां राम-सीता की पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती है । लेकिन दुर्भाग्य से कुछ सालों से यहां पर आम लोगों के आने पर पाबंदी थी । दिसंबर में पीएम मोदी ने अक्षय वट के दर्शन करने के बाद ऐलान कर दिया कि अर्द्धकुंभ में आने वाले श्रद्धालु अब त्रेतायुग के इस अक्षयवट का दर्शन कर सकेंगे । पंडित पुरोहितों की माने तो इस वृक्ष का पूजा करने से ब्रह्मा, विष्णु, महेश और लक्ष्मी खूश होती हैं । यही नहीं सालों बाद आपके लिए सरस्वती कूप का दर्शन भी अब आसान हो गया है । पौराणिक कथाओं के मुताबिक संगम में स्नान के बाद जब तक अक्षय वट का दर्शन नहीं होता, तब तक लाभ नहीं मिलता । बताया जाता है कि जब धरती पूरी तरह से जलमग्न हो गई थी तब भी ये अक्षय वट पानी में डूबा नहीं था।

मुगल सम्राट अकबर के किले के अंदर बने पातापुरी मंदिर में स्थित अक्षय वट को इतिहासकार वाटर्स ने ‘आदमखोर वृक्ष’ कहा था। इसके पीछे कहानी ये बताई जाती है कि सैकड़ों साल पहले लोग मोक्ष की प्राप्ति के लिए इस वृक्ष से छलांग लगाकर खुदकुशी कर लेते थे । अलबरूनी, मेहमूद गरदीजी फजलैउल्लाह रशीउद्दीन अब्दुल खैर जैसे इसिहासकार ने इसे अजीब वृक्ष बताया था । लोगों की खुदकुशी की वजह से ही यहां पर आम लोगों के आने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था ।

लेकिन चीनी यात्री व्हेनत्सांग ने इस दिव्य वृक्ष के बारे में कहा था कि- नगर में एक देव मंदिर है जो अपनी सजावट और विलक्षण चमत्कारों के लिए विख्‍यात है.. यहां पर जो अपने प्राण त्याग देते है वो स्वर्ग चला जाता है और शायद इसी वजह से इसे मोक्ष वृक्ष के नाम से भी जाना जाता है । और कई मान्यताएं इस वृक्ष के बारे में है । हालांकि कुंभ के संबंध में ये माना जाता है कि बिना इस वृक्ष के दर्शन कुंभ यात्रा, कुंभ स्नान पूर्ण नहीं होता ।