‘गांधीजी और गांव का अटूट रिश्ता’

‘गांधीजी और गांव का अटूट रिश्ता’

ब्रह्मानंद ठाकुर

देश गांधीजी की चंपारण यात्रा का शताब्दी वर्ष मनाने में जुटा है । 10 अप्रैंल 1917 को चम्पारण जाते समय गांधीजी मुजफ्फरपुर भी आए थे, लिहाजा मुजफ्फरपुर के लिए भी ये शताब्दी वर्ष किसी उत्सव से कम नहीं । हर कोई अपने-अपने तरीके से शताब्दी वर्ष मनाने में जुटा है । लिहाजा गांधी शांति प्रतिष्ठान के 56वें स्टडी सर्किल में एक परिचर्चा का आयोजन किया गया जिसका विषय रखा गया ‘निहत्था पैगम्बर’ । जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात समाजवादी चिंतक और गांधीवादी सच्चिदानंद सिन्हा ने गांधी पर अपने विचार रखे । निहत्था पैगम्बर सच्चिदानंद सिन्हा की गांधीजी पर लिखी अंग्रेजी पुस्तक अनार्म्ड प्रोफेट का हिंदी अनुवाद है । लिहाजा गांधीजी को समझने के लिए सच्चिदानंद सिन्हा से अच्छा विकल्प हम लोगों के पास नहीं हो सकता ।

परिचर्चा के दौरान सच्चिदानंद सिन्हा ने गांधीजी की सोच को हम सबके बीच साझा किया । सच्चिदानंद ने मौजूदा स्वच्छता अभियान को गांधीजी के स्वच्छता सम्बंधी अवधारणा के उलट करार दिया । गांधीजी के स्वच्छता अभियान का अर्थ काफी व्यापक है।जिसका आशय पृथ्वी,  जल, वायु और पूरे पर्यावरण की स्वच्छता के साथ प्रकृति का संरक्षण है लेकिन आज स्वच्छता का मतलब केवल शौचालय निर्माण हो गया है। आज एक समस्या का समाधान करते हुए दूसरी समस्यायें पैदा की जा रही हैं जो गांधीजी के विचारों से एकदम मेल नहीं खाता । सच्चिदानंद सिन्हा ने कहा कि अगर हमें प्रकृति और पर्यावरण को बचाना है तो विकास की वर्तमान अवधारणा को छोड़ गांधीवाद को अपनाना होगा । गांधी का रास्ता ही हमारी अन्य समस्याओं का समाधान कर सकती है। आजतक हथियारों के बल पर  ना तो किसी समस्या का समाधान हुआ है और न आगे होने वाला है। अहिंसक प्रतिशोध ही एक मात्र उपाय है। अत्यधिक मुनाफे की लालच में प्राकृतिक संससाधनों का अविवेक पूर्ण दोहन से जो संकट पैदा हुआ है उसे समझना होगा । गांधी एक जन नेता थे जिन्होंने मूल्यों और परम्पराओं को बदलने का काम किया।

सच्चिदानंद सिन्हा के मुताबिक देश के अधिकांश नेताओं ने गांधी को समझे बिना ही उसे अपने अपने तरीके से परिभाषित किया है जिसका आज दुष्परिणाम देश के सामने है। गांधी ग्राम स्वराज के पक्षधर थे। वे ग्राम गणराज्य की स्थापना चाहते थे। 18 जनवरी 1942 को गांधी जी द्वारा हरिजन पत्रिक में लिखे एक लेख का हवाला दिया जिसमें गांवों की ओर लौटना, विकास नीचे से ऊपर की ओर तथा उत्पादन और वितरण के विकेन्द्रीकरण पर उन्होंने विशेष जोर दिया था। । अपनी पुस्तक अनार्म्ड प्रोफेट की रचना की पृष्ठभूमि की बावत सच्चिदानंद सिन्हा ने कहा कि यह वह दौर था जब सोवियत रूस में क्रांति हो चुकी थी और भारत में आजादी आंदोलन की लहर तेज थी। शस्त्र के बल पर यहां आजादी आंदोलन चलाया जा रहा था। महात्मा गांधी ने ऐसे ही समय में शस्त्र की मुखालफत करते हुए आजादी के लिए अहिंसक आंदोलन का नेतृत्व किया। हथियार हमारी किसी समस्या का स्थाई समाधान नहीं । गांधीजी का गांवों से कितना गहरा नाता रहा ये किसी को बताने की जरूरत नहीं । यही वजह है कि अपनी चंपारण यात्रा के दौरान 17 अप्रैल 1917 को नीलहे साहबों के किसानों पर किए जा रहे अत्याचार के विरूद्ध गांधीजी आंदोलन की शुरूआत की थी ।


brahmanand

ब्रह्मानंद ठाकुर/ बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

 

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