बदलाव प्रतिनिधि

“दिल्ली हर समस्या की जड़ है
दिल्ली हर समस्या पर जड़ है
जड़ कुर्सी पर बैठा हर राजा
जड़ हो जाता है
कुर्सी बचाने के लिये
वो काटने लगता है हर जड़”

टीवी पत्रकार सत्येंद्र श्रीवास्तव की कलम से निकले ये अल्फाज सिस्टम पर सीधे चोट करते हैं, लेकिन जड़ हो चुके सिस्टम को शायद कोई फर्क़ नहीं पड़ता। ये कलम उन पत्रकारों की है, जो दिन भर खबरों में मशगूल रहते हैं, जिनको अपनी कोई खबर नहीं होती। नोएडा ग्लोबल लिटरेरी फेस्टिवल के मंच पर एक साथ वो पत्रकार-कवि जमा हुए, जिनकी कलम खबरों से अलग अपने जज़्बात को खूबसूरती से बयां करती है।

मीडिया में काम करने वाले 14 पत्रकारों के अल्फाज़ों को एक किताब की शक्ल दी गयी जिसका नाम रखा गया “आग भी है और पानी भी”। इस किताब में जाने-माने पत्रकार राणा यशवंत की कविताएं भी मौजूद हैं। आज के सिस्टम पर उनकी 2 लाइन कितनी गंभीर मार करती हैं- उसकी एक मिसाल देखिये-

“जो आदमी बीवी की लाश
कोसों ले गया
वो अपने काँधे पे धरती ढो गया”

किताब में देश के हालात पर कविताएं हैं, तो घर छूटने का दर्द भी। कसक अपने प्यार से बिछुड़ जाने की है तो गांव से निकलकर बड़े शहरों में कबूतरखाने जैसी जिंदगी जीने का दर्द भी। पत्रकार अबयज़ खान की चार लाइन अपने घर से दूर रहने वालों का दर्द साफ़-साफ़ कह देती हैं।

“जिंदगी अब फिक्रों में है
शहर में किस्तों में है
हम बड़े हो गये लेकिन
बचपन अभी बस्तों में है”

सामाजिक सरोकारों से हटकर अबयज़ मुहब्बत की वादियों में भी सैर कराते हैं।

“रंग कितने जिंदगी में भर गये होते
तुम अगर सांसों में बस गये होते”

मंच पर प्यार-मुहब्बत के सिलसिले को पत्रकार पंकज शर्मा ने भी आगे बढ़ाया…  इश्क़ की चाशनी में लिपटी उनकी कलम जब कहती है

“ना जाने क्या समझती है
ना जाने क्या जताती है
कोई रिश्ता नहीं उससे
मगर अपना बताती है”

तो लगता है जैसे अपनी ही कोई अधूरी सी कहानी है। पेशे से पत्रकार और व्यंग्यकार मनु पंवार एक लाइन में सीधे सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोगों को आईना दिखा देते हैं-

“नेताजी ने कहा कार्यकर्ता कानून अपने हाथ में ना लें
कार्यकर्ताओं ने सम्मान रखा और कानून को पैरों तले रौंद दिया”

वहीं पत्रकार और टीवी एंकर पयोधि शर्मा जब ये कहती हैं कि “एक आस पीछे छूट गयी/जो चांद सी आसमां में थी/वो देखो आज रूठ गयी” तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है। इसके साथ ही श्वेता जया पांडेय, प्रभात पांडेय, नविता कुमारी समेत कई और पत्रकार साथियों ने शब्दों का एक रचना संसार रचा है, जो आपको झकझोरता भी है और ये उम्मीद भी जगाता है पत्रकारों की ये कौम पूरी तरह बाज़ार के हाथ बिकी नहीं है, हमारे-आप के एहसास इनमें जिंदा हैं।

राही पब्लिकेशन के सौजन्य से आई ये किताब वाकई पत्रकारों की समझ की आग, और जिंदगी का पानी समेटे है। संदीप मारवाह  और सुशील भारती ने “आग भी है और पानी भी” जैसा संकलन मुमकिन किया है, इसकी तपिश भी आप महसूस करेंगे और तरावट भी।