दिवाकर मुक्तिबोध

छत्तीसगढ़ की 90 विधानसभा सीटों के लिए मतदान का एक दौर निपट चुका है। दूसरा व अन्तिम चरण 20 नवम्बर को है। 11 दिसंबर को मतों की गिनती के साथ ही स्थिति साफ हो जाएगी सरकार किसकी बनेगी। आम तौर पर, बस्तर संभाग के धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में मतदान कराना एक गंभीर समस्या रही है। इसकी मूल वजह नक्सलियों द्वारा चुनाव बहिष्कार की चेतावनी, भय और हिंसा ही नहीं, भौगोलिक परिस्थितियां भी हैं जो वनाच्छादित आदिवासी क्षेत्रों के विकास के सरकारी दावे की पोल खोलती है। दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा, कोंटा आदि विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत कई ऐसे गाँव हैं जहाँ आदिवासियों को मतदान केन्द्र तक पहुँचने के लिए नदी, नाले, पहाडि़यां लांघनी पड़ती है और तो और यही हाल रायपुर संभाग में आने वाले गरियाबंद जिले के कुल्हाड़ीघाट में विशेष जनजाति के दर्जे वाली कमार आदिवासियों का भी है।

राज्य की करीब 32 प्रतिशत जनजाति को विकास की मुख्य धारा में लाने का सरकारी दावा कितना खोखला है यह अनेकानेक उदाहरणों के साथ-साथ इस बात से भी जाना जा सकता है कि बीमार व्यक्ति को चारपाई पर लादकर दुर्गम रास्तों से होते हुए प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में पहुँचना होता है। चिकित्सा के साथ साथ बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा, पेयजल व अपने तथा परिवार के भरणपोषण के लिए भी आदिवासियों को रोजाना जद्दोजहद करनी पड़ती है। ऐसे में चुनाव व सरकार से उनका सरोकार केवल मतदान तक सीमित है। और यदि इसमें नक्सलियों का हस्तक्षेप है तो जाहिर है इसका असर मतदान पर पड़ता है। बीजापुर, कोंटा में आमतौर पर 50 फीसदी से कम मतदान होता रहा है। गहन नक्सली इलाक़ों में अनेक मतदान केन्द्रों में शून्य प्रतिशत वोटिंग का रिकार्ड है। राज्य निर्वाचन आयोग की इस बार कोशिश रही है कि ऐसे केन्द्र मतदाताओं से खाली न रहे। वह इसमें एक सीमा तक कामयाब है। कोंटा के सेंदगुडा केन्द्र पर पहले चरण में 315 वोट पड़े, जबकि पिछले चुनाव में केवल पाँच थे।

चुनाव का बहिष्कार व आदिवासी मतदाताओं को डराने धमकाने की नक्सलियों की कोशिश कोई नई बात नहीं है। प्रत्येक विधानसभा चुनाव के पूर्व अपने प्रभाव वाले इलाकों में इस आशय के पर्चे फेंके जाते हैं व पेड़ों पर चिपकाए जाते हैं। सुरक्षा बलों का हौसला तोड़ने के लिए हिंसा की जाती है जिसमें जवानों के साथ-साथ आम नागरिक भी मारे जाते हैं। गत तीन चुनावों के दौरान नक्सलियों द्वारा की गई हिंसक घटनाओं पर सरसरी नजर डाले तो मुठभेड़ों में एक दर्जन से अधिक जवान और नागरिक मारे गए। कोई भी चुनाव बगैर हिंसा के सम्पन्न नहीं हुआ। इस बार, मतदान पूर्व हिंसा की घटनाएँ कुछ ज्यादा ही हुई हैं। 10 दिनों के भीतर दो बड़ी घटनाओं ने समूचे सिस्टम को हिला दिया है। यह कुछ संयोग सा है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह प्रदेश की जनता को, विशेषकर बस्तर के आदिवासियों को बार-बार भरोसा देते रहे हैं कि उन्हें शीघ्र नक्सली आतंक से मुक्ति मिलेगी लेकिन उनके इस कथित संकल्प पर माओवादी हिंसात्मक चोट करते रहे हैं। चुनावी सीजन है लिहाजा रमन सिंह ने कहा है कि ‘थोड़े दिनों की बात है, हो जाएगा समाधान। विकास भी होगा और शांति भी स्थापित होगी।’ उनके इस विश्वास पर अगले ही दिन प्रहार हुआ। दंतेवाड़ा जिले के अरनापुर के नीलवाया जंगल में नक्सलियों ने सुरक्षा बल की एक टीम को घेरकर गोलीबारी की जिसमें दो जवान व दूरदर्शन के एक कैमरामैन की मौत हो गई। इस घटना के दस दिनों के भीतर ही 8 नवंबर को नक्सलियों ने दंतेवाड़ा के आकाश नगर इलाके में एक बस को बारूदी विस्फोट से उड़ा दिया। इस घटना में एक जवान व चार नागरिक मारे गए। यानी चुनाव पूर्व हिंसा में 8 लोग मारे गए। चुनाव के बाद 14 नवंबर को चुनाव ड्यूटी से लौट रहे बीएसएफ 214 बटालिन के ट्रक को आईईडी विस्फोट से उठा दिया गया जिसमें 6 जवान घायल हो गए वहीं दो जवान की हालत गंभीर है। घटना बीजापुर-भोपालपटनम नेशनल हाइवे कोड़ेपाल के महादेवघाट पर घटित हुई। यह स्थिति चिंताजनक है।
छत्तीसगढ में नक्सल समस्या पर कब तक क़ाबू पाया जा सकेगा, कहना मुश्किल है। चार दशक तो वैसे ही गुजर चुके हैं और इस दरमियान हिंसा बढ़ी ही है जिसमें सुरक्षा बलों के जवानों के साथ साथ बड़ी संख्या में नागरिक, मुख्यत: आदिवासी मारे गए हैं । इनकी मौत के लिए कौन जि़म्मेदार है? सरकार? उसकी पुलिस जिसका सूचना तन्त्र। नक्सलियों का खुफिया तन्त्र पुलिस से जयादा मजबूत है इसीलिए घटनाएँ रोक पाने में वह विफल हैं। हालाँकि यह बात ठीक है कि पुलिस का नक्सल आपरेशन बीते वर्षों की तुलना में अधिक तेज हुआ है। दबाव की वजह से बहुत से नक्सली कमांडर मारे गए हैं और बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया है लेकिन इसका नकारात्मक पहलू यह है कि निर्दोष आदिवासी भी इसकी चपेट में आए हैं। नक्सली होने के शक में, फर्जी मुठभेड़ों में उन्हें मार दिया गया या नक्सली होने का ठप्पा जड़कर जेलों में ठूँस दिया गया। राज्य की जेलों में दर्जनों ऐसे आदिवासी बंद है जो निरपराध माने जाते हैं और जिनका नक्सलियों से कोई संबंध नही है। राज्य सरकार ने इस मामले की पड़ताल के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। उसकी रिपोर्ट का क्या हुआ? कोई खबर नहीं।
दरअसल छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या सरकार की नीयत से जुड़ी हुई है। प्रत्येक बड़ी घटना के बाद सरकार के रटे-रटाये बयान सामने आते हैं। ‘बौखला गए हैं, कायर हैं, लोकतंत्र के विरोधी हैं, हत्यारे हैं। बार बार यह संकल्प दोहराया जाता है कि घटनाओं के लिए जिम्मेदार नक्सलियों को बख्शा नही जाएगा। हम उन्हें घर में घुसकर मारेंगे। निर्दोष आदिवासियों के मारे जाने के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की खामोशी पर सवाल खड़े किए जाते हैं। फिर कभी कहा जाता है कि नक्सलियों से कोई बातचीत नहीं होगी। कभी कहा जाता है कि माओवादी हिंसा छोड़कर चुनाव लड़ें व मुख्य धारा में शामिल हो जाएँ। उन्हें पुचकारने की दृष्टि से कहा जाता है कि वे धरती माता के सपूत हैं अत: मुख्य धारा में उनका बच्चों की तरह स्वागत होगा।’ और भी ऐसी बातें जिनसे ध्वनित होता है कि नक्सल समस्या को सुलझाने में सरकार पर्याप्त गंभीर नहीं है वरना अब तक सुलह की कोई न कोई कोशिश कामयाब हो गई होती। कोई न कोई रास्ता निकल आता। 15 साल से राज कर रहे मुख्यमंत्री रमन सिंह अब यदि अगले चार वर्षों में नक्सल समस्या को खत्म करने का संकल्प दोहरा रहे हैं तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या प्लान है, क्या रणनीति होगी? उनके पास कौन सी ऐसी जादू की छड़ी आ गई है जिसके लहराते ही छत्तीसगढ़ नक्सल मुक्त हो जाएगा? फिर सवाल है, डेढ़ दशक से चल रहे नक्सल आपरेशन का परिणाम क्या निकला ? वह एक तरह से विफल क्यों है ?

इस संदर्भ में स्वर्गीय सुपर कॉप केपी एस गिल की एक इंटरव्यू में कहीं गई बातें सहज स्मरण हो आती है। गिल सन 2006 में छत्तीसगढ़ सरकार के सुरक्षा सलाहकार थे। उन्होंने कहा – ‘बतौर सलाहकार मैं यहाँ एक साल रहा लेकिन तीन चार दिनों के भीतर ही मुख्यमंत्री रमन सिंह ने मुझसे कहा कि आप आराम करें तथा यहाँ अपने प्रवास का आनन्द लें।’ केपीएस गिल की राय थी कि हम हिंसा के एक विशाल दुष्चक्र में फँस चुके हैं क्योंकि आज विकास के नाम पर भ्रष्टाचार हो रहा है। ऐसे में सरकार नक्सलवाद की चुनौती का सामना कैसे करेगी?

इसमें संदेह नहीं कि नक्सली समस्या का राजनीतिकरण हो गया है। अब यह आर्थिक-सामाजिक से कही ज्यादा राजनीतिक है। इसका निदान केन्द्र व नक्सल प्रभावित राज्यों में सत्तारूढ़ सरकारों की राजनीतिक इच्छा-शक्ति पर निर्भर है। यह कहा जाता है कि विकास जितनी तेजी से आगे बढ़ेगा, नक्सलवाद भी उतनी ही तेजी से समाप्त होगा। लिहाजा अगर बस्तर में अभी भी नक्सलवाद जिंदा है और अपने पूरे शबाब पर है, तो जाहिर है वहाँ अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ नहीं पहुँच रहा है। इसका सीधा अर्थ है सरकार के विकास के दावे खोखले हैं। आदिवासी संस्कृति की रक्षा के साथ-साथ सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य व स्थानीय स्तर पर रोजगार की उपलब्धता जो मुख्य: वनोपज पर आधारित हो, एक बेहतर तरीका हो सकता है बशर्ते यह काम ईमानदारी से किया जाए। बंदूक ही नक्सल समस्या के खात्मे का एकमात्र इलाज नहीं है। यह अवश्य है कि फोर्स के दबाव से माओवादियों का बहुत नुकसान हुआ है पर उनका हौसला टूटा नहीं है वरना वे बीजापुर के पामेड में मतदान केन्द्र व मतदाताओं की सुरक्षा के लिए भारी संख्या में तैनात सुरक्षा बलों से मुठभेड़ नहीं करते।

ज्यादा चिंता ‘इस युद्ध’ में मासूम आदिवासियों व सुरक्षा बलों के जवानों के मारे जाने की है। जो नक्सली मारे जा रहे हैं वे भी बस्तर के आदिवासी ही हैं। विकट स्थिति है। सचमुच विकट। जैसा कि मुख्यमंत्री ने कहा है, बहुत जल्दी नक्सल समस्या का समाधान हो जाएगा तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। लेकिन यह मुश्किल दिखता है। बहरहाल अगले महीने की 11 तारीख को स्पष्ट हो जाएगा कि छत्तीसगढ़ में नई सरकार बनेगी या पुरानी ही चलेगी। और नक्सलवाद के संदर्भ में उसकी प्राथमिकताएँ क्या होंगी। गोलियाँ ही चलती रहेंगी या शांति वार्ता भी होगी। आदिवासी बरसों से हिंसा व अत्याचार को झेलते-थक गए हैं और इससे मुक्ति चाहते हैं।


diwakar muktibodhदिवाकर मुक्तिबोध। हिन्दी दैनिक ‘अमन पथ’ के संपादक। पत्रकारिता का लंबा अनुभव। पंडित रविशंकर शुक्ला यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र। संप्रति-रायपुर, छत्तीसगढ़ में निवास।

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