ब्रह्मानंद ठाकुर

जिन लोगों ने श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी पढा है, उन्हें नारद कमीशन भी पढना चाहिए। राग दरबारी जहां स्वातंत्रोत्तर भारत के  तत्कालीन सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक विद्रूपताओं का जीवंत दस्तावेज है , वहीं युवा लेखक सह अध्यापक डाक्टर सुधांशु कुमार का हालिया प्रकाशित व्यंग्य संग्रह नारद कमीशन बिहार की मृतप्राय और बदरंग हो चुकी शिक्षा व्यवस्था की करुण कहानी है। इस संग्रह में एक आदर्श विद्यालय की आत्मकथा, एक आदर्श विद्यालय के शिक्षकों का पत्र नरकाधिराज के पास, पति-पत्नी और रिमोट, शर्तें लागू और नारद कमीशन कुल पांच व्यंग्य हैं। सब के सब वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की विद्रूपताओं को दर्शाने वाले। इसमें कल्पना का पुट नहीं कोरी वास्तविकता से लवरेज आपबीती, जो जगबीती भी है।
 पुस्तक – नारद कमीशन
 लेखक – डाक्टर सुधांशु कुमार
 प्रकाशक – समीक्षा प्रकाशन ,मुजफ्फरपुर
 मूल्य – 200 रूपयै।
संग्रह की शुरुआत में ही लेखक ने यह  स्वीकार किया है कि सब कहता  कागद की लेखी, मैं कहता आंखन की देखी। यही आंखन देखी लेखक का भुक्त यथार्थ है जो इस संग्रह के सभी पांचों व्यंग्य में अभिव्यक्त हुआ है।  लेखक डाक्टर सुधांशु कुमार बीते पन्द्रह सालों से शिक्षा  के पेशे से जुड़े हुए हैं। शुरुआत चन्द्रशील विद्यापीठ से की । फिर तीन सालों तक बीएड कालेज में प्राध्यापक रहे और  वर्तमान में नेतरहाट के तर्ज पर बिहार सरकार द्वारा स्थापित सिमुलतल्ला आवासीय विद्यालय में हिन्दी अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। लिहाजा शिक्षा के क्षेत्र में गिरावट का लगातार जो दौर जारी है , इसके चश्मदीद ही नहीं , भुक्तभोगी भी हैं।
नारद कमीशन सुधांशु कुमार का दूसरा व्यंग्य संग्रह है। इससे पूर्व इनका ‘ढाक के तीन पात ( व्यंग्य संग्रह),  गोपाल सिंह नेपाली के काव्य में  प्रकृति-चित्रण (शोध प्रबंध ) और ‘ रंगों के देश में ‘ कविता संग्रह प्रकाशित हो चुका है। यहां मैं इस संग्रह के ‘नारद कमीशन ‘ शीर्षक व्यंग्य की संक्षिप्त चर्चा कर रहा हूं। हमारे देश में आजादी के बाद से ही घपले-घोटाले, अन्याय, अत्याचार और भ्रष्टाचार पर कथित रूप से अंकुश लगाने के लिए विभिन्न आयोगों के गठन की परम्परा रही है। आयोग के जो अध्यक्ष होते हैं,  प्राय: उन्हीं के नाम पर आयोग का नामकरण भी होता है। कम से कम अब तक गठित विभिन्न आयोगों के इतिहास से तो यही साबित होता है।
यमपुरी में देशी- विदेशी दर्जनों शिक्षाविद अनशन पर बैठे हैं। इसके सूत्रधार हैं प्रोटैगोरस, जार्जियस, हिरैक्लिटस, सुकरात , प्लेटो, अरस्तु एनैक्सोगोरस, विवेकानन्द , गांधी, अरविन्द, राधाकृष्णन, टैगोर गिजु भाई आदि। यमराज यह देख कर सन्न रह जाते हैं कि आखिर उनके राज में यह आन्दोलन क्यों ? यहां तो इसका कोई कारण नहीं है। यमराज इन आंदोलनकारियों के प्रतिनिधिमंडल से बात करते हैं। उनकी समस्या जानकर दंग रह जाते हैं। आंदोलनकारियों की मांग है कि उन्हें भारत – भू-खंड पर तुरंत  ‘ इमर्जेन्सी लैन्डिंग ‘ करवायी जाए क्योंकि वहां के तथाकथित शिक्षाविदों, शिक्षण संस्थाओं, प्राचार्यों , शिक्षकों एवं सरकारों द्वारा शिक्षा का श्राद्धकर्म समारोह अनवरत चल रहा है। उस श्राद्धकर्म के हवन कुंड में महान शिक्षाविदों के विचारों, सिद्धांतों ,पाठ योजनाओं और शिक्षण विधियों की आहुति दी जा रही है। लिहाजा इसे रोकने के लिए उन सब को भारत भू-खंड पर तत्काल पहुंचना जरूरी है। आंदोलनकारियों  की इस एकसूत्री मांग पर प्रतिनिधियों के साथ काफी माथापच्ची करने के बाद यमराज और चित्रगुप्त जी महाराज की कोर कमिटी की बैठक  शुरू हुई जिसमें तय हुआ कि तत्काल एक सदस्यीय कमिटी गठित कर उसे भारत-  भूखंड पर भेजा जाए जो वहां जाकर वाभिन्न आदर्श विद्यालयों एवं सामान्य शिक्षण संस्थाओं के गहन निरीक्षणोपरांत अपनी अनुशंसा देगा। इसके बाद आगे निर्णय लिया जाएगा कि शिक्षाविदों  की मांग मानी जाए या नहीं।
अब समस्या यह पैदा हुई कि  यमलोक में कौन ऐसा है जो इस काम को कुशलता से कर सकता है। तभी चित्रगुप्त ने यमराज को नारद मुनि का नाम सुझाया। इस पर तुरंत सहमति बनी और यमराज ने नारद जी को भारत- भूखंड पर जाकर इस काम को अंजाम देने  के लिए आदेशित कर दिया। आदेश की प्रति लेकर नारद ने  भारत- भूखंड की ओर प्रस्थान किया और उन्होंने अपने काम ( निरीक्षण ) की शुरुआत बिहार के ऐतिहासिक विश्वविद्यालय नालंदा से की। पीत वस्त्रधारी  ब्राह्मण भेष में जब नारद जी राजगीर पहुंचे तो  वे वहां के गर्म पानी वाले कुंड में नहाने का लोभ सम्वरण नहीं कर सके। अपना उत्तरीय और वीणा वगैरह उस कुंड के किनारे रख स्नान करने गये। देखा कि वहां भारी भीड़ है। स्नान से निवृत हो जब बाहर निकले तो उनका वस्त्र, झोला , खड़ाऊं समेत वीणा भी गायब। वे भींगे बदन चिंतित मुद्रा में सिर नीचा किए बैठ गये। अब क्या करें ?
इस दशा मे कहां जाएं, यह सोच ही रहे थे कि वहां  एक महिला का पदार्पण हुआ जो पुत्र  रत्न प्राप्ति की खुशी में  वहां बैठे भिखारियों को  रूपये और वस्त्र बांट रही थी। उसने नारद जी को भी भिखारी समझते हुए  151 रूपये नगद और वस्त्र देकर उपकृत किया। तब नारद मुनि की यात्रा आगे के लिए शुरु हुई। इस तरह नारद जी ने सचिवालय , मानवाधिकार आयोग कार्यालय, राज्य सूचना आयोग के दफ्तर, होते हुए बिहार के ड्रीम प्रोजेक्ट एक नामी आवासीय विद्यालय मे डेरा डाला। इस दौरान नारद जी ने अनेक सूक्ष्म रूप धारण किये। वास्तविकता से  र-ब-रू हुए।  शिक्षा के मंदिर में भाई- भतीजावाद ,जातीय समीकरण बैठा कर शिक्षा को नेस्तनाबूद किए जाने की वास्तविकता पहचानी। वर्ग कक्ष में हिन्दी के अध्यापक को छात्रों को बड़े दावे के साथ ‘ राम ने रोटी खाई ‘ वाक्य को कर्म वाच्य के बदले कर्तृवाच्य बताते देखा। ‘ अपादान ‘ को  ‘आपादान ‘ समझाते देखा और जातीयता  के आधार पर छात्रों की खेमेबाजी कराते देखा। इतना ही नहीं,राजसत्ता के संरक्षण मे पल रहे संस्था के प्राचार्य को ‘ विवेकाधिकार ‘ की आड़  में छात्र और शिक्षकों के हितों एवं मान- सम्मान से खिलवाड करते भी देखा।
कहानी लम्बी है। महीनों चलने वाले किसी  यज्ञ की तरह शिक्षा का श्राद्ध कर्म जारी है। नारद जी की रिपोर्ट तैयार हो चुकी है। मगर  वे कन्फ्युज हो रहे हैं कि वे इस रिपोर्ट का क्या नाम दें , वुड डिस्पैच –2 , या राधाकृष्णन आयोग –2, या कोठारी कमीशन -2 या 1986 की  नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति तर्ज पर बिहार राज्य शिक्षा -श्राद्ध कर्म समारोह ?  अंतिम नाम ही उन्हें जंच गया और 105 पृष्ठों वाली रिपोर्ट तैयार कर , 13 वें दिन वे यमपुरी के लिए प्रस्थान कर गये।
कुल मिलाकर यह पुस्तक पठनीय है। बिहार ही नहीं ,आजादी के बाद पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था में जो अकल्पनीय गिरावट आई है, उसका जीवंत दस्तावेज है ‘ नारद कमीशन।

ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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