ऐसे बहुत कम ननिहाल होते हैं , जहाँ ना माँ होती है। ना मामा और ना नानी होती है लेकिन मैंने आज ऐसा ही एक ननिहाल तक़रीबन 33 साल बाद देखा, मेरा अपना ननिहाल ! मुनस्यारी से दिल्ली लौटते हुए जब बिर्थी के पास था तो सड़क किनारे लिखा हुआ था : थल 35 किलोमीटर .. सहज ही सबकुछ आँखों के सामने गुज़र गया कि थल के पास लेजम में तो मेरा ननिहाल है। मुझे लगा कि आज तो 33 साल बाद ननिहाल जा कर माँ और नानी से मिलना बनता है। ननिहाल .. जो सबसे अनूठा था .. जिसमें सिर्फ और सिर्फ दो प्राणी रहते थे ।
मेरी नानी और मेरी माँ की नानी ..जिनसे मिलने के लिए हमें बचपन में पहाड़ों पर 8 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था और पैदल चलने के बाद जिस ननिहाल में हम पहुँचते थे वो पूरा ननिहाल 8*8 के किसी भी कमरे से बड़ा नहीं था और इसी कमरे में मेरी नानी की रसोई भी थी ( जो हमेशा धुएँ से भरी रहती थी ) और ‘बेडरूम ‘ भी और इसी कमरे में हम तीन भाई बहन और मम्मी पापा रहने आते थे, गर्मियो की छुट्टियों में 10-15 दिन के लिए .. ।
जब छोटे थे , तब हम ख़ासतौर पर मैं तो बहुत चूँ चूँ करता था ..कि ये क्या ननिहाल जहाँ सिर्फ दो लोग रहते हैं और रहने सोने की भी जगह नहीं .. लेकिन फिर भी मैं चला जाता था क्योंकि वहाँ दो बहुत बड़े आकर्षण थे : बिल्लियाँ और पाँच छह बकरियाँ । नानी जो थी , वो बिल्ली के बच्चों को मेरी गोद में डाल देती थी और मेरी माँ की नानी जो थी , वो बकरियों को चराने के लिए जब जाती थीं तो मुझे अपने साथ ले जाती भी थी और उन से खेलने भी देती थी ..पूरा दिन बकरियों और बिल्लियों के साथ ही गुज़र जाता था।

पत्रकार और फ़िल्म डायरेक्टर विनोद कापड़ी। 33 साल बाद नानी के घर।

ऐसे ननिहाल आज मुझे 33 साल बाद जाना था, देखने के लिए कि वहाँ अब क्या क्या है ? तय हो गया कि पहले थल और फिर लेजम जाऊँगा .. सिर्फ दो प्राणी वाले ननिहाल में, ये अजीब संयोग था । दो प्राणी इसलिए क्योंकि मेरी माँ की नानी की एक ही बेटी हुई ( यानि मेरी नानी ) और उसके बाद मेरी माँ के नाना की मृत्यु हो गई और मेरी माँ की नानी अकेली रह गई । यही मेरी नानी के साथ भी हुआ .. मेरी माँ के जन्म के कुछ साल बाद मेरे नाना की भी मृत्यु हो गई और मेरी नानी भी अकेली रह गई। दो अकेली महिलायें किस से मदद लेती ? तो मेरी नानी ने मेरी मां की नानी यानी अपनी माँ को अपने पास बुला लिया और इसी वजह से मुझे मिला सफ़ेद साड़ी में लिपटी दो महिलाओं का ननिहाल। बाद में एक एक करके मेरी माँ की नानी और मेरी नानी की मृत्यु हो गई और फिर आख़िरकार मेरी माँ भी चली गई। यही वजह रही कि नानी की मृत्यु के बाद मैं कभी लेजम नहीं जा पाया क्योंकि ना माँ के लिए वहाँ कुछ था और ना हमारे लिए और 2003 में माँ की मृत्यु के बाद तो वो बचे खुचे तार भी हमेशा के लिए टूट गए। अपने जीवन के अंतिम साल में नानी हमारे साथ ही बरेली में रहने लगी थी, इसलिए जहाँ तक मुझे याद है कि इस ननिहाल मैं आख़िरी बार 13-14 साल की उम्र में गया था। 

..लेकिन आज पता नहीं मुझे क्या हुआ ?
लेजम की दूरी जब सिर्फ 10-12 किलोमीटर रह गई थीं सबकुछ आँखों के सामने घूमने लगा और लगा कि आज तो मुझे अपने ननिहाल जाना ही चाहिए, चाहे वहाँ अब कोई हो या ना हो। कम से कम वो घर -मकान, वो पीपल का पेड़ .. वो खूशबू तो वहाँ होगी , जो मैं अपनी माँ और दोनों नानियों में महसूस कर पाता था, वही लेजम जहाँ हमें पैदल पहुँचना होता था .. पता चला कि अब तो सीधे गाँव तक सड़क पहुँच गई है। गाड़ी लेजम के लिए घुमाऊँ कि नहीं .. रास्ता ठीक है या नहीं .. नानी का घर बचा है कि नहीं ? ये सब जानने के लिए लेजम के अपने केवल मामा Kewal Joshi ( कोई भाई ना होने की वजह से माँ इन्हें ही भाई मानती थी और हर साल राखी बाँधती थी ) को गुड़गांव फ़ोन लगाया । मामा जी ने और उत्साहित किया कि तुझे जाना चाहिए और गाड़ी मुड़ गई लेजम की तरफ। बचपन में जिन रास्तों पर रो रो कर चला करते थे , आज उन्ही रास्तों पर 33 साल बाद कार दौड़ रही थी ।
थल से लेजम मैं कार से मुश्किल से 20 मिनट मे पहुँच गया। याद था कि गाँव के अंदर घुसते ही सबसे पहले दायीं तरफ पीपल का पेड़ दिखता है और बायीं तरफ थोड़ा आगे बढ़ते ही पहला घर, 8*8 का मेरा ननिहाल पड़ता है .. वही पीपल का पेड़ जिसके बारे में बचपन में हमें कहा जाता था कि इसमें भूत रहते है . लेकिन आज जब पीपल के पेड़ नज़र पड़ी तो वो बिलकुल वैसा ही खड़ा था और डरा भी नहीं रहा था । गांव की तरफ देखा, पूरा गाँव ख़ाली दिख रहा था। तभी दो क़दम आगे बढ़ा तो नानी का वही पुराना घर दिख गया। ताला लगा था । मैं जानना चाहता था कि क्या मैं बिलकुल सही घर के सामने खड़ा हूँ ? तभी मुझे एक बुज़ुर्ग दिखाई दिए, मैंने उनसे पूछा क्या दुर्गा देवी ( मेरी नानी का नाम ) का घर यही है ? उन्हें कुछ समझ नहीं आया कि इतने साल के बाद कोई क्यों दुर्गा देवी का नाम पूछ रहा है ? मैंने दोबारा पूछा तब भी उन्हें कुछ समझ नहीं आया तब मैंने उन्हें कहा कि मैं उसी दुर्गा देवी के बारे में पूछ रहा हूँ जिनकी बेटी भागुली होती थी। मेरी माँ भागीरथी को उनके गाँव में भागुली कह कर पुकारा जाता था । तब उन्होंने कहा कि “हाँ तुम बिलकुल सही जगह पर खड़े हो ..दुर्गा का घर यही तो हुआ.. “ मन कर रहा था कि ताला तोड़कर अंदर जाऊँ और 8*8 के उस छोटे से ननिहाल में उस गहराई और विशालता को देखूँ जिसने मुझे जीवन में बहुत कुछ सिखाया और 33 साल बाद फिर वहीं ला कर खड़ा कर दिया। फिर मैं पास ही के नानी के उस छोटे से घर पर भी गया .. जो खंडहर हो चुका था। दरअसल ये घर नानी के रहते ही जगह जगह से टूटने लगा था ..बरसात में पानी भी अंदर आने लगा था ।
थल से धूप ख़रीदा था, घर के सामने जला दिया और आँखें बंद कर लीं । कुछ ही पल में आँखें नम होने लगीं .. लगने लगा कि अभी आम्मा आएँगी और चिल्लाएँगी कि तूने बिल्ली को फिर गिरा दिया । बड़ी आम्मा आवाज़ देंगी कि चल .. बकरी चराने नहीं चलता है क्या ? और इजा आएगी और कहेगी कि देखा मैं कहती थी ना .. नानी का घर सबसे अच्छा होता है .. इसीलिए 33 साल बाद आज तू फिर आ गया अपनी दोनों नानी और माँ से मिलने ..उनके एक बंद मकान और एक टूटे मकान के सामने ..। वहां खड़ा खड़ा मैं सोच रहा था कि बंद और टूटे मकान का ऐसा ननिहाल किसी का ना हो … पर सच कहूँ .. मुझे तो उस पाँच दस मिनट में ही ऐसे लगा कि मैंने अपनी दोनों नानी .. माँ .. और सबको जी लिया ।


विनोद कापड़ी/ मीडिया जगत की जानी मानी  हस्ती, स्टार न्यूज़ (एबीपी), इंडिया टीवी जैसे बड़े चैनलों में संपादकीय जिम्मेदारी संभाली। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फिल्मकार, इन दिनों  बॉलीवुड में नए-नए प्रयोग कर रहे हैं। इन सबसे इतर बेहद जिंदादिल इंसान, जिनकी जिंदादिली देख आप हर पल दंग हो सकते हैं।

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