ब्रह्मानंद ठाकुर

अक्खड़पन और खड़ी-खड़ी कहने की परम्परा में बाबा नागार्जुन कबीर के काफी करीब पड़ते हैं। किसी को बुरा लगे या भला, उनको जो सही लगा, बिना किसी लाग- लपेट के  कहते रहे। उनका जन्म ज्येष्ठ पूर्णिमा 30 जून 1911 को दरभंगा जिले के तरौनी गांव में हुआ था।  बाबा नागार्जुन के जीवन के  68 वर्ष रचना कर्म को समर्पित रहे। इस दौरान उन्होंने बाल -साहित्य, उपन्यास, संस्मरण, यात्रा -वृतांत, निबंध कहानी आदि विधाओं मे काफी कुछ लिखा।   मगर , प्रसिद्धि मिली तो जनकवि के रूप में।

बाबा नागार्जुन की जयंती पर विशेष

इमरजेन्सी के समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांंधी पर उन्होंने  जो कविता लिखी,  वह कबीर की परम्परा का जनकवि ही लिख सकता है– ‘इंदु जी ,इंदु जी क्या हुआ आपको ? सत्ता की मस्ती में भूल गई बाप को। बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को। क्या हुआ आपको ? क्या हुआ आपको ? ‘ और फिर दूसरी कविता में उन्होंने लिखा – ‘ पकड़ो, पकड़ो, अपना ही मुंह आप न नोचे। पगलाई है, जाने अगले क्षण क्या सोचे ? इस बाघिन को रखेंगे हम चिड़िया घर में। ऐसा जंतु मिलेगा क्या त्रिभुवन भर में? ‘  इमरजेंसी खत्म हुई। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनी, तब उसके मुखिया मोरारजी भाई  को भी कहां बख्शा था नागार्जुन ने? तब उन्होंने लिखा – ‘ हाय तुम्हारे बिना लगेगा सूना यह संसार जी, गिरवी कौन रखेगा हमको सात समंदर पार जी ? ‘  यही बेलौस कथन बाबा नागार्जुन को जनकवि का दर्जा देता है।
 नागार्जुन का रचना संसार बड़ा ही व्यापक है। उन्होंने समान अधिकार के साथ संस्कृत, मैथिली और हिन्दी भाषा में कविताएं लिखीं हैं। नागार्जुन ने रूस में जारशाही के अंत के बाद लेनिन के नेतृत्व में सोवियत समाजवादी गणतंत्र की स्थापना के बाद वहां नवनिर्माण की प्रक्रियाकी बड़ी सूक्ष्मता से महसूस किया था। विश्व सर्वहारा के महान नेता लेनिन के नेतृत्व में सोवियत संघ में अहर्निश चल रहे नवनिर्माण के कार्यों से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने लेनिन स्त्रोत्रम शीर्षक से संस्कृत में एक कविता लिखी, जिसकी कुछ पंक्तियां यहां द्रष्टव्य हैं –
 “अपि कौशेयनिचिता: स्वर्णवर्णामिता अपि।
रोदन्ति सूक्तयस्तेद्य। दुर्व्याख्या। विषमूर्च्छिता:।।
लेनिन स्त्रोत्रम में कुल 27 श्लोक हैं। अंतिम श्लोक में कवि ने लेनिन को महान कर्मयोगी बताते हुए, पूरी दुनिया में उनके समाजवादी व्यवस्था की स्थापना की कामना  करते हुए लिखा है –
 “विक्षोभाग्नि प्रयोगी कुमति विषजुषां दुष्कृतेर्भुक्तभोगी।
पुण्यश्लोको विशोकों जगति विजयतां लेनिन: कर्मयोगी ।।
इतना नहीं, बाबा नागार्जुन ने संस्कृत भाषा में हिंसा महिमा, चश्माशाही, चिनार- स्मृति, कुमार लीला, डालरा , त्रिलोचन त्रिकम् और गोविन्दाय नमोनम: जैसी अनेक कविताएं लिखीं। मैथिली भाषा में भी नागार्जुन ने काफी लिखा। इस भाषा में वे यात्री नाम से लिखते थे। इस भाषा में लिखी उनकी एक हास्य कविता है – बूढ वर। कविता थोड़ी लम्बी जरूर है मगर  इस हास्य कविता के माध्यम से बाबा ने बेमेल विवाह के दुष्परिणामों और नारी जाति की अंतहीन त्रासदी को मानवीय सम्वेदना के धरातल पर लाते हुए समाज के तथाकथित कर्णधारों को बड़ी चुनौती दी है। कविता में सौराठ सभा  ( जहां विवाह हेतु वर  का चयन कन्या पक्ष वाले करते हैं और इस सभा में बड़ी संख्या में विवाह के इच्छुक वर जुटते रहे हैं ) में  एक ऐसा बूढा वर आता है, जिसकी तीन पत्निया पहले ही मर चुकी हैं। वह चौथी शादी की लालसा से सौराठ सभा में आया है।
” घर रहन्हि वरक कमला कात
करैं छला खेती सांझ- परात
मरि गेलथीन्ह जखन तेसरै बहु
सौख भेल्न्हि बिआहक फेर की कहु
देख ‘  मे सुखैल-पकठैल काठ
रूपये बान्हि बूढ  ऐला सौराठ। “
फिर जो हुआ, वह जानने – समझने के लिए बूढ वर कविता को पढने की जरूरत है। घटक के सहयोग से विवाह का ‘ सौदा ‘ एक हजार में तय हुआ। बूढ वर ने रूपये गिन दिए। नौ सौ लड़की के पिता के हाथ में और एक सौ घटकैती का कमीशन। बूढ वर  ने एक एक्का ठीक किया और चल पड़े  लड़की के पिता के साथ उसके गांव की ओर। विवाह  की रस्म अदायगी हुई। निरीह कन्या को बूढे वर के गले बांध पिता ने कन्यादान का पुण्य तो पा लिया लेकिन उस दुल्हन की पीड़ा देखिए वह क्या कहती है ?
”  जो रे राक्षस, जो रे पुरुषक जाति  !
तोरे मारलि हम सभ मरि रहल छी
किकिया रहल छी, कुहरि रहल छी
मोल लइ छैं हमरा तों टका द’ क’
कनबई छैं बाप भ’ क’ ,काका भ’ क’
जाइ अछि पानी जकां दिन हमर
जीवन भेल केहेन कठिन हमर
ककरा की कहबइ, सुनत के आइ
फाट’ हे धरती, समा हम जाइ।”
बाबा ने यह कविता 1941 में लिखी थी। तबसे आज तक  नारी जाति पुरुष प्रधान समाज द्वारा स्थापित  मान्यताओं, परम्पराओं की जाल में उलझ कर छटपटा रही है। कन्या भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार, यौन सुचिता, लव जेहाद आदि के नाम पर केवल नारी जाति को ही पीड़ित और प्रताड़ित किया जा रहा है। बाजारवाद ने आज  सम्पूर्ण नारी जाति  की अस्मिता को रौंद दिया है। कभी समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के आदर्श पर सामंतवाद की कब्र पर पनपा पूंजीवाद

 ऐतिहासिक कारणों से इस तरह  प्रतिक्रियावादी हो गया है कि उसे अतीत के तमाम उन्नत मूल्यबोध और नैतिकता को कुचलने मे कोई गुरेज नहीं है।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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