लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मुलायम सिंह यादव ने संसद में बड़ा बयान दिया है। कहा कि मैं चाहता हूं नरेंद्र मोदी दोबारा पीएम बनें ।

अपने यहां नाम की बड़ी महिमा है। कई लोगों को नाम सूट कर जाता है। जिनको नाम सूट नहीं करता उनकी दुर्गति पर मार्केट में मुहावरे और लोकोक्तियां चल पड़े हैं। मसलन आंख के अंधे नाम नैनसुख, नाम बड़े और दर्शन छोटे इत्यादि। ज़रा सोचिये, लक्ष्मी देवी अगर चौराहे पर भीख मांगती फिरे, अमरनाथ जी पचास बरस की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते हार्ट अटैक से मर गए या आनंद बाबू डिप्रेशन का शिकार हो गए और पुरुषोत्तम नाम का बंदा चोरी-चकारी में पकड़ा जाए, तो यह नामों के साथ बड़ी ज्यादती होगी।
इसी तरह की सिचुएशन से बचने के लिए आम तौर पर लोग अपने बच्चे का नाम एकलव्य रखना पसंद नहीं करते। इसमें हमेशा यह खतरा बना रहता है कि कहीं कोई गुरु उससे अंगूठा न मांग ले। दु:शासन नाम भी प्रचलन में नहीं आ पाया। लोग इतिहास से इतना सबक तो सीख ही लेते हैं।
कुछ नामों में बड़ा विरोधाभास दिखता है। मसलन मुलायम सिंह। यह नाम ‘सिंह’ प्रजाति की मूल प्रवृत्ति के ख़िलाफ़ जाता है। सोचिए, ‘सिंह’ अगर मुलायम हो जाए तो जंगल में राजकाज कैसे करेगा? उसकी धौंस, उसकी ठसक, उसकी हनक जाती रहेगी। शायद इसीलिए शेक्सपीयर बरसों पहले कह गए कि नाम में क्या रखा है? शेक्सपीयर की बात माननी पड़ेगी वरना ‘सिंह’ के मुलायम होने पर सवाल उठने लगेंगे।


मनु पंवार, वरिष्ठ पत्रकार, व्यंग्यकार ।

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