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राकेश कायस्थ

हर फिल्मी कहानी में थोड़ा-बहुत हिस्सा हमारी अपनी जिंदगिंयों का भी होता है। महेंद्र सिंह धोनी की अनकही कहानी देखते हुए यादों के बहुत से पुराने पन्ने खुल गये। छूटा हुआ शहर, सचमुच के कई किरदार और खेल के मैदान पर आकार लेते और दम तोड़ते बहुत से सपने एक साथ याद आ गये।

ms-dhoni-4मेरी कहानी धोनी के बल्ला थामने के करीब दस साल पहले शुरू होती है। बारहवीं की परीक्षा देने के बाद मैं पत्रकार बनने की कोशिशों में जुटा था। एक स्थानीय अख़बार में पार्ट टाइम नौकरी करता था, खेल संवाददाता की। पब्लिक सेक्टर कंपनी मेकॉन उन दिनों रांची के क्रिकेटर्स की कर्मभूमि और क्रिकेट की सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र थी। माना जाता था, जिसे भी मेकॉन टीम में जगह मिल गई वह रांची की टीम से पक्का खेलेगा, उसके बाद बिहार की रणजी टीम और फिर किस्मत ने साथ दिया तो टीम इंडिया भी दूर नहीं।

ये अलग बात है कि टीम इंडिया बहुत दूर थी। रांची तो क्या बिहार से अब तक सिर्फ दो खिलाड़ी भारत के लिए खेले थे, 1948 में शूटे बनर्जी और उसके बाद 1992 में सुब्रतो बनर्जी। लेकिन कहानियां अनगिनत थी, रांची क्रिकेट के बहुत से अनसंग हीरोज़ की, जो आसानी से गावस्कर या कपिलदेव हो सकते थे, लेकिन हो नहीं पाये। यकीनन ऐसे किरदार देश के हर शहर में होते होंगे।

किरदारों से भरे रांची में मेकॉन था और मेकॉन में एक बड़े अधिकारी देवल सहाय भी थे, जिनका एक लंबा सच्चा किरदार धोनी पर बनी फिल्म में है। बिहार की रणजी टीम तक अपने ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ियों को पहुंचाने की जुगाड़ में जुटे सहाय साहब क्रिकेट को अच्छा-खासा वक्त देते थे। जूनियर लेवल के टूर्नामेंट करवाने, कोचिंग कैंप लगवाने से लेकर ग्राउंड तैयार करवाने तक। अब सोचता हूं कि मेरी आंखों के सामने दिन भर मेकॉन ग्राउंड को सीचने वाले धोनी के पिता पान सिंह ही रहे होंगे, जो वहीं पंप ऑपरेटर की नौकरी करते थे।  सहाय नये-नये टैलेंट ढूंढकर लाते और हम जैसे नौसिखिये पत्रकारों के ज़रिये उनकी खूब पब्लिसिटी करवाते। नतीजा ये था कि रांची के अख़बारों में हर हफ्ते ऐसे क्रिकेट सितारों की कहानियां होती जो एक दिन भारत के लिए खेलने वाले थे, लेकिन मेरे रांची में रहते हुए यह सपना महज एक सपना ही रहा।

शहर छूटा, संपर्क भी टूटे। फिर अचानक एक दिन मुझे किसी ने बताया कि रांची का कोई लड़का बिना रणजी खेले सीधे ईस्ट जोन की टीम में आ गया है। मैंने क्रिकेटर सबा करीम से पूछा तो उन्होने जवाब दिया—हां है कोई दोनी। मैंने पूछा आगे खेलेगा। सबा हंसे—यूपी-बिहार वालों को चांस कहां मिलता है। मैंने भी तो डोमेस्टिक क्रिकेट में 60 के एवरेज से रन बनाये थे और मौका तब मिला जब करियर खत्म होने को आया। कुछ ही महीने बाद ख़बर आई कि दोनी जिसका नाम धोनी था, वह इंडिया ए की टीम में आ चुका है। मैंने टेस्ट क्रिकेटर यशपाल शर्मा से चर्चा की। यशपाल शर्मा बिहार और पंजाब के उस मैच में अंपायर थे, जिसकी पूरी कहानी फिल्म में है। धोनी ने मैच में 80 रन बनाये थे और बिहार ने 354, जबाव में युवराज सिंह ने अकेले 357 रन बनाये। यशपाल जी ने उसी अंदाज़ में पूरी कहानी सुनाई जिस अंदाज़ में फिल्म में दिखाई गई और आखिर में बोले, लड़का तो अच्छा है जी, लेकिन कुछ होना-जाना नहीं है। वक्त बीता, सुनी सुनाई कहानियों से निकलकर धोनी जीती-जागती कहानी हो गया। फिर आगे जो हुआ सबको पता है।

ms-dhoni3अगर धोनी नहीं होता, ना तो रांची में इंटरनेशल स्टेडियम होता और ना ही ये शहर टेस्ट सेंटर बन पाता। एक अकेले आदमी की मार्फत किसी शहर की ऐसी ब्रांडिंग नहीं हुई है, जैसी धोनी की वजह से रांची की हुई है। एक सच्ची कहानी नीरज पांडे ने बेहद सीधे-सच्चे ढंग से पर्दे पर उतार दी है, इसलिए कहानी दिलों में भी उतर रही है। खेल के मैदान पर पसीना बहाने वाला हर खिलाड़ी धोनी की कहानी में अपनी कहानी ढूंढ सकता है, लेकिन वह कहानी अंतत: ट्रेजिक ही होगी। रांची में जहां मेकॉन स्टेडियम है, रेलवे कॉलोनी उससे ज्यादा दूर नहीं है। भारत के लिए हॉकी खेल चुके कई गुमनाम खिलाड़ी मिल जाएंगे, जिनसे उनकी कहानी पूछने कोई नहीं आता। यह सच है कि सिर्फ किस्मत से कोई धोनी नहीं बनता, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बिना किस्मत के भी कोई धोनी नहीं बनता।


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राकेश कायस्थ/  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी । दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय । खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ, टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आपने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों स्टार स्पोर्ट्स से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।

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