मृदुला शुक्ला

बच्चों के साथ घटती तमाम घटनाओं में हम आसानी से किसी न किसी को दोष देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। घर, स्कूल, सड़कें, अस्पताल, रेलवे स्टेशन यहां तक कि बाल उद्यान भी क्या बच्चों को ध्यान में रख कर बनाया जाता है। कभी किसी मॉल में छोटी सीढ़ियों वाले एस्कलेटर देखे हैं आपने। बच्चे जिन्हें ज्यादा शौचालय की आवश्यकता होती हैं उनके लिए अलग बाथरूम और ट्रेंड सहायक दिखे कभी आपको ?

नर्सरी से लेकर बारहवीं तक कि शिक्षा के लिए शिक्षकों के लिए ट्रेनिंग स्कूल चलते हैं। क्या कभी किसी का ध्यान इस विषय पर गया कि बच्चों के साथ ज्यादा इंटीमेट सम्पर्क में रहने वाले चपरासी, कंडक्टर इत्यादि को कोई शिक्षा या ट्रेनिंग दी जाती है ? स्कूल सरकारी हो या प्राइवेट, पब्लिक हो या सरस्वती शिशु मन्दिर हों या कि मदरसे , सबके सब बच्चों के विरुद्ध हैं। ये विरोध खुला हुआ मुखर विरोध नहीं है, ये उन्हें निगलेक्ट करता हैं। उन्हें एक ऑब्जेक्ट की तरह से देखा जाता है। बच्चे माता पिता के लिए उनका भविष्य हैं। स्टेस्टस सिम्बल हैं। पंचिंग बैग हैं। पब्लिक स्कूलों के लिए ब्लैंक चेक हैं। सरकारी स्कूलों के लिए ढोर डांगर। समाज सीधे तौर पर उनके लिए कहीं जवाबदेह नही हैं।

कभी वो दिमागी बुखार से मर जाते हैं तो कभी ऑक्सीजन की कमी से। कभी उनको कोई टीचर पागलों की तरह पीटती हैं तो कभी डे केयर की आया। कण्डक्टर या ड्राइवर अथवा करीबी रिश्तेदार द्वारा यौन शोषण तो बहुत आम खबर है। जो हजारों में एक बाहर आती है। कभी माता पिता इसे स्वीकार नहीं करते। कभी बच्चे माता पिता पर अविश्वास के चलते उन्हें बताते नहीं। कुछ बुरा बेहद बुरा घट जाने पर थोड़ी देर के लिए समाज नींद से चौंकता है और फिर दुबारा गहरी नींद में सो जाता है।

बच्चों की चिंता है तो उनके लिए सोचिये। पूरा समाज मिलकर अपने खुद के बच्चे से लेकर आसपास के हर बच्चे का उसकी सीमाएं जानते हुए ख्याल रखे। बच्चों से जुड़े हर व्यक्ति को चाहे वो माता पिता ही क्यों न हो समय-समय पर ट्रेनिंग दी जाए। वो जो बच्चों से ज्यादा नजदीकी सम्पर्क में आते हैं उनका शिक्षित और मानसिक रूप से स्वस्थ होने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। समाज वास्तव में चाइल्ड फ्रेंडली बने।

वे जो बच्चों को मुनाफे का सौदा मानते हैं। ये जो आवाजें सुनाई दे रही हैं चीख पुकार मची है, बहुत कम दिन के लिए है। कल सब अपने अपने काम पर लौट जाएंगे। कल फिर एक बच्ची के साथ उसका रिश्तेदार बलात्कार करेगा। फिर से कोई कंडक्टर किसी बच्चे के साथ दुराचार करेगा। कोई बच्चा माँ से पढ़ते हुए जानवरो की तरह पिटेगा कोई स्कूल वैन के नीचे कुचल कर मारा जाएगा। कल हम फिर से विरोध करेंगे।


mridula shuklaमृदुला शुक्ला। उत्तरप्रदेश, प्रतापगढ़ की मूल निवासी। इन दिनों गाजियाबाद में प्रवास। कवयित्री। आपका कविता संग्रह ‘उम्मीदों के पांव भारी हैं’ प्रकाशित। कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं छपीं और सराही गईं।

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