अपने जन्मदिन पर मृदुला शुक्ला की फेसबुक पोस्ट

मेरा पैदा होना पत्थर पर जमी दूब नहीं था न ही सिल पाथर धोकर पाया होगा मेरी माँ ने मुझे। मेरा पैदा होना माँ की छाती पर रख दिया गया एक पहाड़ था, जिसके बोझ तले जीवन भर दबी रही मेरी माँ। बाबा समझाते” ऐ दुल्हिन सब क सहि सुनि के रहा करा तोहरे तीन ठो बिटिया अहाँ इनके बिआह कैसे होई”। एक कोई माँ की जेठानी थी जो कहा करती थी “त्रिभुवन के हर तिसाला पाला पड़ा था” हम तीनों बहनें तीसरे वर्ष पैदा हुई थीं। मुझसे बड़ी बहन तो आज ही के रोज मुझसे दो वर्ष पहले पैदा हुई थी। बचपन में सुनी इन बातों ने मेरे भीतर आग सेंती बेचैनी पैदा की। मां बार-बार कहती इसे अपने दुख की कथा की तरह। मेरा बचपन इनका अर्थ जाने बिना ही इन्हें समझते बीता।

मेरा पैदा होना उस जमाने में अल्ट्रा साउंड मशीनों का न होना था। माता पिता की उम्मीदों पर पानी फिर जाना था। खुद के पैदा होने पर डॉक्टर से लेकर नर्स, अड़ोसी-पड़ोसी तक की प्रतिक्रियाओं की कल्पना मात्र सिहरन पैदा करती है। मुझे सपने में दिखता है भयावह सन्नाटा। काली अंधेरी रात के साथ प्रसव पीड़ा से मुक्त होने के बाद उससे भी गहरी पीड़ा में चली गयी मेरी माँ। अच्छा है पैदा होने से जन्म के कुछ साल तक की बातें याद नहीं रहतीं, वरना उतनी यादें ही जीवन भर अवसाद में रखने के लिए काफी होतीं।

मेरा जन्म कोई उत्सव नहीं था। तेतरे बेटे की प्रतीक्षा में पैदा हो, परिजनों की उम्मीदों पर तुषारापात की दुर्घटना मात्र था। बचपन में नहीं जानती थी, जन्मदिन कैसे मनाया जाता होगा मेरा जन्मदिन। कभी भी किसी के लिए उत्साह या प्रसन्नता का कारण नहीं रहा। कई बार तो जन्मदिन गुजर गया होगा, हम सब में किसी को याद भी नहीं रहा होगा।

सावन सप्तमी को बुढवा मंगर के रोज पैदा होने के कारण कैलेंडर न जानने वाली माँ को भी मेरा जन्मदिन याद रहता। हनुमान जी को हलवा पूड़ी चढ़ता। लड्डू भी बनते या बाज़ार से आते। इस तरह कढ़ाही महका कर, मन ही जाता जन्मदिन। जबकि तीन बेटियों क बाद पैदा मेरे नोहरे के भाई का जन्मदिन मनाने का रिवाज भी हमारे घर में नहीं था। मैं पैदाइशी थेथर हूँ, जबरन अपने हिस्से की हंसी ख़ुशी सुगंध मिठास छीन ही लेती हूँ।

पहली क्लास में एडमिशन कराने पड़ोस की फिरदौस दीदी और मुझसे चार साल बड़ी दीदी गए थे। पता नहीं उन लोगों की किस गणना में मेरा जन्मदिन पांच सितम्बर आया और इस तरह अंकपत्रों में मैं पांच सितम्बर को पैदा हुई जो अब मेरा ऑफिशियल जन्मदिन है। मेरी काहिली और यहाँ अनियमित होने के कारण मैं नियमित रुप से जन्मदिन की बधाई नही दे पाती। इसलिए संकोचवश अपने जन्म की तारीख को वर्षों तक छुपा कर रखा था। मगर नवनीत पांडे जी जैसे मित्रों की कृपा से यह छुपा भी नहीं रह पाता। मन भर आता है जब मित्रों की ढेरों शुभकामनाओं से यह आभासी दिवार अट जाती है।

सोशल मीडिया जन्मदिन की याद ही नहीं दिलाता वरन मित्र लोग मिलकर इसे एक इवेंट बना देते हैं। बचपन से लेकर बड़े होने तक बधाइयों की जो कमी थी, आप सब मित्र मिलकर पूरा कर देते हैं। शुक्रिया तो क्या कह पाउंगी आप सबको। साथ रहिएगा हमेशा हमेशा।


mridula shuklaमृदुला शुक्ला। उत्तरप्रदेश, प्रतापगढ़ की मूल निवासी। इन दिनों गाजियाबाद में प्रवास। कवयित्री। आपका कविता संग्रह ‘उम्मीदों के पांव भारी हैं’ प्रकाशित। कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं छपीं और सराही गईं।

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