बब्बन सिंह

हमने टीवी चैनलों पर विशेषज्ञों को नई स्वास्थ्य सुरक्षा नीति (मोदीकेयर) पर बड़ी-बड़ी बातें करते सुना. स्वाभाविक रूप से हमें भी लगा कि चुनावी कारणों से सरकार खेती की जगह स्वास्थ्य क्षेत्र को प्राथमिकता दे रही है. पर जब हमने उस विषय में छानबीन की और कुछ लोगों से बातचीत की तो समझ में आया कि सरकार ने तो इस क्षेत्र में भी लोगों को केवल झुनझुना पकड़ा दिया है. कदाचित इसीलिए हमने एक फोरम पर लिखा, भी आधार की तरह यह सरकार अगली सरकार को एक हथियार सौंप रही है.

मेडिकल बीमा योजना का विरोध इसलिए होना चाहिए क्योंकि इसके कारण इलाज बेहद महंगा हो जाता है. यूरोप के अधिकांश देशों और अमेरिका में बड़े पैमाने पर बीमा उद्योग का प्रभाव है इसलिए वहां के बहुतेरे लोग इलाज के लिए भारत जैसे देशों का रूख करते हैं. अगर आपके पास कोई मेडिकल बीमाधारी हो तो उससे वहां होने वाले घपलों का पता करें. मूलतः ये निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों का साझा उपक्रम हो जाता है और चतुर-सुजान लोगों को छोड़ अन्य के लिए यह व्यवस्था अभिशाप है.

हमें आज भी याद है कि 2006 में इसी शहर भोपाल में एक सार्वजनिक अस्पताल में महीने भर से ज्यादा दिनों तक आई सी यू में भर्ती कराकर अपनी मां का इलाज में मात्र 50 हज़ार खर्च किया था जबकि उससे मिलते-जुलते इलाज के लिए एक निजी अस्पताल में हमारे एक परिचित को (मात्र 5-6 दिनों में) 6 लाख से ज्यादा खर्च करना पडा था. अभी दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल के बारे में आपने पढ़ा ही होगा. ये वो अस्पताल हैं जो बीमा कंपनियों या अवैध तरीके से अर्जित धन-कुबेरों के भरोसे चलती हैं.

पटना के एक अस्पताल के बाहर की तस्वीर

हमारा विरोध ऐसे किसी गठबंधन के खिलाफ है. इस बीमा योजना के पूरी तरह लागू होने के बाद हम ऐसी स्थिति से बच नहीं सकते. हमारे विदेशों में बसे कई मित्र इस तरह के किस्से अक्सर सुनाते हैं कि कैसे उन्हें मामूली इलाज के लिए भी वहां 10-15 गुना खर्च करना पड़ता है. बदले में 5 स्टार होटल सुविधा मिल जाती है पर वो सहानभूति और सहिष्णुता नहीं जो अब भी भारत के डॉक्टरों के यहां प्रायः मिल जाती है. असल बाजारवादी व्यवस्था में तो भौतिक सुविधाएं तो बहुत आसानी से मिल सकती है पर जिस मानसिक और सेवा-टहल की मरीजों को जरूरत होती है उसका अभाव होता है. हालांकि हम जानते हैं कि हमारी आलोचना से इस सरकार पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ने वाला फिर भी अपने धर्म से बंधे ऐसा करते हैं. इस तरह की नीति आलोचना हम कांग्रेसी राज में भी करते रहे हैं पर उस समय इसका इस कदर विरोध नहीं होता था जो आज के विषाक्त माहौल में दिखता है.

एक मित्र का आरोप है कि हम विरोधाभासी बातें करते हैं और समस्या का समाधान बताने की जगह कागजी सच्चाई बताते हैं. एक पत्रकार व समीक्षक के रूप में हमारा काम सरकार की कामों की समीक्षा करना है चाहे इसके लिए हमें भी आलोचना का सामना करना पड़े. जहां तक इस मसले के समाधान का मामला है तो हमारा मानना है कि सबसे पहले हमें वर्त्तमान प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों को मजबूत करना चाहिए और वहां चिकित्सक व सहायकों की उपस्थिति सुनिश्चित कर एक ऐसी संस्कृति विकसित करनी चाहिए कि लोग इलाज के लिए वहां जाना शुरू करें. अगर हम इतना भी कर लें तो हम अपने गरीब भाइयों का आधा काम कर लेंगे. जहां तक बड़ी बीमारियों का सवाल है उसके लिए जरूर हमें सेकेंडरी व टरशियरी लेवल पर बेहतर संसाधनों व विशेषज्ञों की जरूरत होगी और उसके लिए सरकार को आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने होंगे. पर हमें लगता है कि इस मसले में लगातार आसान उपाय किए जा रहे हैं और भविष्य के दुष्परिणामों से आंख मूंद फैसले लिये जा रहे हैं.


बब्बन सिंह। वरिष्ठ पत्रकार। दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रकार में वरिष्ठ संपादकीय भूमिकाओं का निर्वहन। मुजफ्फरपुर के निवासी। फिलहाल भोपाल में डेरा। एमएल अकेडमी, लहेरिया सराय से उच्च शिक्षा।

संबंधित समाचार