8 घंटे की नौकरी और पगार महज 42 रुपये

8 घंटे की नौकरी और पगार महज 42 रुपये

ब्रह्मानंद ठाकुर

मुंशी प्रेमचंद की कहानी सद्गति का किरदार घासीराम हो या फिर रामवृक्ष बेनीपुरी के ‘कहीं धूप कहीं छाया’ का ‘बाबू साहेब’ दोनों तत्कालानी सामंतवादी सोच के वाहक थे । ये कहानी उस दौर की थी जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था । हजारों लोगों कुर्बानियों के बाद देश आजाद हुआ और  सामंती व्यवस्था को छोड़ देश लोकतंत्र के उजाले में सांस लेने लगा। समता स्वतंत्रता बंधुत्व के नारे के साथ लोकतंत्र आया तो उसके साथ धीरे-धीरे पूंजीवादी व्यवस्था आ गई देश खुशहाल होने लगा, लेकिन एक बात ऐसी है जो आजादी के 6 दशक बाद भी खत्म नहीं हुई और वो है बेगारी प्रथा ।सद्गति का चमार और कहीं धूप कहीं छाया का मखना आज भी किसी ना किसी रूप में शोषित हो रहे हैं ।फर्क सिर्फ इतना है कि घासीराम और बाबूसाहेब की जगह आज सरकारों और पूंजीपतियों ने ले ली है। हम बात कर रहे हैं सरकार की महति योजना में व्याप्त बेगारी प्रथा की यानी मिड डे मिल की । क्या आपने कभी सोचा है कि देश के प्राथमिक और मिडिल क्लास तक के बच्चों को दोपहर का खाना बनाने वाले रसोइयों को 8 घंटे के काम के एवज में कितना मेहनताना मिलता है । बिहार लाखों स्कूली बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन बना कर परोसने का दायित्व जिन रसोइयों पर है उन्हें प्रतिदिन 8 घंटे की नौकरी के लिए महज 42 रुपये मिलता है । इस हिसाब से इनका हर महीने का मानदेय 1250 रूपये हुआ । ये साल के 12 महीने काम करते हैं और कोई अतिरिक्त छुट्टी भी नहीं मिलती । यानी मनरेगा के कामकारों से भी बहुत कम मेहनताना दिया जाता है । इन रसोईयों की आपबीती बताएं उससे पहले एक नज़र डालते हैं मिड डे मिल योजना के इतिहास पर । इसकी शुरुआत 1960 में मद्रास यानी तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री के कामराज ने की थी ।

कहते हैं कि के कामराज कहीं जा रहे थे तभी उन्होंने कुछ बच्चों को गाय-भैंस चराते देखा। बच्चों को ऐसा करते देख वो रुक गए और एक छोटे बच्चे को बुला कर पूछा कि- बेटा स्कूल पढने क्यों नही जाते हो ? इस पर उस बच्चे ने जवाब देने की बजाय सीएम साहब से ही सवाल दाग दिया । साहब स्कूल जाऊंगा तो क्या आप मुझे भोजन देंगे? फिर क्या था के कामराज को उस मासूम की बात चुभ गई और उन्होने अपने राज्य में बच्चों को स्कूल में भोजन देने की व्यवस्था शुरू कर दी । जो बाद में अलग-अलग रूपों में देश भर में चलाई गई । करीब 21 साल पहले 15 अगस्त 1995 से देश में स्कूली बच्चों को पौष्टिक मोजन की उपलब्धता और नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए प्रति छात्र प्रतिमाह 3 किलोग्राम गेहूं दिए जाने का कार्यक्रम शुरु हुआ । यह 2002 तक चला । इसके बाद 2003—4 में बिहार के चयनित 10 जिलों के 30प्रखंडों के 2532 स्कूलों में पाइलेट प्रोजेक्ट अन्तर्गत पका-पकाया भोजन देने की योजना लागू की गयी । फिर जनवरी 2005 से राज्य के सभी प्राथमिक विद्यालयों में इसे लागू किया गया । फरवरी 2008 से बढ़ाकर मीडिल क्लास तक यानी 8वीं कक्षा तक लागू कर दिया गया ।

अब बात बिहार में मिड डे मिल के हाल की । प्रदेश में सभी 38 जिलों के 70 हजार 238 विद्यालयों मे यह योजना लागू है। जिसमें रसोइयों की कुल संख्या 1 लाख 68 हजार है । इस साल नवम्बर महीने में बिहार में 20 करोड 59लाख 31 हजार 766 स्कूली बच्चों को इस योजना का लाभ मिला । अगर मुजफ्फरपुर जिले के आंकड़ों की बात करें तो यहां 3073 विद्यालयों में 3051 में मिड डे मील योजना पिछले माह चलाई गयी । इस योजना के लिए चावल की आपूर्ति केन्द्र सरकार द्वारा की जाती है। कक्षा  1-5 तक के लिए प्रतिछात्र प्रतिदिन 100 ग्राम और कक्षा 6-8 तक के लिए 150 ग्राम चावल का प्रावधान है । दाल, सब्जी,तेल, जलावन, मसाला जैसे खर्चों के लिए परिवर्तन मूल्य के रूप में राशि स्कूलों को उपलब्ध करायी जाती है । जो मौजूदा वक्त में कक्षा 1 से 5 तक के लिए प्रति छात्र 3 रुपये 75 पैसे और 6 -8 तक के बच्चों के लिए प्रति छात्र 5 रूपये निर्धारित है । प्रति छात्र के हिसाब से स्कूलों को मिलने वाले इस धन में 1  से 5 तक के लिए केन्द्र का हिस्सा 2.50 और राज्य का हिस्सा 0.81 रूपये होता है । जबकि 6 से 8वीं कक्षा तक मिलने वाली राशि में केंद्र का हिस्सा 3.49 रुपये और राज्य का शेयर 1.25 रूपये है। रसोइयों का मानदेय भी केन्द्र और राज्य मिल कर भुगतान करते हैं ।

स्कूलों में तैनात रसोइयां को हर दिन के मैन्यू के हिसाब से चावल, दाल, सब्जी, छोला, राजमा पुलाव, खिचडी, चोखा तमाम पकवान बना कर बच्चों को परोसना होता है। इस पौष्टिक आहार में प्राथमिक कक्षा के बच्चों को 12 ग्राम प्रोटीन, 450 कैलोरी सूक्ष्म पोषक तत्व और विटामिन होता है । जबकि 6 से 8 तक प्रति छात्र 20 ग्राम प्रोटीन और 700 कैलोरी सूक्ष्म पोषक तत्व और विटामिंस उपलब्ध कराने का लक्ष्य रहता है। छात्र-छात्राओं की संख्या के अनुपात में रसोइए को बहाल किया जाता है। विद्यालय में नामांकित 1 से 25 बच्चों पर एक, 26 से 100 बच्चों पर 2 और उससे ऊपर हर 100 बच्चे पर एक रसोइया बढ़ा दिया जाता है जबकि 400 से अधिक बच्चों पर 6 रसोइयां तक रखने का प्रावधान है । किसी स्कूल में बच्चे अगर 500 से ज्यादा हुए तब भी 6 ही रसोइए से काम लिया जाता है ।

अब ये भी जान लीजिए की इन रसोइयों को करना क्या होता है । हर दिन सुबह 8 बजे से 9 बजे के बीच ये विद्यालय पहुंचते हैं । रसोई घर की साफ-सफाई, वर्तन धुला,। चावल की सफाई, सब्जी काटन-धोना, चूल्हा सुलगाना, मसाला कूटना-पीसना करने के बाद दोपहर तक खाना बनाकर तैयार करना होता है । बच्चों के खाना खाने के बाद खानेवाली जगह से लेकर रसोई घर , चूल्हा आदि की सफाई और इसके बाद खुद खाना खाते हैं । ये सब करते-कराते शाम के चार बज जाता है और मजदूरी है कुल जमा 42 रूपये। 2015 तक रसोइयों को प्रतिमाह एक हजार रूपये मानदेय मिलता था, आंदोलन हुआ तो इसमें 250.रूपये की बढ़ोतरी हुई। इसके अलावा काम के दौरान मृत्यु होने पर चार लाख रुपये अनुग्रह राशि देने का प्रावधान भी हुआ लेकिन यह.लाभ भी नही मिल सका है । मुजफ्फरपुर जिले में इस अवधि मे 15 रसोइयों की मृत्यु हो चुकी है । सरकार ने अकुशल श्रमिकों का न्यूनतम मजदूरी 207 रुपये निर्धारित किया है। क्या ये रसोईए इस लाभ के हकदार नहीं हैं।


brahmanand

ब्रह्मानंद ठाकुर/ बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के रहने वाले । पेशे से शिक्षक फिलहाल मई 2012 में सेवानिवृत्व हो चुके हैं, लेकिन पढ़ने-लिखने की ललक आज भी जागृत है । गांव में बदलाव पर गहरी पैठ रखते हैं और युवा पीढ़ी को गांव की विरासत से अवगत कराते रहते हैं।