कहां तक मन को ये अंधेरे छलेंगे, उदासी भरे दिन कभी तो ढलेंगे। 29 मई की रात हरेंद्र भाई ने ये गीत फेसबुक पर साझा किया। इस गीत के बोल गुनगुनाइये और कुछ पलों के लिए उदासी भरे इन लम्हों में मुस्कुराते और आपको हमको गुदगुदाते हरेंद्र भाई की तस्वीरें/यादें जेहन में पसरने दीजिए।

“कोरोना के आने के बाद बाकी सारी बीमारियां छुट्टी पर चली गई हैं, ऐसा हमारे देश में मान लिया गया है!” 31 मई को हरेंद्र नारायण जी ने किसी का लिखा ये पोस्ट साझा किया। इसी दिन वो खुद लिखते हैं- “कोई अस्वस्थ हो, परेशान हो पर उसे लोग न माने, यही है महामारी का लॉकडाउन।” 31 मई को उन्होंने ‘वन लाइनर’ भी दे मारा – “जिस आदमी में लोगों के लिए संवेदना और करुणा न हो, वह इंसान नहीं हो सकता है।” 29 मई को हरेंद्रजी ने लिखा- “जो कष्ट में साथ हैं वही अपने हैं और केवल आभासी।” हरेंद्र भाई ने जो कुछ फेसबुक पर लिखा या साझा किया, उससे उनके मन की दुविधाएं, उधेड़-बुन समझ में आती है। जिंदगी का उनका अंदाज यही रहा। वो जो कुछ कहा करते- उनके संदर्भों से इतर भी गहरे मायने हुआ करते थे।


जिंदगी को तारीख और समय के साथ अपनी यादों में कैद करने वाले हरेंद्र नारायण की याद्दाश्त कुछ ऐसी थी कि वो जस की तस घटनाएं आपके साथ साझा कर दिया करते। यही वजह रही कि दस्तक संवाद-दो में जयंत कुमार सिन्हा ने उनको सुनने की इच्छा जाहिर की। इसी सिलसिले में हरेंद्र नारायण जी से आखिरी बातचीत हफ्ते भर पहले ही हुई। तब पता चला कि वो पिछले कुछ वक्त से अपने स्वास्थ्य को लेकर परेशान रहे हैं। शुगर और ब्लड प्रेशर की वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ा था। उन्होंने कहा कि मैं दस्तक की गतिविधियां देखता रहा हूं- माखनलाल में था तब भी और आज भी। फिर मुझे निजी तौर पर सलाह दी- ‘आपकी रचनात्मकता को पत्रकारिता में ठौर मिल पाना मुमकिन नहीं। कहीं लेक्चररशिप के लिए कोशिश कीजिए ताकि सारी गतिविधियां चलती रहें।’ पत्रकारिता के मौजूदा स्वरूप को लेकर उनकी शिकायतें थीं, और बेजा भी नहीं थीं। उन्होंने 26 मई को विजय बहादुर सर के दस्तक संवाद के न्योते वाली पोस्ट अपने फेसबुक वॉल पर साझा की है।

पिछले कुछ घंटों से हरेंद्र भाई ही जेहन में घूम रहे हैं। हरेंद्र जी ने जब माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में दाखिला लिया तो शुरुआत के कुछ दिनों के लिए वो हमारे फ्लैट में ही रूके थे। कुछ बीसीए के साथी थे, कुछ पत्रकारिता के। सभी के साथ हरेंद्र भाई घंटों बातें किया करते। दुनिया के तमाम मुद्दों और मसलों पर उनके पास संदर्भों की कोई कमी नहीं थी। अध्ययन जबरदस्त था और मानो लंबे अरसे बाद उन्हें बोलने-बतियाने के लिए कुछ लोग मिले थे। वो लगातार बातें करते। देर रात तक बतियाते और सुबह सवेरे जाग जाते। हरेंद्रजी जब कहते कि -‘सूरज उग गया है’, तो हममें से कई साथी करवटें बदल कर थोड़ी मोहलत मांगा करते।

चंद दिनों बाद वो हरि प्रसाद अग्रहरि जी के साथ रहने लगे और ये जोड़ी काफी दिनों तक चली। इन्हीं के साथ बाद में शशि भी एक फ्लैट में आ गया था। कुछ दिनों तक मैं भी हरेंद्रजी और अग्रहरिजी के साथ रहा। माखनलाल के आखिरी महीने- दो महीने। अग्रहरिजी को परेशान करने में हरेंद्रजी को खूब मजा आता। एक बच्चे की तरह वो छेड़ते रहते, उनकी फटकार सुनते रहते, मुंह फुलाकर बैठे रहते… पता नहीं कितने-कितने नखरे किया करते। हरि प्रसाद अग्रहरि ही थे जो हरेंद्र जी के नाज-नखरों को बड़े भाई की तरह सह लिया करते। जहां तक मुझे याद है बरतन धोने के अलावा और किसी काम के लिए वो जल्दी तैयार नहीं होते। झाड़ू लगाने कहो तो एक हाथ इधर और एक हाथ उधर, काम तमाम। बेड पर अखबार की कतरनें पसारे रखते। अग्रहरिजी इसके उलट सबकुछ तरतीब से रखने के आदी।


कई-कई दिनों तक हरेंद्रजी और अग्रहरिजी के बीच ‘अबोला’ हो जाया करता। खाना बनना बंद हो जाता। हरेंद्र जी किसी भी हालत में खाना नहीं बना पाते थे। वो दही चूड़ा खाकर 2-3 दिन काट देते। सत्तू पी-पीकर गुजारा कर लेते। फिर एक दिन हरेंद्रजी और अग्रहरि जी बैठकर रो लिया करते। उस दिन मानो सुलह भी होती और पार्टी भी। अग्रहरिजी के हाथों से बनी रोटियां और सब्जी छककर खाते हरेंद्र भाई। चिढ़ाना फिर भी जारी रहता।

हरेंद्र जी सारी बात कहते और अंत में एक लाइऩ जोड़ देते – “अब कुछ नहीं कहेंगे वरना बाबा नाराज हो जाएंगे।” अग्रहरिजी कहते- “अब बचा ही क्या है, जो बचा है वो भी कह ही डालिए।” हरेंद्रजी कहते- “नहीं मैं कुछ नहीं कहूंगा…” अग्रहरिजी ने काफी वक्त तक अपने वैवाहिक जीवन की बातें हमसे साझा नहीं की थी और इस ‘गोपनीय सूचना’ को लीक करने में हरेंद्रजी को काफी मजा आता। हरेंद्रजी राह चलते कुछ कहकर ताली बजाते और अग्रहरिजी खीझ जाते। गजब का रिश्ता था इन दोनों का। पूरे दिन भाइयों की तरह लड़ते-झगड़ते गुजरता। रात को बेड पर जाने तक ये सिलसिला जारी रहता और खत्म तब होता जब हरेंद्र ये समझ जाते कि उनका ‘आज का कोटा’ खत्म हो चुका है। हरेंद्र फिर चादर से मुंह ढक कर मुस्कुराते रहते काफी देर तक…. वन लाइनर का दौर पता नहीं कब तक चलता…

हरेंद्र भाई मिष्ठान्न प्रेमी थे। मिठाई की दुकान पर चले जाते तो गपागप कई मिठाईयां खाने में परहेज नहीं करते। एक किस्सा उन्होंने बताया था। वो पटना में रहते थे और मां-बाबूजी किसी और शहर में। एक बार वो घर से आ रहे थे मां ने गाजर का हलवा बना कर दिया कि पटना में दोनों भाई मिलकर खा लेना। मन को किसी तरह काबू में कर के वो पटना तक तो गाजर का हलवा ले आए लेकिन उसे खोलने को मचल उठे। डेरा पर आए तो भाई साहब कपड़े धो रहे थे। हरेंद्रजी ने आवाज लगाई। भाई ने कहा ‘मैं कपड़े धुल रहा हूं’। हरेंद्रजी ने कहा- ‘मां ने हलवा भेजा है। आ जाओ खा लेते हैं।’ भाई ने नहाने के बाद खाने की बात कही। हरेंद्र भाई कहां मानने वाले थे। उन्होंने अपना हिसाब लगाया और अपने हिस्से का आधा हलवा खा लिया। फिर भी मन नहीं भरा। आधे का आधा भी खा लिया। भाई फिर भी बाहर नहीं आए। सोचा अब इतना सा बचा कर क्या करेंगे। पूरा हलवा खा लिया और टिफिन धो कर रख दिया। भाई ने जब बाद में पूछा कि ‘हलवा’… तो कह दिया ‘लगता है मां रखना ही भूल गई।’ ये किस्सा हरेंद्र भाई जब भी सुनाते, हम खूब हंसते। तब मोबाइल का जमाना तो था नहीं कि चोरियां इतनी आसानी से पकड़ी जा सके।

23 अक्टूबर 2017 को हरेंद्र भाई ने एक तस्वीर साझा की और लिखा ”आईना मुझ से मेरी पहली-सी सूरत माँगे, मेरे अपने मेरे होने की निशानी माँगे । मै भटकता ही रहा दर्द के वीराने में,वक्त लिखता रहा चेहरे पर हर पल का निशां ।।” इन पंक्तियों को पढ़ते-पढ़ते मन फिर अरेरा की कॉलोनियों में भटकने लगा। सहेजे हुए कपड़े पहन कर, बन ठन कर बाबू की तरह निकला करते कॉलेज के लिए। कंघी से बाल संवारते रहते। आईने में खुद को देखकर निहारते रहते। शर्ट इन कर पहनी हो, कम ही याद पड़ता है। चेहरे की अजब-अजब हरकतें बना कर मस्ती खूब किया करते थे भाई हरेंद्र।

माखनलाल के साथी हरेंद्रजी को ‘इनसाइक्लोपीडिया’ कहा करते। कतरनें संभालने और सहेजने की उनकी आदत भी जबरदस्त थी। देश-दुनिया के तमाम मसलों पर बातें करते हरेंद्रजी को कभी थकान नहीं होती। वो हर अनुभव को बटोरा करते मगर एक दूरी भी बनाए रखा करते। उनका किस से कितना भावनात्मक लगाव है, आप अंदाजा नहीं लगा सकते। केचुए के पत्ते की तरह वो पानी को अपने ऊपर ठहरने नहीं दिया करते।
मैं लौट-लौट कर हरेंद्र भाई के अपने अल्फाजों और अंदाज पर आ रहा हूं ताकि उनको उनके मिजाज के साथ समझ सकूं, आपसे साझा कर सकूं। 24 जून 2017 को हरेंद्र नारायण जी ने फेसबुक पर लिखा- ”मूरत सँवारने में बिगड़ती चली गई , बस्ती बसी नहीं कि उजड़ती चली गई! मुश्किल से हमें चार दिन की ज़िन्दगी मिली, और वो भी अपने पाँव रगड़ती चली गई !”


साथी रंजीत प्रसाद सिंह ने विनय के साथी ग्रुप में हरेंद्र जी की यादें साझा करते हुए कुछ तस्वीर शेयर की है। पटना में पिछले साल विनय तरुण स्मृति समारोह में हरेंद्र भाई मौजूद थे। जब दस्तक के बैनर तले हमने नाटक ‘एक दिन का मेहमान’ की प्रस्तुति पटना में की, तब भी वो मौजूद थे। वो अपनी उपस्थिति हर उस जगह मुमकिन किया करते, जहां दोस्तों की महफिल सजती। वो सीधे तौर पर शरीक भले न हों लेकिन सलाह देने और साथ चलने का मिजाज रखते थे। समस्तीपुर में बाढ़ राहत के लिए जब हम अचानक पहुंच गए थे, तब भी वो हमारे साथ शहर में घूमते। एक दिन दोपहर का भोजन भी हरेंद्र भाई के घर हुआ। परिवार के लोगों की आत्मीयता से मन प्रसन्न हो गया था। बड़ी उम्र तक घर के ‘लाडले’ होने की वजह से उनके मन का बच्चा भी हमेशा जिंदा रहा, चुहलबाजियां करता रहा।

मैंने हरेंद्र भाई की पिछले 8-10 दिनों की फेसबुक वॉल खंगाली। उनके अध्ययन की वही विविधता उनके वॉल पर भी मौजूद है। मजदूरों के पलायन से लेकर भोजपुरी अभिनेत्री की एकरसता पर उनकी कतरनें झांक रही हैं। अमेरिका से लेकर पटना तक कोरोना को लेकर कई रिपोर्ट वहां मौजूद है। पिछले दिनों हुई बातचीत में भी उन्होंने कहा था कि पुरानी आदत उनकी गई नहीं। अब डिजिटल फॉर्मेट में संदर्भ सामग्री रखते जाते हैं। दो चीजें उनके वॉल पर कॉमन नजर आई- एक तो प्रोफाइल इमेज की कतार में कई तस्वीरे ऐसी रहीं, जिनके पीछे पुस्तकों की अलमारी है। सुधीश पचौरी की कई टिप्पणियां उनके वॉल से झांक रही हैं। जहां तक याद है माखनलाल के दिनों में भी सुधीश पचौरी उनके पसंदीदा थे। दरअसल एक व्यंग्यकार हरेंद्रजी में भी बसा था, जो हलके-फुलके अंदाज में गहरी चोट करने की कला जानता था।

हमारे मित्र हरेंद्र यहीं हैं, हम सब के बीच। अफसोस बस इतना कि हम अपने मित्रों को कितना कम वक्त दे पाते हैं, कितना कम समझ पाते हैं। मुकेश मिश्रा ने उन्हें याद करते हुए आज लिखा है –
इक फसाना सुन गए, इक कह गए
मैं जो रोया, मुस्कुरा के रह गए
फिर किसी की याद ने तड़पा दिया
फिर कलेजा थाम कर हम रह गए!

बहुत सारी बातें हैं और बहुत सारी यादें। सब गड्डमड्ड और बेतरतीब। बहरहाल, अभी तो हरेंद्र भाई के लिखे से ही उनका ‘अनकहा’ समझने की कोशिश करते हैं। 25 मई को वो लिखते हैं- ”मनुष्य एकांत खोजते-खोजते एक दिन अकेला पड़ जाता है। ” 24 मई को उन्होंने शेयर किया- ‘सुप्रभात, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’। 23 मई को हरेंद्र भाई ने गजल की एक पंक्ति से मन की बात कही- ‘करोगे याद तो हर बात याद आएगी’।

अपनी कतरनों में एक ‘कतरन’ ये भी संजो लेना साथी।

पशुपति