अनु गुप्ता

melorang-2भारत एक ऐसा देश है जहां हर सौ  कदम पर भाषा बदल जाती है। इस देश को अनेक और विशेष भाषाओं का संग्रहालय बोला जाए तो गलत न होगा। खास बात तो यह है कि सभी भाषाओं की अपनी शैली है। कोई भाषा मीठी है तो किसी की ध्वनि तल्ख। उत्तरी बिहार में बोली जाने वाली मैथिली का अपना ही अलग अंदाज है। इस भाषा की मिठास को आम लोगों तक पहुंचाने और मैथिली भाषा के उत्थान के लिए मेलोरंग नाम का थियेटर समूह अलहदा रोल अदा कर रहा है।  खासतौर पर  इसकी महिला टीम की अदाकारी के सब दीवाने हैं। इस टीम की खासियत है कि यहाँ 10 वीं कक्षा  की छात्रा से लेकर गृहणी भी नाटक में हिस्सा लेती हैं।

prakash-melorang-1मेलोरंग एक थियेटर ग्रुप है, जो मैथिली भाषा में नाटक तैयार करता है। ग्रुप के निर्देशक प्रकाश झा हैं। प्रकाश, मैथिली संगीत और नृत्य का अध्यापन भी करते हैं। मेलोरंग अब तक कई मंचों पर अपने नाटकों की प्रस्तुति दे चुका है। मैथिली नाटक के साथ-साथ मिथिला की विभिन्न लोक परंपराओं जैसे सामा-चकेवा, झिझिया पर नृत्य के जरिए भी मैथिली संस्कृति के प्रसार का प्रयास किया जा रहा है। प्रकाश झा कहते हैं- मिथिला से बाहर अपनी पंरपरांओं और संस्कृति को संवारने के लिए यह थिएटर ग्रुप कम संसाधनों में भी काम कर रहा है। हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें इसलिए मैथिली नाटक और गीत-संगीत को बढ़ावा देने की कोशिश हो रही है। इसके लिए महिलाओं और युवाओं को जोड़ना जरुरी है जो परिवार और समाज में इस पंरपरा को आगे ले जाएंगे।

ग्रुप में सात महिला कलाकार हैं, कुछ दिल्ली से हैं और कुछ दूसरे राज्यों से। खास बात यह है कि इनमें से कुछ लड़कियां मैथिली बोलना जानती नहीं है लेकिन इस  भाषा की मिठास से प्रभावित होकर इसे बोलना पढ़ना सीख रही हैं। इनमें से एक आकांक्षा भी मैथिली सीख रही हैं। वो उत्तर प्रदेश के मेरठ से हिन्दी नाटकों में काम करने आईं थी मगर जब एक बार उन्हें मेलोरंग के मैथिली भाषा के नाटक में काम करने का अवसर मिला तो वे ने कवल इस भाषा की कायल हो गईं बल्कि मेलोरंग की मुरीद हो गईं। आकांक्षा कहती हैं, मुझे ‘मैथिली भाषा बोलने में दिक्कत आती है मगर मुझे यह बहुत पसंद है इसलिए अब मैं इसे सीख रही हूँ।’

melorang-3कई बार नाटक में अलग-अलग प्रयोग किए जाते हैं जो कलाकारों को थोड़ी मुश्किल में डाल देते हैं। बिहार के मधुबनी की रहने वाली पूजा शर्मा दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा हैं। वे अपने ग्रुप की कोरियोग्राफर भी हैं। वे कहती हैं ‘दिल्ली में लड़कियां जिस तरह से बेझिझक अपनी भड़ास निकाल लेती हैं ऐसा करना हम मिथिलांचल की महिलाओं के लिए थोड़ा कठिन होता है। मगर नाटक में हर तरह का किरदार करना होता है। हमे भी गाली देनी पड़ती है। मगर सच मानिए कि मैथिली भाषा की गालियों में भी बहुत मिठास है इसलिए उसे महसूस किया जा सकता है। यदि मैथिली में गाली भी देंगे तो मीठी गोली लगेगी।’

इस भाषा को जानने-समझने वाला वर्ग दिल्ली में छोटा है मगर मेलोरंग की इस महिला टुकड़ी ने अपने मजबूत अभिनय और शानदार विषयों पर नाटक पेश कर मैथिली न जानने वालों को भी अपनी ओर आकर्षित किया है। ‘आप माइन जाओ’ और ‘ललका पाग’ जैसे महिला प्रधान विषयों पर नाटक का मंचन कर मेलोरंग की महिला ब्रिगेड ने फरवरी में होने वाले भारत रंग महोत्सव में मैथिली नाटक को वो स्थान प्राप्त करा दिया जो पहले कोई थियेटर ग्रुप नहीं करवा सका

इस उपलब्धि के लिए महिला कलाकारों को घर से लेकर बाहर तक संघर्ष करना पड़ा है। इनके संघर्ष की कहानी अपने घर से शुरू होती है। नीरा आंगनबाड़ी में काम करती हैं। एक्टिंग उनका शौक है जो मेलोरंग में आकर पूरा कर लेती हैं। नीरा बताती हैं, ‘पति तो बहुत सपोर्ट करते हैं मगर रिश्तेदार मज़ाक बनाते हैं। यहाँ तक कि मेरे अपने भाई बहन भी कई साल तक मुझसे बात नहीं करते थे क्योंकि उन्हे यह पसंद नहीं था। मगर मैं पीछे नहीं हटी। आज इस मुकाम पर आने के बाद मुझे लगता है कि मै सही रास्ते पर हूं। इसी तरह 10वीं में पढ़ने वाली निशा के दोस्त कहते हैं कि,वे अपना फ्यूचर खराब कर रही हैं और कुछ नहीं। पर निशा को लगता है इससे अभी तो मेरा फ्यूचर बन रहा है।’ दिल्ली के निर्माण बिहार मेट्रो स्टेशन के पास एक गली में बने मेलोरंग के ऑफिस के सामने से कभी गुजरने का मौका मिला तो ध्यान से सुनिएगा मैथिली के कर्णप्रिय गीत आपके कदम जरुर रोक लेंगे। प्रकाश झा और उनकी टीम का संघर्ष एक छोटे से कमरे से देश के अलग-अलग हिस्सों के स्टेज तक जारी है।


अनु गुप्ता का ये आलेख womenia.in से साभार

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