रविकिशोर श्रीवास्तव

राजनीति में दुश्मन कब दोस्त बन जाएं, अपने कब बाग़ी… ये वक्त की ज़रूरत पर निर्भर है। इसकी तदबीर को यूपी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन से आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन अखिलेश और मायावती की मुलाकात क्या महज उपचुनाव और राज्यसभा चुनाव तक सीमित है या इसका दायरा बढ़ेगा, कहना मुश्किल है। हाल फिलहाल में चर्चा ये है कि पुराने शिकवे भुलाकर दोनों पार्टियां मिशन 2019 का खाका तैयार कर रही हैं यानी उत्तर प्रदेश से निकला ये फॉर्मूला राष्ट्रीय पटल पर उतारने की तैयारी है।

गठबंधन की तस्वीर को एकबारगी देखें तो लगता है कि दोनों दलों की मजबूरी है और जरूरत भी। अगर वजूद बचाना है तो दोनों दलों को साथ आना ही नहीं रहना होगा। अखिलेश यादव सोशल इंजीनियरिंग पर ज़ोर दे रहे हैं जबकि मायावती ने अभी पूरी तरह पत्ते नहीं खोले हैं। उन्हें अखिलेश के साथ जाने पर एतराज नहीं लेकिन अखिलेश का कांग्रेस के साथ होना उन्हें अखरेगा। हाल ही में कांग्रेस ने बीएसपी से बाहर किए गए नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी में शामिल किया है। बीएसपी सुप्रीमो कभी नहीं चाहेंगी कि चाहे अनचाहे नसीमुद्दीन इनके ईर्द-गिर्द नज़र आएं।

मायावती के बारे में सियासी गलियारों मेंअक्सर ये चर्चा रहती है कि वो जिस नेता को एक बार बाहर का रास्ता दिखा देती हैं फिर उनसे मिलना-जुलना कतई मंज़ूर नहीं करतीं। ऊपर से नसीमुद्दीन जब निकाले गए थे तो मायावती पर करप्शन के गंभीर आरोप लगाए गए थे। ऐसे में लगता तो यही है कि मायावती किसी भी कीम;त पर कांग्रेस से हाथ नहीं मिलाना चाहेंगी।

कांशीराम के जन्मदिन पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बधाई संदेश पोस्ट किया। ये दांव बीएसपी की तरफ हाथ बढ़ाने को लेकर है लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं कि मायावती का दिल पिघल ही जाएगा। बीएसपी अभी तेल देखो, तेल की धार देखो की भूमिका में है। रही बात अखिलेश से गठबंधन को लेकर तो वो राज्यसभा चुनाव तक सीमित रखना चाहती हैं। ऐसा खुद मायावती का बयान है।

अब बात महागठबंधन की तो मायावती का अपना पुराना वोटबैंक है। 2012 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनाव और फिर 2017 के विधानसभा चुनाव को देखें तो मायावती का दलित वोटबैंक छिटका तो है लेकिन 19 फीसदी के करीब की अच्छी खासी तादाद उनके पास बरकरार है। उपचुनाव के वोट फीसदी को देखें तो गोरखपुर में बीएसपी को करीब 22 फीसदी वोट बैंक था जबकि फूलपुर में करीब 23 फीसदी का वोट बैंक, जिसने अखिलेश यादव के उम्मीदवारों को जीत की दहलीज के पार पहुंचा दिया।

ये तो रही समीकरण की बात, लेकिन जब बात चेहरे की होगी तो अखिलेश और मायावती में शायद ही कोई खुद का चेहरा बैकग्राउंड में रखने को तैयार हो। विरासत में मिली सियासत से चमके अखिलेश अपने दम पर देश की राजनीति में एक मोर्चा चाहेंगे और मायावती तो पहले भी तीसरे मोर्चे का चेहरा रही हैं जब लेफ्ट समेत कई दलों ने पीएम पद के लिए ऑफर किया था। ये महत्वाकांक्षा ही है कि वो यूपीए सरकार में शामिल नहीं हो पाईं और बाहर से समर्थन देतीं रहीं।

देश की दो बड़ी पार्टियों का ईगो कभी भी राहुल गांधी को अपने गठबंधन का नेता नहीं मानेगा। कांग्रेस की सभी दलों से यही अपील है कि मोदी विरोधी खेमे की अगुवाई कांग्रेस करे और राहुल गांधी चेहरा हों लेकिन बात बनती नहीं दिख रही। हां अगर सोनिया गांधी लास्ट टाइम पर कोई मास्टर स्ट्रोक खेल दें तो बात बन सकती है। यही वजह है कि देश में महागठबंधन का विकल्प अभी उतना आसान नहीं दिख रहा। गौर करने वाली बात ये है कि जब 10 जनपथ पर सोनिया गांधी ने डिनर दिया तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी की तरफ से नुमाइंदे भेजे गए थे, न अखिलेश आए न ही मायावती।


रविकिशोर श्रीवास्तव। इलेक्ट्रानिक मीडिया में पिछले 7-8 सालों से सक्रिय। उत्तर प्रदेश के बलरामपुर के निवासी। संप्रति दिल्ली में निवास। सियासी और सामाजिक हलचल पर पैनी नज़र। दुनिया को समझने और खुद को परखने की ललक बरकरार।

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