संजय पकंज

मौसम बदल रहा है। वातावरण में सर्दी उतरने के लिए उसाँसें भर रही है । बहुत धीमी चाल से आता है नया मौसम। सर्दी बड़ी नजाकत से दबे पाँव आती है । धीरे धीरे अपना जलबा दिखाती है। हाड़ कँपा देती है । अंत:पुर के गर्म क्षेत्र में भी प्रवेश कर जाती है । उसके कोप से बचाव के काफी जतन किए जाते हैं। जितने उपाय उतने ही सर्दी के प्रभाव गहरे होते चले जाते हैं। आदमी सर्दी से बचता है। बचाव की चिंता में वह खूब परेशान होता है। जो जितना भागता है सर्दी उसे और खदेड़ती है । पकड़ में आते ही बुरी तरह से जकड़ लेती है । मगर सर्दी की सारी अकड़ ढीली और सर्द करने वाला आदमी भी लाजवाब होता है। ऐसे आदमी से जब सर्दी का पाला पड़ जाता है तो उसे अपनी औकात का पता चल जाता है । तब औंधे मुँह गिरती भागती है सर्दी ।

मौसम बदल रहा है। इधर राजनीति का मौसम धीरे धीरे गरम हो रहा है । प्रकृति में सर्दी तो राजनीति में गर्मी। नेताओं की हुंकारी एक तरफ तो दूसरी तरफ चौक-चौराहे पर जनता की तरफदारी। शुरू है खेल-तमाशा । वैसे अपने देश में इन दिनों राजनीतिक वातावरण ही ज्यादा रहता है । एक असमाप्त बहस होती है राजनीति। इसमें सब रमते हैं मगर जमते वही जो मौसम वैज्ञानिक होते हैं । जो जीता वही सिकंदर । ‘साहब के दरबार में, ऊँचे पेड़ खजूर/चढ़े सो चाखै प्रेमरस, गिरे तो चकनाचूर ।’

भारत शायद अब गरीबों का देश नहीं रहा। अमीरी का बोलबाला ज्यादा है। फिर भी गरीबी की चर्चा पुरजोर बनी रहती है । बहुत सारे शब्द असंवैधानिक हो गए हैं । कुछ शब्द जो कल तक सर्वमान्य थे आज वे प्रतिबंधित हैं।बोलने पर सजा का प्रावधान है । अभद्र और अपमानजनक ढंग से जो बोला जाता है उस पर कानून का कोई अंकुश नहीं है क्योंकि वे शब्द हुक्मरानों के चुनावी गणित में हानिकारक नहीं हैं। चुनावी राजनीति में संविधान की दुहाई देते गैरसंवैधानिक और गैरन्यायिक बातें खूब की जाती है । न्यायसम्मत वही जो सत्ता की कुर्सी तक पहुँचा दे । आँकड़ों और घोषणाओं में चाहे जो हो मगर भारत में आज भी गरीबी, भुखमरी, बीमारी, अशिक्षा, बेरोजगारी, विसंगति, पीड़ा और संघर्ष है। यह और बात है कि भारत में अमीरी भी खूब है । भाग्य और भगवान की कृपा बताते हुए गरीबों की छाती पर नाचती अमीरी लोगों को खूब लुभाती है। जनतंत्र के रास्ते जो सामंतवाद आया है वह ध्वस्त सामंती व्यवस्था से बहुत बहुत ज्यादा खतरनाक, हिंसक, अराजक और शोषक है । गरीबों के पेट पर लात मारती अमीरी गरीबों के मसीहा के बल पर ही तो कुटिल चाल चलती है । सोचने का समय आ गया है कि गरीब कौन? शोषित कौन? और इसके कारण क्या? मगर सोचने देगा कौन और सोचेगा कौन? प्रश्न जटिल है । इसका उत्तर मौसम देता है। सर्दी धता बताने वाले धरती पुत्रों से डरती है तो राजनीति भी पनाह उन्हीं से माँगती है। बड़े बड़े बोल और वादे के मौसम, लुभावने नारों के मौसम, न पूरी होने वाली घोषणाओं के मौसम, गाली-गलौज और तू-तू मैं-मैं के मौसम। चमचों-चाटुकारों के मौसम, शोर-शराबों के मौसम, भीड़ और जुलूस के मौसम। जनता को भटकाने-छलने के मौसम । अजीब होता है यह मौसम। इस मौसम में झूठ की झमाझम सत्य-बरसात होती है । जनता सराबोर हो जमकर नहाती है। भींगे बदन गुनगुनाती गाती है-‘आज मौसम बड़ा बेईमान है।’ लुट-पिट जाने के  बाद जनता को सचमुच बेईमान मौसम का पता चलता है । सम्मोहन के वशीभूत भोली भाली जनता लुटने-पिटने के लिए सदियों से अभिशप्त है। ‘एक पुरुष अर्जन करता है अपने भुजबल से और दूसरा उसे भोगता भाग्य के छल से।’

वसन्त-राग गाती जनता को जब पतझड़-चाटा मिलता है तो मालूम होता है कि वह गलत मौसम के साथ था । राजनीति के मौसम में एक ही समय में कुदरत के सारे मौसम नाचते-गाते धमाल मचाते हैं। कमाल हो जाता है तो जनता अपने गिरेबान में झाँकती है और टटोलती है अपना बटुआ तो पता चलता है कि उसकी गिरह कट गई है।आज की राजनीति सिद्धांत और निष्ठा नहीं है बल्कि एक गिरोह है। इस गिरोह की अपनी आचार-संहिता है। गिरोह का बॉस है, शूटर है, लामकाफ है, सलामी ठोकते चमचे और हुक्म बजाते अर्दली के साथ ही बेजा फरमाया कहने वाली मीडिया है। जनता सम्मोहन में नाचती भीड़ है जो किसी दिन-‘जागो निद्रा तंद्रा के कर बिके हुए बेमोल, सुनकर जाग जाती है और अपने भरोसेमंद नेतृत्व के साथ सुर में सुर मिलाती कदम-ताल भर उठती है। ‘दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो/सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।’

क्या सचमुच देश को बड़ी क्रांति की जरूरत नहीं है? क्यों नहीं बन पा रही है आंदोलन की जमीन? विचार-शून्यता की स्थिति है क्या? अनेक प्रश्न हैं जिनके उत्तर नहीं मिल रहे हैं । सही रास्ता कौन बतालाए? सभी तो भटक रहे हैं । जो सत्य संधानी है वह मौन है । युग का गाँधी अनसुना है। आज कृष्ण और अर्जुन जाने कहाँ हैं? जबकि महाभारत का मैदान सजा है । दुर्योधन और शकुनि सक्रिय हैं। ऐसे में क्या समय प्रतीक्षा करेगा या युद्धक्षेत्र में उतर कर कृष्ण और अर्जुन का आह्वान करता हुआ शत्रुपक्ष को ललकारेगा । सुना है कि इतिहास अपना रास्ता निकाल लेता है मगर कब? इस समय देश में कई ज्वलंत मुद्दे हैं जिस पर चुनौती देने की आवश्यकता है । पूरे देश में स्पंदित उद्वेलन तो है, अफसोस यह कि उसे आंदोलन बनाने वाला ईमानदार नेतृत्व नहीं है। जो आग है भी अगर तो वह अलग अलग कई हिस्सों में बँटी हुई है । समवेत और संयुक्त आग का अभाव है, यही सबसे बड़ा संकट है जो क्रांति की जमीन नहीं बनने दे रहा है। अपनी डफली अपना राग जब तक है तब तक आग कारगर नहीं हो सकती है। शायर दुष्यंत कुमार के इस शेर की आग मेरे तेरे की तलाश, चिंता और प्रेरणा से सर्वथा अलग हो जब तक सबके सीने में नहीं जलेगी तब तक व्यापक और समग्र क्रांति संभव नहीं है। ‘मेरे सीने में नहीं तेरे सीने में सही /हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए /हो गई है पीर पर्वत सी अब पिघलनी चाहिए /इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए ।’

विशाल भारत देश में अलग अलग राजनीति है । जातियों के अलग अलग पैमाने हैं। जन-प्रलोभन के अलग अलग नारे हैं । न्यायपालिका में भी अलग अलग कानून और न्याय हैं। अलग अलग भाषाएँ और बोलियाँ हैं। लड़ाई के अलग अलग मुद्दे हैं । कर्मकांड के अलग अलग धर्म हैं । मंदिर मस्जिद के अलग अलग भगवान और खुदा हैं । सबके अलग अलग पाखंड हैं। अनेकता में एकता का अखंड सांस्कृतिक राग अलापते नेतागण अलगाव की धुन सहेजकर मगन मस्त हैं । ऐसे में भला कैसे और किस एकत्व की चाहना की जा सकती है। जहाँ दिन रात अलगाव का कभी आरक्षण के नाम पर तो कभी अल्पसंख्यक के नाम पर गायन किया जा रहा हो तो वहाँ कैसी समता की महफिल जमेगी। सारे वाद विवादों के घेरे में वितंडावाद भर बनकर रह गए हैं । मतवादों के फेर में मानवता त्राहि त्राहि कर रही है । जनता की त्रासदी भुनाई जा रही है । नेताजी सुभाषचंद्र बोस का यह देश आज किसिम किसिम के नेताओं के पीछे झंडाबरदार बना आपस में लड़ता-भिड़ता कट-मर रहा है ।

एक दिशाहीन रास्ते पर बढ़ रहा यह देश आखिर किस मंजिल की तलाश में है ? वातावरण में मौसम करवट ले रहा है तो राजनीति का मौसम अंगड़ाईयाँ लेता अपनी ऐंठ और उमस देश पर उतार रही है । जनता खुमारी और मदहोशी में अपने भाइयों के सामने ही खूनी रंगत के साथ तनी है । विचित्र होता है राजनीति का मौसम और जब चुनावी वातावरण हो तो फिर क्या कहना? नायाब और लाजवाब जलवा होता है । कभी नरम कभी गरम का बाजार चारों तरफ सज जाता है ।आक्टोपस के जकड़-जाल से बचने का जो उपाय है उससे अपरिचित समुद्र में उतरते रहने का संकल्प हमेशा जोखिम भरा होता है । चुनावी मौसम में नजाकत को भाँपते हुए आनंदित होना चाहिए। नहीं कि भेड़ियाधसान भीड़ में आँख मूँदकर फँस जाना चाहिए । विवेक का फँस जाना समाज, देश और भविष्य का संकट में फँस जाना होता है । देश की दसों दिशाएँ चुनावी मौसम में गुंजायमान होने के लिए तैयार है । तेवर और पैंतरों का नजारा दिखना शुरू हो गया है ।

हुआ चुनावी मौसम,मनमोहक पुरजोर ।

वादे नारे घोषणा, घहर रहे हर ओर ।।

राग वसंती गा रही, बीरू है पतझार ।

शिशिर शरद हैं नाचते, गर्मी बंटाढार ।।


संजय पंकज। बदलाव के अप्रैल 2018 के अतिथि संपादक। जाने – माने साहित्यकार , कवि और लेखक।  स्नातकोत्तर हिन्दी, पीएचडी। मंजर-मंजर आग लगी है , मां है शब्दातीत , यवनिका उठने तक, यहां तो सब बंजारे, सोच सकते हो  प्रकाशित पुस्तकें। निराला निकेतन की पत्रिका बेला के सम्पादक हैं। आपसे मोबाइल नंबर 09973977511  पर सम्पर्क कर सकते हैं। 

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