ब्रह्मानंद ठाकुर

हमारे देश का अन्नदाता बदहाल है, लेकिन सरकारें खुशहाल । कोई किसानों की कर्जमाफी का वादा करता है तो कोई बिजली का बिल माफ करने का भरोसा देता है, लेकिन कोई सरकार व्यावसायिक खेती का तरीका सिखाने और पैदावार को उचित दाम में बेचने का इंतजाम करने का वादा नहीं करती । टीम बदलाव की कोशिश है कि किसान आत्मनिर्भन बने और युवा व्यावसायिक खेती की ओर रुझान करें । अन्नदाता सुखी भव की इस कड़ी में आज आपके लिए मशरूम की खेती की विधि पर ले कर आए हैं। देश में बढ़ती जनसंख्या और जलवायु परिवर्तन के कारण खेती में लगातार आ रही परेशानियों से निबटने के लिए मशरूम की खेती किसानों की आमदनी का एक कारगर विकल्प है। इसका उत्पादन कम या बिना खेत वाले युवा या महिलाएं सभी कर सकते हैं । इसे झोपड़ियों में, घर के अंदर या किसी भी वर्टिकल जगह पर उगाया जा सकता है। उत्पादन विधि से पहले ये जानना जरूरी है कि मशरूम कितने तरह के होते हैं। कृषि वैज्ञानिक उत्पादन विधि के आधार पर इसके तीन तरीके बताते हैं । पहला आयस्टर,  दूसरा बटन मशरूम और तीसरा राजेन्द्र मशरूम दुधिया । जिसका विकास केन्द्रीय राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा द्वारा किया गया है ।  पिछले दिनों मशरूम वैज्ञानिक डाक्टर दया राम  ने मशरूम उत्पादन विधि के बारे में जो जानकारी दी वो मशरूम की खेती करने वाले नये किसानों के लिए कारगर साबित हो सकती है ।

आयस्टर मशरूम उगाने की विधि

सबसे पहले छायादार जगह का चयन करें । उसके बाद भूसा या पुआल की कुट्टी इकट्ठा करें और उसे पानी में तब तक उबाले जब तक भाप ना निकलने लगे । भूसे को उबालने के बाद साफ फर्श पर रख कर ठंडा करें । ऐसा करने से उसमें से मौजूद पानी रिसकर निकल जाएगा । इसके बाद प्रतिकिलो ग्राम शुष्क कुट्टी या भूसे के हिसाब से 150 ग्राम मशरूम का बीज उसमें अच्छी तरह मिलाएं । यानी अगर आपने एक किलो भूसे का इस्तेमाल किया है तो उसमें 150 ग्राम मशरूम बीज का इस्तेमाल होगा । गीले भूसे या कुट्टी में मशरूम बीज मिलाने के बाद जालीदार पालिथिन बैग मे भर दिया जाता है। ऐसा करने के बाद उसे ठंडी जगह पर रख दिया जाता है । जिस जगह आप मशरूम बीज से भरा पॉलिथीन बैग रख रहे हों वहां का तापमान न्यूनमत 20 डिग्री और अधिकत 30 डिग्री से ज्यादा ना हो । अगले 10 से 15 दिनों में मशरूम कवक उस जालीदार बैग के भीतर फैल जाता है और 15-20 दिनों में मशरूम निकलना शुरू हो जाता है । जो अगले 3-5 दिनों में तोड़ने लायक हो जाता है। इस तकनीक से सालों तक इस प्रभेद का उत्पादन सम्भव है। वैसे सितम्बर से मार्च का समय इसके लिए काफी उपयुक्त होता है। परिपक्व मशरूम को तोड़ लेने के बाद यदि अपेक्षित नमी बरकरार रखी जाए तो दुबारा भी इससे उत्पादन लिया जा सकता है। इस प्रभेद का उत्पादन खर्च 15-18 रूपये प्रतिकिलो पड़ता है जबकि सामान्य बाजार में इसे 100 रुपये प्रति किलो के हिसाब से आसानी से बेचा जा सकता है । मशरूम की खेती के इस प्रकार को ढिंगरी के नाम से भी जाना जाता है ।

बटन मशरूम उगाने की विधि

बटन मशरूम अपनी बेहतर गुणवत्ता के लिए काफी लोकप्रिय है। इसके लिए करीब 10 क्विन्टल भूसा या कुट्टी को लगातार पानी डाल कर दो दिनों तक भिंगोने भिगोया जाता है । तीसरे दिन इसमें 100 किलोग्राम गेहूं का चोकर, 20 किलोग्राम यूरिया, 50 किलोग्राम जिप्सम, 300 किलोग्राम मुर्गी की खाद या बिनौले की खल्ली 300 किलो ग्राम अच्छी तरह मिला कर ढेर लगा दिया जाता है। ढेर लगाने का भी खास तरीका होता है। पहले 20 फीट लम्बा, 6 फुट चौड़ा, एक फुट ऊंचा भूसा का मिश्रण फर्श पर फैला कर तह लगाते हैं। इसके ऊपर छिद्र वाले 4 ईंच व्यास वाले 20 फीट लम्बे पाईप को क्रमश: डेढ़ फीट के अंतराल पर तह के ऊपर रखते हैं इसके बाद पाईप के ऊपर दो फीट ऊंचा मिश्रण का तह लगाया जाता है। उसके ऊपर फिर दो पाईप इस तरह रखा जाता है कि नीचे रखे तीनों पाईप के बीच में आ जाए।। फिर तीसरी बार दो फीट ऊंचा मिश्रण का तह चढ़ाते हैं। उसके ऊपर एक पाईप ऐसे रखें कि नीचे रखे दोनों पाईप के बीच में रहे। अंत में बाकी बचे मिश्रण का एक फीट मोटा तह बना कर पूरी ढेर को काले रंग के पालिथीन से ढंक दिया जाता है। ऐसा करने से गैस बाहर नहीं निकलती ।

एक से तीन  दिन तक इस ढेर को इसी तरह छोड़ दिया जाता है। चौथे दिन पाईप को दोनों तरफ से खोल देते हैं। इस समय इसका तापमान 50 से 60 डिग्री सेल्सियस रहता है। छठे दिन ढेर की पलटाई की जाती है और पहले वाली प्रक्रिया अपनाते हुए फिर उसे पालिथीन से ढक दिया जाता है । । नौवे दिन ढेर को चारो तरफ से (ऊपर से नहीं) खोल दिया जाता है। इसमें तापक्रम 50 से 60 डिग्री सेल्सियस  के बीच रहना चाहिए। 11वें दिन फिर पलटाई होती है और पहले की भांति फिर ढेर लगा कर ऊपर में पालिथिन से ढक दिया जाता है।लेकिन चारों तरफ से खुला रहना चाहिए जिससे  अंदर का तापमान 48 से 52 डिग्री सेल्सियस रहे । तेरहवें दिन ढेर को पूरी तरह खोल कर ठंडा होने के बाद प्रति क्विनटल खाद में 600 ग्राम बटन मशरूम का बीज मिला कर पालि बैग में या बेड़ में कागज से ढ़क कर रखा जाता है। जिस जगह आप इसे रख रहे हों वहां का तापमान  20 से 25 डिग्री सेल्सियस रहना चाहिए। इस विधि में कवक 15 से 20 दिनों में फैल जाता है। कवक जाल को ढक कर रखना चाहिए और समय समय पर नमी बनाए रखने के लिए पानी का छिड़काव जरुरी होता है। 15 से 20 दिनों बाद मशरूम निकलना शुरु हो जाता है। इस विधि से मशरूम उगाने पर लागत 85रूपये प्रित किलोग्राम आती है और बिक्री 125 रूपये किलोग्राम की दर से होती है। इसके उत्पादन का सही समय नवम्बर से फरवरी होता है । अत: खाद बनाने का काम अक्टूबर महीने में ही शुरू कर देना चाहिए।

राजेन्द्र मशरूम दुधिया-1 उगाने की विधि

इसका उत्पादन अप्रैल से अक्टूबर महीने तक होता है। इस प्रभेद के लिए अपेक्षित तापक्रम 28 से38 डिग्री सेल्सियस है। इसके लिए कुट्टी या भूसे को 8 से 10 घंटे तक पानी में भिंगो कर रखा जाता है। फिर गर्म पानी में उसे आधे घंटे तक उबाला जाता है। फिर उसे फर्श पर फैला कर छाया में सूखाते हैं जिससे उसका अतिरिक्त पानी निकल जाए और जरूरत के लायक नमी बनी रहे। इसके बाद इस गीली कुट्टी या भूसे के वजन के हिसाब से 4-5 प्रतिशत बीज उसमें मिला कर 60×30 सेमी आकार के पोलीथीन थैले में भर कर मुंह बांध कर उत्पादन कक्ष में रख दिया जाता है। समुचित नमी बनाए रखने के लिए  दीवार और फर्श पर समय समय पर पानी का छिड़काव जरुरी होता है। बुआई के 10-12 दिनों बाद कवक का जाल फैलने लगता है और इसके 15-20 दिनों में मशरूम का उत्पादन होने लगता है । मशरूम वैज्ञानिक दयाराम बताते हैं कि फिलहाल बिहार में 20 हजार से अधिक परिवार मशरूम उत्पादन में लगे हुए हैं। इसी का परिणाम है कि यहां इसका उत्पादन दो हजार टन तक पहुंच गया है। विश्वविद्यालय का मशरूम विभाग  इसको प्रोत्साहित करने के लिए आदिवासी महिलाओं, बेरोजगार युवकों को लगातार मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दे रहा है।

डॉ. दयाराम, राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा

पुराने भूसे या कुट्टी से तैयार खाद से कैसे लें दूसरी फसल

इसके लिए पहली फसल से बची खाद को शोषित करना जरूरी होता है । इसके लिए एक भाग मिट्टी और एक भाग बालू को मिला कर 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम, 10 मिली लीटर फार्मेलिन तथा 5 मिली लीटर क्लोरोपाइरीफास प्रतिलीटर पानी में घोल बना कर एक सप्ताह पहले शोषित किया जाता है और जूट के गीले बोरे से ढक दिया जाता है । केसिंग से फायदा यह होता है कि मृदा जीवाणु एवं कीटाणु रहित हो जाती है। केसिंग करने के 20 दिन बाद मशरूम निकलना शुरू हो जाता है । जो अगले 5-7 दिन में तोड़ने लायक हो जाता है। इस तरह दूसरी और तीसरी फसल भी 10 से 15 दिनों में तोड़ने लायक हो जाती है। इसतरह 100 किलोग्राम भूसा या कुट्टी में 80 से 90 किलोग्राम फसल प्राप्त होती है। इसका उत्पादन खर्च 40 रूपये प्रति किलो आता है जबकि बिक्री औसत 120 रूपये किलो होती है। बड़े पैमाने पर मशरूम उगाने वाले किसान पालीथीन बैड का उपयोग नहीं कर बांस से बेड का निर्माण कर सतही बुआई विधि से इसकी खेती करने लगे हैं। बटन मशरूम का उत्पादन अक्टूबर से फरवरी मार्च तक और दुधियि मशरूम का उत्पादन अप्रैल से अक्टूबर तक किया जाता है। आयस्टर मशरूम की खेती सालभर की जा सकती है लेकिन यह प्रभेद गुदेदार नहीं होने के कारण उतना लोकप्रिय नहीं है।

(अगले अंक में आपको बताएं मशरूम की विक्री के लिए कहां है बाजार )


ब्रह्मानंद ठाकुर/ BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

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