विजय प्रकाश

देश में मशरूम मैन के नाम से चर्चित कृषि वैज्ञानिक डॉ. दयाराम किसानों की आर्थिक सेहत सुधारने की दिशा में काम कर रहे हैं। मूल रूप से यूपी के जौनपुर जिले के निवासी और बिहार में राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा, समस्तीपुर में तैनात डॉ. दयाराम अपने काम को लेकर जितने गंभीर रहते हैं किसानों को लेकर उतने ही संजीदा। फिर चाहे मशरूम उत्पादन को लेकर ट्रेनिंग की बात हो या फिर किसानों की कोई भी समस्या, वो हर पल उपलब्ध रहते हैं। उनका सिर्फ एक ही मकसद है किसान पारंपरिक खेती के साथ व्यावसायिक खेती पर भी जोर दें। पिछले दिनों 21 और 22 जुलाई को डॉ. दयाराम जौनपुर जिले के जलालपुर ब्लॉक में आयोजित दो दिवसीय मशरूम उत्पादन प्रशिक्षण कार्यशाला का संचालन किया। इस दौरान टीम बदलाव की ओर से विजय प्रकाश ने डॉ. दयाराम से किसानों से जुड़े तमाम मुद्दों पर खुलकर बात की ।

बदलाव- आज देश में किसानों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं, ऐसे में अपनी बेहतरी के लिए किसानों को क्या करना चाहिए ?

डॉ. दयाराम- इसमें कोई शक नहीं कि आर्थिक तंगी के चलते बड़ी संख्या में किसान खुदकुशी को मजबूर हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि किसानों को हिम्मत हार जानी चाहिए। जब आपके सामने सभी रास्ते बंद होते हैं तभी नया रास्ता खुलता है। जरूरत है तो बस उसे पहचानने की।

बदलाव- मौजूदा दौर में किसानों को किस तरह की खेती पर जोर देना चाहिए।

डॉ. दयाराम- देखिए ज्यादातर किसान पारंपरिक खेती करते हैं जिसमें उनकी आजीविका तो चल जाती है, लेकिन आर्थिक जरूरतों की पूर्ति नहीं होती, ऐसे में किसानों को व्यावसायिक खेती पर भी जोर देना चाहिए ?

बदलाव- आप मशरूम उत्पादन पर ही ज्यादा जोर क्यों देते हैं ?

डॉ. दयाराम- देखिए मशरूम उत्पादन किसानों के लिए एक ऐसा विकल्प है जिसके जरिए किसान बेहद कम खर्च में ज्यादा मुनाफा कमा सकता है। मसलन मशरूम उत्पादन का काम ऐसे लोग भी कर सकते हैं जिनके पास जमीन बेहद कम है। उदाहरण के लिए ऐसे समझिए कि अगर आपके पास 30 बाय 40 की झोपड़ी है तो उसमें प्रतिदिन 10 से 15 किलो मशरूम उत्पादन होगा और बाजार में प्रति किलो मशरूम कम से कम 100 रुपये किलो बिकता है। यानी हर दिन आप 1500 रुपये की कमाई कर सकते हैं। इस हिसाब से हर महीने कम से कम 45 हजार रुपये का मशरूम बिकेगा ।

बदलाव- ये तो आमदनी की बात हो गई, लेकिन मशरूम उत्पादन में लागत कितनी आती है  ?

डॉ. दयाराम- वैसे तो हम लोग ये मानकर चलते हैं कि मशरूम उत्पादन में 50 फीसदी का मार्जिन होता है, लेकिन अगर आप सालाना मशरूम का उत्पादन करते हैं तो आपका मुनाफा भी बढ़ता है। ओएस्टर, बटन और दुधिया ये मशरूम की ऐसी प्रजातियां हैं जिनका उत्पादन अलग-अलग महीनों में होता है। मसलन बटन मशरूम की बुआई के लिए नवंबर सबसे मुफीद वक्त होता है और इससे फरवरी तक पैदावार ली जा सकती है। इसके बाद ओएस्टर मशरूम का उत्पादन फरवरी, मार्च और अप्रैल में किया जा सकता है। यही नहीं ओएस्टर के लिए सितंबर अक्टूबर और नवंबर का महीना भी अनुकूल होता है। यानी ओएस्टर की खेती साल में दो बार की जा सकती है। इसके अलावा दुधिया मशरूम गर्मी के मौसम में भी उगाया जा सकता है इसकी पैदावार मई से सितंबर तक होती है। यानी सितंबर से शुरू हुई मशरूम की खेती पूरे साल हो सकती है और किसान इसके जरिए अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं।

बदलाव- मशरूम उत्पादन में भूंसा का अहम रोल होता है, ऐसे में फसल कटने के बाद क्या भूंसा किसी काम आता है ?

डॉ. दयाराम- ये सवाल आपने बहुत सही किया है । बहुत कम लोग ही जानते हैं कि मशरूम उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले भूंसा का इस्तेमाल दूसरे काम में लिया जा सकता है । ओएस्टर मशरूम में इस्तेमाल भूंसा पशु आहार का काम करता है, क्योंकि मशरूम उत्पादन से उसमें प्रोटीन की मात्रा काफी बढ़ जाती है जो दुधारू पशुओं के लिए फायदेमंद होता है । जबकि दुधिया और बटन मशरूम में इस्तेमाल मटेरियल कंपोस्ट का काम करता है जिसे हम खेती के काम में इस्तेमाल कर सकते हैं । जिससे किसानों के खाद की कीमत कम हो जाएगी ।

बदलाव-अगर किसान मशरूम उत्पादन करता है तो फिर बेचने कहां जाएगा,जौनपुर के किसानों की बात करें तो ?

डॉ. दयाराम- जौनपुर के किसानों के लिए सबसे अच्छी बात ये है कि यहां का वातावरण मशरूम के लिए काफी अच्छा है, जहां तक आपने सवाल बिक्री का किया है तो जौनपुर जिले में छोटी बड़ी कई सब्जी मंडिया हैं जहां किसान मशरूम बेच सकता है। इसके अलावा वाराणसी जैसा बाजार भी जौनपुर से काफी करीब है। इन सबके अलावा किसानों के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है, कि वो अपने आस-पास मशरूम का बाजार तलाशें, जैसे पास पड़ोस में लोगों को मशरूम के गुणों के बारे में जागरूक करे, ताकि लोग दूसरी सब्जियों की तरह सप्ताह में कम से कम एक या दो दिन मशरूम का सेवन शुरू करें, इससे उनकी सेहत भी दुरुस्त रहेगी और किसानों की आर्थिक हालत भी सुधरने लगेगी ।

बदलाव- जौनपुर में मशरूम उत्पादन की दो कार्यशालाएं आपने कीं, यहां के किसानों को लेकर क्या ऑब्जर्वेशन है ?

डॉ. दयाराम- देखिए जौनपुर खासकर जलालपुर के रहने वाले किसान अभी पारंपरिक खेती पर ही ज्यादा जोर देते हैं, जागरुकता के अभाव में व्यावसायिक खेती को लेकर किसानों में काफी उदासीनता है, लिहाजा हम सभी का दायित्व है कि किसानों को अलग-अलग तरह की व्यावसायिक खेती के प्रति जागरुक करें। खासकर ऐसी खेती जिसमें लागत कम हो और मुनाफा ज्यादा। एक बात और मीडिया का रोल भी यहां बेहद खास है, हर रोज अखबारों में खेती-बाड़ी से जुड़ी ख़बरें छपनी चाहिए, इससे लोगों की उत्सुकता बढ़ती है और एक दूसरे से लोग प्रेरणा भी लेते हैं । badalav.com जिस तरह किसानों की बेहतरी के लिए काम कर रहा है अगर दूसरे अखबर या फिर साइट्स ऐसा करना शुरू कर दें तो हालात बदलते देर नहीं लगेगी।

बदलाव- सुना है पूसा केंद्र में मशरूम के और भी प्रोडक्ट तैयार हो रहे हैं ?

डॉ. दयाराम- बिल्कुल सही, हमने बाजार के हिसाब से मशरूम के कुछ उत्पाद तैयार किए हैं, जैसे बिस्किट, समोसा, नमनकीन और अचार। ये ऐसे उत्पादन हैं जो आने वाले दिनों में किसानों के लिए वरदान साबित होंगे। यानी किसान खुद उत्पादन करेगा और खुद सामान बनाकर बाजार में बेचेगा।

बदलाव- जौनपुर के किसानों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे ।

डॉ. दयाराम- मैं जौनपुर का रहने वाला है लिहाजा मैं जानता हूं जौनपुर के लोग काफी जुझारू हैं। वे मेहनत भी काफी करते हैं बस जरूरत हैं तो सही दिशा में मेहनत करने की। मैं जल्द ही एक बार फिर जौनपुर जाऊंगा और किसानों में नई ऊर्जा का संचार करने की कोशिश करूंगा । अगर किसान एक कदम चलेंगे तो मैं उनके साथ दो कदम चलने को तैयार हूं।


विजय  प्रकाश/  मूल रूप से जौनपुर जिले के मुफ्तीगंज के निवासी । बीए, बीएड की पढ़ाई के बाद इन दिनों सामाजिक कार्यों में जुटे हैं

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