सच्चिदानंद जोशी

mandu-s-sirकुछ दिन पहले मांडू जाना हुआ। यात्रा के अंतिम पड़ाव में हम प्रसिद्द दिल्ली दरवाजे पर रुके, क्योंकि हमारे गाइड ने कहा था उसे जाते समय देख लेना। अब जैसा कि इन यात्राओं में होता है अंतिम पड़ाव तक आते-आते उत्साह ख़त्म हो जाता है, औपचारिकता रह जाती है। सो वो ही हाल हमारा भी था। उस पर बारह बजे की धूप कहर ढा रही थी। किसी तरह गाड़ी से उतरे तो हमारे स्वागत के लिय खड़े थे दो नन्हे गाइड। लड़के ने जिसकी उम्र तीन-चार साल होगी सिर्फ नीचे का पहन रखा था और लड़की ने जिसकी उम्र डेढ़-दो साल होगी सिर्फ ऊपर का।

”साब में दिखा दूं दस रुपया देना खाना खाना है ”, उसने पूरे आत्मविश्वास से कहा। “क्या नाम है तुम्हारा “ मैंने पूछा तो उसने कहा “रोशन”।
” और इसका”,  “साब ये मेरी बहन है जूही। हम पूरा दिखा देते हैं। ऊपर से तालाब भी दीखता है और रूपमती महल भी।”

“हाँ हमने देखा है, सब देखा है! अभी हमें और कुछ नहीं देखना” जाहिर है उतनी ऊपर जाकर तालाब और महल देखने की ‘श्रद्धा’ और हिम्मत नहीं बची थी, लेकिन रोशन को लगा कि या तो हम उसकी काबिलियत पर शक कर रहे हैं या दस रुपया कुछ ज्यादा है। “ साब आप पांच देना, वो देखो ऊपर दरवाजे पर हाथी बना है , और उधर घोडा।” सचमुच यदि वो नहीं बताता तो हमे दरवाजे की कमानी में बने वो हाथी-घोड़े नज़र नहीं आने वाले थे। फिर भी हम उसके “ऑफर “ को अस्वीकार करके आगे बढ़ गए। पीछे मुड़कर देखा तो तो भाई बहन वही कुछ बीनने में लग गए थे।

सफ़रनामा-1

दिल्ली दरवाजा देखने की औपचारिकता पूरी कर जब हम लौटे तब भी भाई बहन अपने काम में लगे थे। ” क्या बीन रहे हो”, मालविका ने पूछा । ” कांच है नी। बाबू लोग बोतल तोड़ के चला जाता है। बाई लोग के पाँव में लगता है.” हमने देखा वो कांच टुकड़े बीन कर एक कोने में उसका ढेर लगा रहे थे ताकि लकड़ी बीन कर आने वाली महिलाओं के पैर में वो चुभ न जाए। समझते देर नहीं लगी कि ये कांच के टुकड़े उन बोतलों के थे जो हम जैसे संभ्रांत सैलानियों ने अपनी आनंद यात्रा जिसे अंग्रेजी में pleasure trip कहा जाता है, के उत्साह में फोड़ी थी।

तालाब और हाथी घोड़े के लिए तो नहीं पर इस बात के लिए तो उसे कुछ देने की इच्छा हो गयी। मालविका ने पर्स में से दस रुपये का नोट निकल कर उसके हाथ में रखा। साथ में दो टॉफ़ी भी दी। वो आश्चर्य से बोला ” मैंने तो तालाब नी दिखाया”। ” तूने तालाब नहीं दिखाया लेकिन उसके अलावा बहुत कुछ दिखा दिया” मालविका बोली। रोशन को पता नहीं मालविका की बात कितनी समझ में आई लेकिन उसने उत्तर में एक प्यारी सी स्माइल दे दी। धूप की तपन और सफ़र की थकान मिटानेके लिए वो स्माइल काफी थी । “फोटो खिंचवायेगा”, मालविका के इस प्रस्ताव पर रोशन राजी हो गया और उसने वही झाड़ी में रखी कमीज़ झट पहन ली। जूही दूर ही बैठी अपना काम करती रही। उसकी फोटो खिंचवाने में कोई रूचि नहीं दिखी।

हम जब लौटने को हुए तो देखा दोनों भाई बहन फिर पूरे मनोयोग से अपने काम में लग गए थे। जब आप मांडू घूमते हैं तो बाजबहादुर रूपमती की कहानी इतनी बार सुनते हैं कि उनसे मिलने की इच्छा जाग्रत हो जाती है। बाज बहादुर से तो नहीं मिल पाया लेकिन अपना रोशन क्या किसी बाज बहादुर से कम है ?


sachidanand-joshi-profileसच्चिदानंद जोशी। शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय और कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की एक पीढ़ी तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। इन दिनों इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के मेंबर सेक्रेटरी के तौर पर सक्रिय।

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