पशुपति शर्मा

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, शुक्रवार 30 मार्च की शाम। ‘आई’ के पद्मश्री तक के सफ़र पर एकाग्र एक कार्यक्रम। आई यानी मालती जोशी। 4 जून 1934 को औरंगाबाद में जन्मी मालती जोशी ने वक्त के साथ कई शहरों का सफर तय किया और अपना एक वृहत्तर ‘रचनात्मक कुटुम्ब’ तैयार किया। मालती जोशी की 6 दशकों की साहित्य साधना का सम्मान भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री प्रदान कर किया। 1971 में मालती जोशी की पहली कहानी धर्मयुग में प्रकाशित हुई और उसके बाद किस्सों का कारवां बनता ही चला गया। कथा-कहन की अपने अंदाज से मालती जोशी ने कथा साहित्य को नया मुकाम दिया। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की ये शाम भी उनके कथा-कहन से कुछ खास बन गई। उन्होंने परिवार के किस्सों के जरिए मां और बेटे के बदलते मनोभाव का बेहद मार्मिक चित्रण किया।

शाम 6 बजकर 45 मिनट के करीब राहुल ने माइक संभाला और फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। अच्युतानंद मिश्र, राम बहादुर राय, सूर्यबाला, सच्चिदानंद जोशी और  इस शाम की केंद्रीय शख्सियत आई मंच पर मौजूद थीं। कहते हैं मूल से प्यारा सूद होता है। और इस शाम भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। बेटे से पहले माइक संभालने का मौका पोते शांतुनु को मिला। उन्होंने बताया कि आई के लिए सिम्पिलिसिटी ही क्रिएटिविटी रही है। वो रोजाना क्रॉसवर्ड सॉल्व करती हैं। आकाशवाणी का पहला बुलेटिन सुनती हैं। बच्चों को भी जल्दी सोने को नहीं कहतीं, टीवी बंद करने को नहीं कहतीं। परिवार का पूरा रस लेते हुए अपना कथा संसार रचती हैं। किचन से लेकर किस्सों तक हर दिन कुछ नया एहसास दे जाती हैं प्यारी आई।

भोपाल से आईं सुनीता सक्सेना ‘मालव की मीरा’ के तौर पर आई का परिचय कराती हैं। ‘मैं मीरा मतवाली सी हूं’ से लेकर ‘मैंने तो प्रीत निभाई’ तक अलग-अलग रूप में वो मालती जोशी को बयां करती हैं। और अंत में अपनी कविता के साथ बात खत्म करती हैं- “फैल गई नदी/विस्तार नज़र आता है/दीदी, तुझमें मां का/प्यार नज़र आता है”। इस सिलसिले को जारी रखती हैं, राजश्री रावत। वो भी कविता के जरिए मालती जोशी से संवाद बनाती हैं।

राजीव धीरे-धीरे मंच पर आते हैं और माइक को टटोलते हैं। उनका मानो पूरा शरीर ही इन पलों में आनंदित हो रहा था। हाथ-पांव से लेकर पूरा चेहरा आहलाद से सराबोर था। जश्न-ए-रेख्ता के दौरान पहली मुलाकात से लेकर बच्चों के एक कार्यक्रम में आई को दिए गए न्योते तक कई यादों को वो यहां साझा करते हैं। वो बताते हैं कि आई ने जब ‘मां यशोदा’ कहानी सुनाई तो पहली बार उन्हें अपनी मां नज़र आ गईं। राजीव कानों से ही अपनी आंखों का काम भी लेते हैं। वो कहते हैं- साहित्यकार को लेखनी नहीं बल्कि उनकी सहजता बड़ा बना देती है। आई के कथा कहन में पूरा ‘थियेटर’ साथ चलता है। और वो आखिर में ये अपील करते हैं कि किस्सों के ऑडियो फॉरमेट भी उपलब्ध हों, ताकि उन जैसे लोगों के लिए कथा का ये संसार अनदेखा न रह जाए।

सविता खान मौजूदा नारी विमर्श के संदर्भ में आई की कहानियों पर बात रखती हैं। वो कहती हैं कि नारी विमर्श को कुछ लोगों ने देह विमर्श तक समेट रखा है, लेकिन मालती जोशी उससे आगे का विमर्श खड़ा करती हैं। वो नारी के मन की व्याख्या करती हैं। मालती जोशी के महिला पात्र क्रांति करने नहीं निकलती। वो घर-आंगन में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हुई कुछ सवाल उठाती हैं। कमाऊ स्त्रियों की दुविधाओं और संघर्षों को लेकर भी मालती जोशी ने तमाम कहानियां लिखी ैहैं और उस बारे में भी सविता खान बात करती हैं।

‘शादी के बीच जनेऊ संस्कार’ की परंपरा निभाते हुए इसी कार्यक्रम में सच्चिदानंद जोशी की पुस्तक ‘कुछ अल्प विराम’ का विमोचन होता है। ये ‘अल्प विराम’ कार्यक्रम को दो हिस्सों में बांटने वाला विराम भी अनायास ही बन जाता है। इसके बाद मंचासीन लोगों के माइक थामने की बारी आ जाती है। सच्चिदानंद जोशी अपनी पुस्तक का एक अंश पढ़ते हुए ‘आज़ादी’ की कीमत को लेकर हमें कुरेद जाते हैं।

वरिष्ठ कथाकार सूर्यबाला इस आयोजन को ‘उपलब्धियों की विरासत का सम्मान समारोह’ नाम देती हैं। वो मालती जोशी की कथा यात्रा को हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियों के जरिए बयां करती हैं- “एक राह पकड़ तू चल, मिल जाएगी मधुशाला”। मालती जोशी ने जो राह पकड़ी, उसे अपनी शर्तों के साथ सफर के आखिर तक निभाया। वो घर-आंगन की कहानियों की कथाकार के तौर पर अपनी पहचान मुकम्मल करती हैं। समीक्षकों ने मालती जोशी की उपेक्षा की, लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। उनका कथा-संसार में ‘गॉड फादर’ नहीं था। चलते-चलते वो सच्चिदानंद जोशी की पुस्तक ‘कुछ अल्प विराम’ को सतसईया के दोहरे की संज्ञा देती हैं।

कार्यक्रम के आखिर में बड़े पत्रकारों अच्युतानंद मिश्र और राम बहादुर राय ने अपनी बात रखी। साथ ही मालती जोशीजी की किस्सागोई का हॉल में बैठे लोगों ने आनंद उठाया। मैं इस दौरान हॉल के बाहर घूमता रहा, क्योंकि कुछ वक्त धर्मपत्नी को भी इस कार्यक्रम का आनंद उठाने देना, मेरी नैतिक जिम्मेदारी जो थी। 5 माह के बेटे अनमोल और पांचवी कक्षा में आ चुकी रिद्धिमा ने भी कुछ पलों के लिए ही सही ‘आई’ का सान्निध्य हासिल कर लिया।


india tv 2पशुपति शर्मा ।बिहार के पूर्णिया जिले के निवासी हैं। नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संचार की पढ़ाई। जेएनयू दिल्ली से हिंदी में एमए और एमफिल। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। उनसे 8826972867 पर संपर्क किया जा सकता है।

 

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