रज़िया अंसारी 

गांव के लहलहाते हरे भरे खेत, खेतों में सरसों के पीले-पीले फूल, कुएं पर पानी भरती गांव की औरतें, जंगल से लकड़ियों का बोझा सर पर ढोकर लाती महिलाएं, गांव की पगडंडियों पर बैलगाड़ियों की कतारें, भूजा भूजती महरिन, गांव की ये कुछ ऐसी चीजें हैं जिनका ख्याल आते ही मन रोमांचित हो जाता है. खासकर ये यादें उनके लिए और खास हो जाती हैं जिनका संबंध गांव से रहा है, या जिनका बचपन गांव में बीता है और अब वो किसी वजह से शहरों में रह रहे हैं.
मेरा बचपन भी अधिकतर गांवों में ही बीता है. शहर आ जाने के बाद जब भी छुट्टियाँ मिलती हैं, हम गांव ही जाते हैं. गांव से इतना प्यार है कि अब भी जबकि वहां हमारे परिवार का कोई नहीं रहता है मौका मिलते ही हम गांव के लिए निकल जाते हैं. गांव में दादा के ज़माने का टूटा फूटा घर है. कोई सुविधा नहीं है फिर भी वहां हम एक-दो दिन रहकर अपने बचपन की यादों को ताजा कर लेते हैं. खेत-खलिहानों में घूमते हैं, बाग-बगीचों की सैर करते हैं, और शहर के भीड़भाड़ से दूर गांवों में जाकर सुकून ढूंढ़ते हैं. लेकिन अब गांवों में भी बहुत कुछ बदल गया है. कुछ बदलाव तो अच्छे हुए हैं, जिनसे गांव वालों को सहूलियत हुई है. लेकिन कुछ बदलाव ऐसे हुए हैं जिनसे गांवों की आत्मा खो रही है. हम जैसे लोग जो गांव जाकर गांव ढूंढ़ते हैं, उनके लिए ये बदलाव अच्छे नहीं हैं. हम अपने गांव की बात करते हैं, जिसे हमने बचपन में देखा है और अब उसमें आ रहे बदलाव को भी देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं।
यूपी के महाराजगंज जिला में फरेंदा से लगभग 12 किलोमीटर दूर 20 से 25 घरों का एक छोटा-सा गांव है छविलालपुर. पहले यहाँ बस 10-12 घर ही थे. अब परिवार बढ़ने से घर भी बढ़ गये हैं. हिन्दू और मुस्लिम दोनों हैं इस गांव में. पहले सभी घर खपरैल थे. अब नए घर जो बने हैं वे पक्के हैं और जो पुराने खपरैल घर थे, वे भी टूटकर पक्के बन रहे हैं. गांव के लोग बहुत अमीर नहीं हैं और न ही ज्यादा शिक्षित. घर के जो लड़के बड़े हुए वे रोजी-रोटी के लिए दूसरे बड़े शहरों के लिए निकल पड़े. कई तो खेत बेचकर विदेशों के लिए भी निकल गए. गांव के पुराने लोग अब भी खेती और मजदूरी ही करते हैं.
अब कुछ लोग शिक्षा की अहमियत को समझ रहे हैं तो बच्चों को स्कूल भी भेज रहे हैं. सरकारी स्कूल में तो ज्यादातर गरीब घरों के बच्चे ही जाते हैं. गांव से कुछ दूर इंग्लिश मीडियम के भी स्कूल खुले हैं. लेकिन वहां इंग्लिश नाममात्र की ही है. लेकिन यह देखकर हमें थोड़ा आश्चर्य हुआ कि जैसे शहरों में मिडिल क्लास के लोग अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में भेजने पर गर्व महसूस करते हैं और पर्याप्त पैसा न होने पर भी बच्चों को उन स्कूलों में भेजते हैं, वैसे ही गांव में भी लोग इंग्लिश की अहमियत को समझ रहे हैं और पैसा न होने पर भी इंग्लिश मीडियम में ही बच्चों को पढ़ाना चाह रहे हैं. हालांकि इन स्कूलों में फीस बहुत ही कम है। बस 150 रुपये प्रतिमाह. एक बात और, जो बहुत ही गरीब मजबूर हैं उनके बच्चों की फीस में थोड़ी रियायत बरती गई है. उन्हें 100 रुपये प्रतिमाह ही फीस चुकाने की छूट दी गई है. गांव के पूर्व परधान के स्कूल का हमने मुआयना भी किया.
शिक्षा पर लिखने के लिए एक अलग आर्टिकल लिखना पड़ेगा. इसीलिए अभी बस इतना ही. हम जब भी गांव जाते हैं तो उन चीजों को ढूंढ़ते हैं जो अब खो गई हैं या खोती जा रही हैं. मेरे गांव में एक कुआं था. अब नहीं है. उस कुएं को कूड़ों से पाट दिया गया है. पहले उसमें से ताजा मीठा पानी निकलता था. अब उस मीठे पानी की बस यादें ही बची हैं। कुछ लोगों ने घरों में शौचालय बनवा लिया है. कुछ लोगों के घरों में सरकारी योजना के तहत शौचालय बने हैं. कुछ दिनों पहले जब गांव गये थे तो उन सरकारी शौचालयों में लकड़ी और कंडे (गोबर के उपले) रखे देखे थे. लेकिन इस बार उन शौचालयों का इस्तेमाल होते देखा. खुले में शौच जाने वालों की तादाद कम हुई है फिर भी बहुत सारे लोग अभी भी शौच के लिए सुबह सुबह खेतों में जाते दिख जाते हैं.
मेरे घर में जाता (गेहूं पीसने की चक्की) अब भी रखी है. नई पीढ़ी के लिए यह अब एंटीक बन चुकी है. खेती में भी नई नई तकनीकों की आमद हुई है. अधिकतर काम मशीनों से ही होता है. पहले खेतों में पटवन के लिए पम्पिंग मशीन रहता था और खेतों की क्यारियों तक पानी पहुंचाने के लिए पतली-पतली नालियां बनाई जाती थीं. इन नालियों से खेतों में पानी पहुँचता था. अब यह काम रबर की पाइप से होता है. गर्मी के दिनों में जब पंपिग मशीन चलता था तो हम लोग खूब नहाते थे खेतों में जाकर.
खलिहानों में रखे पुआल हमें सबसे ज्यादा आकर्षित करते थे. क्योंकि उसपर चढ़कर हम लोग खूब खेला करते थे. तब तक जब तक कि पूरे शरीर में खुजली न हो जाये या घर वाले जबरन हमें घर खींचकर ले न जाएं. अब चूँकि धान और गेहूँ आदि फसलों की कटाई मशीनों के द्वारा होती है तो पुआल बहुत ही कम देखने को मिलता है. इसके बाद नंबर आता है बैलगाड़ी का. बचपन में हमने खूब सवारी की है इन बैलगाड़ियों की. तब खेतों में हल चलता था और बैल से खेतों में बहुत काम लिया जाता था. इस बार गांव गए तो बस एक बैलगाड़ी दिखी. अम्मा ने बताया कि पूरे मौजा में बस यही एक बैलगाड़ी बची है. बैलगाड़ी पर समान रखा हुआ था और उसपर बैठने की मेरी तमन्ना अधूरी रह गई.
पहले ठंड में गांव जब जाते थे तो गन्ने के कोल्हू पर जरुर जाते, जहां भेली (गुड़) बनता था. और हम लोग गुड़ बनने का पूरा प्रोसेस देखकर और फिर गर्म गर्म गुड़ खाकर ही वहां से आते थे. अब गांव में कोल्हू भी कम ही बचे हैं. इसके बाद नंबर आता है भूजा और भूजने वाले भार का. जो औरत भूजा भूजती है उसे ‘महरिन’ कहते हैं. लेकिन हम लोग ठेठ देहाती बोली में उसे ‘भुजइन’ कहते थे. कच्चा चना, चावल, मक्का आदि ले जाकर हमलोग उसका भूजा भुजाते थे और घर आकर लहसुन और मिर्चा की चटनी के साथ खूब मजे लेकर खाते.

हमें भुजइन के भार जाना बहुत अच्छा लगता था. कई औरतें लड़कियां वहां आतीं और हम लोग इत्मीनान से बैठकर उसे अपना काम करता देखते. इतनी कला से भूजा भुजते देखने में बड़ा अच्छा लगता था हमें. लोग वहां गॉसिप भी खूब करतीं. गॉसिप तो शहरी बोल है, आप चाहें तो इसे चुगली या शिक़वा-शिकायत कह सकते हैं. पूरे गांव के घरों की अनसुनी बातें पता चल जाती थीं. भूजा भुजने के बदले वह अनाज या पैसे लेती. पहले मेरे गांव में वस्तु विनिमय से काम चल जाता था. कई बार पैसा न होने पर हम लोग डेहरी से अनाज निकाल कर सामान खरीद लेते थे. किसी को पता भी नहीं चलता था. अब यह परिपाटी खत्म हो गई है. अब तो हमें बस एक भार ही दिखा. वक्त की कमी ही कहेंगे कि इच्छा रहने के बाद भी हम भूजा नहीं भूजा पाए. सोचती हूँ कि गाँव की अंतिम साँसें ले रही इन सारी चीजों, रवायतों क्या तब भी मैं देख पाऊंगी जब अगली मर्तबा गाँव जाऊंगी। इंशाल्लाह चाहूंगी तो जरूर कि हमेशा हमेशा के लिए इनका वजूद बचा रहे।

गांव में भी अब मोबाइल फोन आ गया है. लोग अब आपस में बैठकर बात नहीं करते, ज्यादातर लोग फ़ोन पर फिल्म देखते या गाना सुनते है. पहले ठंड में लोग आग जलाकर इकट्ठे बैठकर बातें करते थे. हमारे दुआरे पर बड़ा सा कौड़ा (आग) जलता था, एकसाथ 10-12 लोग बैठ कर आग सेंकते थे. हम लोग खेत से आलू निकाल कर पहले ही रख लेते और जब कौड़ा जलता तो उसमें भूनकर आलू खाते थे. उस सोंधे सोंधे आलू का स्वाद आज भी याद आता है. गांव से जुड़ी मेरी बहुत-सी यादें हैं. सब लिखना संभव भी नहीं है. लेकिन अब शायद कन सबकी बस यादें ही रह जाएँगी. पता नहीं अगली बार जाने पर फिर क्या विलुप्त हो जाये. हर बार गांव में कुछ न कुछ बदलाव देखने को मिलता रहता है. लेकिन हर बार गांव जाकर हम अपने बचपन का गांव ही ढूंढ़ते हैं. यह सिलसिला बदस्तूर आगे भी जारी रहेगा.


रज़िया अंसारी, पत्रकार ।