महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के 101 वें जन्म वर्ष में हमने अब तक दो किस्तों में उनके संस्मरण आपसे साझा किए। इसी कड़ी में एम अखलाक की ये तीसरी प्रस्तुति। कोशिश है सब कुछ जानकी बल्लभ शास्त्री की जुबानी ही आप तक पहुंचे। 

एक साक्षात्कार के दौरान आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर के बारे में लाजवाब किस्सा सुनाया था। महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी बोल पड़े- उन्होंने मेरी केवल एक कविता सुनी, मोहित हो गए, भक्त हो गए वो। ‘ किसने बांसूरी बजाई करके उस जमाने में एक गीत गाता था मैं। इस गीत को जबॉ उन्होंने मेरे गले से सुना तो गला पसंद आ गया उनको। गला ही काट लियाॉ मेरा। जिन्दगी भर के लिए उन्हीं का हो के रह गया मैं।

कर्पूरी ठाकुर।

कर्पूरी ठाकुर ने ही मुझको प्रोफेसर बनाया पटना में। जो कुछ काम किया वहीं किया। बताइए कहां मैं ब्राह्मण और कहां वो ठाकुर। किसी के यहां खा-पी नहीं सकता था मैं। उसको निभाते हुए इतना माना। मैं  कोई महापुरुष नहीं था। पर उनके साथ रहकर इतना जाना कि कवि की भी इज्जत होती है। कर्पूरी जी सारी जिन्दगी मुझे काफी मान-सम्मान देते रहे।

खैर, मुजफ्फरपुर को साहित्यिक ऊर्जा प्रदान करने वाला, साहित्य की नई पीढिय़ों को तराशकर पहचान दिलाने वाला और देश भर में उत्तर छायावाद के गढ़ के रूप में  बहुचर्चित निराला निकेतन के हिस्से में अब केवल अफसाने ही शेष रह गए हैं। क्योंकि महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री अपनी यादों के सहारे हमें छोड़कर बहुत दूर चले गए हैं। हवा जब-जब निराला निकेतन की माटी को छूकर खुशबू बिखेरती हुई इठलाती है, तब-तब आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की कही बातें, चेहरे के भाव, गीत और कविताएं हमारे बीच उनके जिंदा होने का एहसास दिलाती हैं।

कोई भी शहर, राज्य या देश वहां रहने वाले लोगों के होने से महान होता है। मुजफ्फरपुर में आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के होने का एक गंभीर मतलब था। सच-सच कहा जाए तो यह शहर उनसे था। उनके कारण जाना-पहचाना जाता रहा है। यहां की साहित्यिक लीची की मिठास अगर दूर देश के लोगों को भाती थी तो नि:संदेह आचार्यश्री के कारण। इस शहर ने भले ही उन्हें बहुत कुछ नहीं दिया हो, पर वे अपनी साहित्यिक पीढिय़ों के लिए बहुत कुछ छोड़ गए हैं। उनके संस्कारों में पल-बढ़ कर जवान हुआ यह शहर शायद ही कभी उन्हें भूल पाएगा।

एक ऐसा भी दौर रहा है जब आचार्य श्री की साहित्यिक गतिविधियां न सिर्फ फलक पर थीं, बल्कि महाप्राण निराला, पृथ्वीराज कपूर, उदय शंकर भट्ट, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेद्वी, आचार्य त्रिलोचन शास्त्री, कलम के जादूगर रामवृक्ष बेनीपुरी, क्रांतिकारी कवि रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन, आचार्य महाशंकर मिश्र, आचार्य जयकिशोर नारायण सिंह और नवगीत प्रवर्तक राजेन्द्र प्रसाद सिंह सरीखे दर्जनों कवि-साहित्यकार निराला निकेतन का आतिथ्य स्वीकार कर गर्व करते थे। इतना ही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, स्वर्गीय चंद्रशेखर, उप-राष्ट्रपति रहे स्वर्गीय भैरो सिंह शेखावत और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर भी निराला निकेतन में दस्तक दे चुके हैं। ये नेता कितने दीवाने थे। इसकी बानगी आचार्यश्री सुनाया करते थे।


प्रस्तुति- एम अखलाक। मुजफ्फरपुर के दैनिक जागरण में वरिष्ठ पद पर कार्यरत एम अखलाक कला-संस्कृति से गहरा जुड़ाव रखते हैं। वो लोक कलाकारों के साथ गांव-जवार के नाम से बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन चला रहे हैं। उनसे 09835092826 पर संपर्क किया जा सकता है।

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