पुष्यमित्र

दरभंगा में चुनाव चर्चा हो रही थी तो एक स्थानीय सीनियर पत्रकार मित्र ने बताया, चुनाव मधुबनी में हो रहा है। यहां चुनाव जैसा कुछ लग कहां रहा है। यह सच है कि शकील अहमद और फातमी जैसे इस इलाके के दिग्गज नेताओं ने दरभंगा और मधुबनी में चुनावी माहौल को सिर के बल खड़ा कर दिया है। झंझारपुर में यही काम देवेन्द्र यादव जैसे नेता कर रहे हैं। ये तीनों ऐसे महत्वपूर्ण नेता हैं जो अगर महागठबंधन के पक्ष में होते तो तीनों सीट पर नतीजा इनके पक्ष में जाता। तीनों कई बार सांसद रह चुके हैं। मगर अब महागठबंधन की कब्र खोद रहे हैं। यहां फिर से वही बात कहूंगा, महागठबंधन की आपसी फूट, उम्मीदवार चयन में गड़बड़ियों और खास कर तेजस्वी की अनुभवहीनता ने कई सीटें एनडीए को गिफ्ट कर दी है। ये तीन सीटें भी ऐसी ही मानी जा सकती हैं, खास कर मधुबनी और झंझारपुर की सीट।

कहते हैं, यह तय हो गया था कि दरभंगा से सिद्दिकी लड़ेंगे और मधुबनी से फातमी। दोनों की सीटें बदल दी गयी थी। मगर ऐन वक़्त में फातमी का टिकट कट गया, जो मिथिलांचल के कद्दावर नेता माने जाते हैं। खबर यह भी है कि जब यह सीट वीआइपी पार्टी को दे दी गयी और मुकेश साहनी ने इस सीट को बेचना शुरू कर दिया तो फातमी ने उन्हें भी दो या ढाई करोड़ का ऑफ़र दिया, मगर साहनी ने यह सीट कुछ अधिक पैसे लेकर फातमी के ही चेले बद्री पूर्वे को दे दिया। तेजस्वी पूरे प्रकरण में पहले मौन रहे फिर फातमी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी देने लगे। ऐसे में फातमी को अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बचाने के लिये उतरना ही पड़ा। अब बसपा ने उन्हें सिम्बल भी दे दिया है। दिलचस्प है कि कांग्रेस के शकील अहमद भी मैदान में उतर गये हैं और फातमी कहते हैं कि अगर अभी भी शकील अहमद को टिकट मिल जाये तो वे नाम वापस ले लेंगे।

उसी तरह इस इलाके में कभी समाजवाद के स्तम्भ रहे देवेन्द्र यादव जैसे नेता भी इस बार झंझारपुर से निर्दलीय खड़े हैं, उनकी पढ़े लिखे समझदार नेता की छवि है। मगर राजद से वहां के उम्मीदवार गुलाब यादव हैं, जो दबंग हैं और रेप के आरोपी हैं। झंझारपुर के राजद के पुराने नेता मंगनी लाल मंडल भी बागी होकर जदयू के हो गये हैं।इन तीनों सीटों पर राजद के महत्वपूर्ण और अनुभवी नेता पार्टी छोड़कर मैदान में हैं यह बताता है कि पार्टी से टिकट बांटने में बड़ी चूक हुई है। नहीं तो इतने बागी नहीं होते। फातमी दरभंगा में भी सिद्दीकी का खेल खराब कर सकते हैं। क्या राजद को इसकी खबर नहीं। दुखी तो एनडीए के नीतीश मिश्रा, संजय झा, बिरेन्द्र कुमार चौधरी भी हैं, मगर वे बागी नहीं हुए हैं।

कहा जा रहा है कि यह सब लालू परिवार के लिये अभिभावक तुल्य भोला यादव के कहने पर किया गया है। वे इसी इलाके के रहने वाले हैं। कहते यह भी हैं कि गुलाब यादव और भोला यादव को लगता है, जब तक फातमी मजबूत रहेंगे, उनकी दाल इस इलाके में नहीं गलेगी। तो इस दाल गलाने के चक्कर महागठबंधन की साख गल रही है।