आदमी को आदमी बनाने के लिए आंखों वाला पानी चाहिए

आदमी को आदमी बनाने के लिए आंखों वाला पानी चाहिए

चंदन शर्मा

हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं? जहां प्‍यार के लिए कोई जगह नहीं हो, जहां बस नफरत और हिंसा का पाठ पढ़ाया जाए। हम किसी प्रेमी जोड़े को देखते हैं, तो मोरल पुलिसिंग पर उतर आते हैं। अगर कोई मोहब्‍बत को शादी का अंजाम देना चाहे तो इज्‍जत पर आन पड़ती है। साल शुरू हुए एक हफ्ता भी नहीं गुजरा है, प्रेम विवाह में दर्जनों हत्‍या की खबरें सामने आ चुकी है। बिहार के मुजफ्फरपुर के बंदरा ब्‍लॉक में प्रेम विवाह के 15 दिन बाद लड़के की लाश पेड़ पर लटकी मिली। स्थिति कितनी भयावह है, चंदन शर्मा की इस रिपोर्ट से समझिए, जिसे उन्‍होंने फेसबुक पर साझा किया है।

एक जनवरी 2017 की सुबह सामान्‍य दिनों की तरह न्‍यूजपेपर उठाया। खबरें तो कई थीं, अच्‍छी भी, बुरी भी, मगर दो खबरों ने दुखी कर दिया। यथार्थवादी होने के बावजूद पहली तारीख को पोस्‍ट नहीं कर पाया। पहली खबर हाजीपुर से थी। गांधी सेतु पुल के पाया नंबर 56-57 के आस-पास दो जने बस से उतरते हैं। युवक 35-36 का रहा होगा, युवती 30 की। मौके पर कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही दोनों एक दूसरे को गले लगाते हैं और गंगा में कूद जाते हैं। प्रशासनिक सरकारी औपचारिकताओं के घंटे भर बाद गोताखोर बुलाए जाते है, नतीजा स‍िफ़र। 

दूसरी खबर मुजफ्फरपुर से थी। इंटर और मैट्रिक के छात्र-छात्रा ने अलग-अलग जगह पर जहर खा लिया था, जिसे इलाज के लिए एसकेएमसीएच पहुंचाया गया था। दोनों खबरें अंदर के पन्‍ने पर कहीं छोटी सी लगी थी। एक दिन पहले ही वैशाली में कोर्ट मैरिज कर रहे एक कपल को घर से निकाल कर पीटा और घर में आग लगा दी गई। सच तो यही है कि न्‍यूजरूम में शायद ही कोई दिन हो जब ऐसी खबरें न आती हो। कहीं प्रेमी युगल के जहर खाने की तो कहीं बेरहमी से मार कर फेंक देने की। कोई सप्‍ताह खाली नहीं जाता, जब उत्‍तर बिहार के किसी जिले में युवक-युवती को मार कर गांव के बाहर पेड़ पर न लटकाया गया हो। 21वीं सदी में भी हमने न जाने कैसा भारत बनाया है कि प्‍यार करना अब भी गुनाह ही माना जाता है।

प्‍यार करनेवाले अपनी तमाम इच्‍छाओं को दफन कर लें या खुद मौत को गले लगा लें। नहीं तो समाज के ठेकेदार या परिवार वाले इज्‍जत के नाम पर मार कर कहीं फेंक देंगे। अधिकतर मामले में कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं होगी, अगर हुई तो कोई गवाह नहीं मिलेगा। ऐसे मामले में कहीं और हत्‍या कर कहीं दूर लाश फेंक देना भी दुर्भाग्‍य से ट्रेंड हो गया है। न कोई गुमशुदगी की एफआईआर, पहचान अज्ञात मान कर केस बंद। प्‍यार चाहनेवाले, प्‍यार खोजनेवाले, प्‍यार देनेवाले, प्‍यार करनेवालों का अंत कर ही तो देश-समाज की तरक्‍की होनी है।

बर्बरता के मामले में हम पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश और अरब का उदाहरण पेश करते हैं। हम कहां बदल पाए हैं? जाति-रोटी की दीवार क्‍या टूट पाई है?  इन सवालों पर तमाम बुद्धिजीवी चुप्‍पी मार जाते हैं। आदर्श की बात करना बहुत अासान है। कहने में कोई हिचक नहीं कि इस मामले में दक्षिणपंथियों की सोच भी वही होती है जो वामपंथियों की होती है। विडंबना है कि, प्‍यार की हत्‍या करने में कोई धर्म, कोई क्षेत्र अपवाद नहीं है, पूरा देश एक है। किसी परवाह है, गोपालदास नीरज की पंक्तियों की-

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आंखों वाला पानी चाहिए


chandan sharma profile

चंदन शर्मा। धनबाद के निवासी चंदन शर्मा ने कई शहरों में घूम-घूमकर जनता का दर्द समझा और उसे जुबान दी। दैनिक हिंदुस्तान, प्रभात खबर, दैनिक भास्कर, जागरण समूह और राजस्थान पत्रिका में वरिष्ठ संपादकीय भूमिका में रहे। समाज में बदलाव को लेकर फिक्रमंद।

3 thoughts on “आदमी को आदमी बनाने के लिए आंखों वाला पानी चाहिए

  1. यह रिपोर्ट उद्वेलित तो करती ही है ,संवेदनशील लोगों के लिए इस मुद्दे पर गंभीरता से सोंचने और एक नये समाज के निर्माण के लिए भी प्रेरित करने वाली है ।एक ऐसा समाज जहां मनुष्य को वस्तु के रूप में नही , मनुष्य के रूप मे ही देखा और समझा जा सके ।कैसे हो पाएगा यह सब ?हम जिस अर्थ व्यवस्था वाले समाज मे सांस ले रहे हैं ,वह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है ।यह काफी पहलेअपना प्रगतिशील चरित्र खो चुका है ःऐसा स्वभाविक ही है ।जो पैदा लेता है उसका अंत भी होता ही है ।यही हाल इस व्यवस्था का भी है।मान -प्रतिष्ठा ,इज्जत-अस्मत ,रिश्ते-नाते सब बिकाऊ हो गये हैं।संस्कृति और नैतिक पतन का पूरा सरंजाम मौजूद है ।सबकी आंखों का पानी सूख गया है ।नारी जननी ,भगिनी ,दुहिता और दारा न हो कर मात्र भोग्या बना दी गयी है इस मरनासन्न पूंजीवाद द्वारा ।इससे मुक्ति के लिए ,जाति , सम्प्रदाय , धर्म और लिंग का भेद किए बिना सम्पूरण मनुष्य जाति के सम्मान के लिए पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष जरूरी है ।

    1. शुक्रिया…आप सही कह रहे हैं।

  2. अच्छी रपट। उत्तर आधुनिकता का दम्भ भरते समाज व दुनिया के लिए ऐसी घटनाओं का घटित होना चिंताजनक है। कुल मिलाकार अब भी हम मध्ययुगीन समाज के फ्रेम को नहीं तोड़ पाये है।

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