कुमार प्रशांत

‘मीटू’ अब महज एक शब्दभर नहीं है, एक नया सहचारी भाव हमारे जमाने में दाखिल हुआ है। इसका मतलब यही नहीं है कि लड़कियां आगे आकर बताएं कि कब, कहां, कैसे, किसने उनका यौनशोषण किया।
मीटू का यह भी अर्थ है कि हम पुरुष आगे आकर कहें कि अपनी नासमझी में, शक्ति के अपने उन्माद में, लड़कियों का सही मतलब नहीं समझने और मर्द होने का गलत मतलब समझने के कारण आज या कल या बीस बरस पहले मैंने ऐसी गर्हित हरकत की थी, जिसकी माफी मांगने और उसकी सजा भुगतने के लिए मैं सामने आता हूं। यह हुआ मीटू का पूरा सांस्कृतिक मतलब। यह चूंकि पश्चिम से चलकर हमारे यहां आया है इसलिए इतना एकांगी और सपाट बना दिया गया है। इसे पुरुषों की पहल से परिपूर्ण कर हम पश्चिम को वापस भेजें, तो उन्हें भारतीय संदर्भ की समझ होगी।
बीते दिनों मोदी सरकार के उस मंत्री का इस्तीफा हो गया, जिसका निष्कासन होना चाहिए था। जो काम जब और जिस तरह होना चाहिए, वह तभी और उसी तरह नहीं होता है, तो वह अर्थहीन भी हो जाता है। विदेश राज्यमंत्री मुबश्शिर जावेद अकबर (एमजे अकबर) का मामला जिस वक्त फूटा और उसे गंधाने के लिए जिस तरह छोड़ दिया गया, चालबाजियों में लपेटकर जिस तरह उसका बचाव करने की कोशिश की गयी, जिस तरह अकबर के विदेश में होने का बहाना बनाया गया और देर से स्वदेश लौटते ही जिस तरह और जिस तेवर से अकबर ने अपनी सहकर्मी रहीं महिलाओं पर जुबानी हमला किया, जरा कोई बताये कि उससे किसे क्या हासिल हुआ?  क्या प्रधानमंत्री की निजी और सरकारी छवि में रत्तीभर नैतिक इजाफा हुआ? क्या अकबर की अपनी छवि थोड़ी भी धुल सकी? क्या सत्ता के ऊंचे आसनों पर किसी संयोगवश पहुंच गये लोगों को यह सारा प्रकरण थोड़ा भी सावधान कर सका? क्या किसी में भी पश्चाताप का कोई भाव, किसी स्तर पर भी जागा? चालाकी का यह दांव इस बार सफल नहीं हो सका, तो अगली बार ज्यादा चालाकी और काइयांपने से काम करेंगे, यही भाव सर्वत्र बना। विदेश में कायर चुप्पी साधे और यहां पहुंचते ही दहाड़ती धमकी देते अकबर को जैसे ही संकेत मिला कि अब उनका सरकारी कवच वापस लिया जा रहा है, वे भीगी बिल्ली की तरह गायब हो गये। क्या इससे अकबर की शान बढ़ी?
हम इसी तस्वीर का रुख जरा बदलकर देखें। जैसे ही अकबर पर यह आरोप लगा, वहीं विदेश से ही अकबर ने कहा होता कि मैं अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री को भेजता हूं (क्योंकि वे जानते थे औक जानते हैं कि जो कुछ कहा जा रहा है, वह सही है- भले वे उसे तब भी और अब भी गलत न मानते हों) और प्रधानमंत्री कहते कि अकबर भारत के कूटनीतिक प्रतिनिधि बनकर विदेश गये हैं, सो हम उन्हें तत्काल प्रभाव से बर्खास्त नहीं करते हैं, लेकिन भारत की धरती पर पांव रखते ही वे मंत्री नहीं रह जायेंगे, तो क्या संदेश जाता?  अचानक ही संबंधों का यह जो बदबूदार परनाला बहा दिया गया है, वह सहम जाता। दूसरे सारे बेपर्दा अपराधी सर झुकाकर पीछे हट जाते और ‘मीटू’ की ताकत स्थापित हो जाती। गैरतहीन राजनीति का यह जो दौर देश में चलाया गया है, उसे धक्का लगता औ मोदी सरकार के सारे विवेकशून्य भोंपू ठिठक जाते। राजनीतिक, आर्थिक, लोकप्रियता आदि की शक्ति से मत्त हुई यह भीड़ सहम जाती, लेकिन, जब राजनीति ‘उमा भारती ब्रांड’ हो कि जो सार्वजनिक तौर पर पूछ सकने की निर्लज्जता रखती हो कि यौनशोषण जब किया था अकबर ने, तब वे मंत्री थोड़े ही थे कि आज हम उन्हें उसकी सजा दें, तो फिर जो हुआ वही ठीक हुआ।

ऐसे में हमें समझना यह है कि गलत क्या है? क्या स्त्री-पुरुष के बीच का आकर्षण गलत है?  क्या किसी के लिए मन में प्यार का उमड़ना गलत है? आकर्षण में फिसल जाना भी स्वाभाविक नहीं है क्या? फिसलन किसकी तरफ से हुई, यह फिसलनेवालों के बीच का मामला है, हमारे लिए यह जानना काफी होना चाहिए कि फिसलन हुई। फिसलनेवाले को हाथ बढ़ाकर उठाते हैं, न कि गड्ढे में ढकेलते हैं। जो ढकेले वह समाज नहीं है, विवेकहीन भीड़ है। दो वयस्क स्त्री-पुरुष या दो वयस्क स्त्रियां या पुरुष आपसी सहमति व रजामंदी से, निजी जीवन में जो भी रिश्ता बनाते व चलाते हैं, उसमें दखल देने का अधिकार किसी का भी नहीं है।  धारा 497 को समाप्त करते हुए अदालत ने भी तो यही कहा न कि यह अधिकार उसका भी नहीं है। यह सारी बात पलट जाती है, जब इसमें जबर्दस्ती का तत्व जुड़ जाता है। फिर वह जबर्दस्ती तख्त की हो कि तिजोरी की, या तलवार की। नाना पाटेकर या ऐसे ही दूसरे सब नानाओ को लगता है कि वे लोकप्रियता से मिली अपनी ताकत को तलवार बना लें और फिर जो चाहें करें। फिल्मी दुनिया तो टिकी ही इसी खोखली ताकत के सहारे है न। आपसी सहमति व इकरार से जिये जा रहे जीवन में कुछ भी अनैतिक नहीं होता है।

अगर उसमें कुछ भी अनैतिक या असभ्य या अमानवीय हुआ, तो वह दोनों में से किसी को, कभी भी नीचे गिराता हुआ, अपमानित करता हुआ लगेगा ही और उसी दिन उस अस्वस्थ रिश्ते का अंत हो जायेगा। मीटू अगर स्त्री और पुरुष में इतना विवेक जगाता हो, तो तमाम अकबरों को हम शहीद का दर्जा दे देंगे।


कुमार प्रशांत/जयप्रकाश नारायण के अनन्य सहयोगी रह चुके हैं, गांधीजी के विचारों की गहरी छाप है । गांंधीवादी विचारक और लेखक होने के साथ गांधी-मार्ग पत्रिका के सम्पादक की भूमिका भी निभा रहे हैं। संप्रति गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष । 

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