फाइल फोटो

पुष्यमित्र

इन दिनों 2008 की कोसी बाढ़ के इलाके में घूम रहा हूं। यह इलाका नेपाल से सटा है और भीमनगर बराज के भी पास है। 2008 की बाढ़ के वक़्त इस इलाके में खूब घूमता था। यहीं एक बस्ती है दुअनिया, उसी बस्ती में एक किसान परिवार के दरवाजे पर लगभग एक महीने रहा था। लगभग कमर भर पानी पार करके उस बस्ती में मैं और रुपेश भाई पहुँचे थे। उसके बाद हमारे ही सम्पर्क से गूंज की टीम भी यहां पहुँची थी और उन्होंने कोसी में रिलीफ की पहली खेप का वितरण किया था। अंशु गुप्ता भी आये थे। उसके बाद गूंज की टीम इस इलाके में रह ही गयी, आज भी मजबूती से है। हमलोग दुअनिया के बाद प्रतापगंज गये और फिर लौट गये। दुर्भाग्यवश मुझे उस किसान का नाम याद नहीं जिसके दरवाजे पर एक महीने रहा था, रुपेश भाई को शायद याद हो।

इन दिनों जहां भी जाता हूं और जिनसे भी पूछता हूं, वे यही कहते हैं कि 1954 के बाद 2008 में ही इतनी भयावह बाढ़ आई। चूंकि ज्यादातर बुजुर्गों से ही मिलना जुलना हो रहा है, इसलिये उन्हें 1954 की बाढ़ अच्छी तरह याद है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि 1954 की बाढ़ भी इतनी भयावह नहीं थी। वैसे आज भी इस इलाके में छोटी छोटी बाढ़ आती है, खेतों में धारों का पानी भर जाता है। मगर इन्हें वे बाढ़ में नहीं गिनते। क्योंकि इनसे उन्हें लाभ ही होता है। 2008 की बाढ़ ने जिन खेतों में बालू भर दिया था, उनमें पांक की आमद होती है।वे कहते हैं, 1954 के बाद जब बराज और बांध बन गया तो वे बाढ़ को भूल ही गये थे। हालांकि इस बीच कई दफा तटबंध टूटा मगर कोसी का पानी इस इलाके में नहीं आया। मगर 2008 तो प्रलय था, उस बाढ़ ने उन्हें सुनामी जैसा अनुभव दिया। 11 साल बाद भी वे उस आतंक से उबरे नहीं हैं। उनके खेतों में अब तक जमा बालू उन्हें हमेशा 2008 की याद दिलाता है। हालांकि उसके बाद से कोसी का पानी इस इलाके में नहीं आया है, फिर भी हर साल सावन भादो में वे सहमे और सतर्क रहते हैं। 2013 में नेपाल के सिन्धुपाल चौक के पास लैंड स्लाइड से कोसी का पानी रुक गया था। तब भी 2008 जैसी आपदा की आशंका जताई गयी थी। तब भी यह इलाका खाली होने लगा था। हर साल अभी भी लोग बाढ़ से मुकाबले की तैयारी करते हैं। आश्रय गृह तलाशते हैं और अनाज और भूसा जमा करते हैं। यह जमा अनाज और भूसा जब अपने काम नहीं आता तो वे इसे दूसरे बाढ़ प्रभावित इलाकों में भेज देते हैं, जहां बाढ़ आई होती है।

दिलचस्प है कि हमारा जल संसाधन विभाग इस इलाके को अभी भी बाढ़ के खतरे वाला इलाका नहीं मानता। यहां नक्शा देखिये। वह शायद यह साबित करना चाहता है कि बराज और कोसी बांध की वजह से यह इलाका बाढ़ के खतरे से बाहर है। मगर सच्चाई यह है कि इन इलाकों पर बाढ़ का खतरा अधिक है। कल सिमरी के इलाके में घूम रहा था, देखा कोसी नदी बिल्कुल तटबंध से सट कर बह रही है। तटबंध जो टू लेन सड़क में बदल गया है, उसे बचाने की कोशिश शुरू हो गयी है। मगर नदी को कब तक बांध कर रखेंगे। शुक्र की बात यह है कि इस इलाके के लोगों ने। खास कर बुजुर्गों ने इस खतरे से लड़ना सीख लिया है। अभी इनसे ही मिलना जुलना हो रहा है।

पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। प्रभात खबर की संपादकीय टीम से इस्तीफा देकर इन दिनों बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता  करने में मशगुल