ब्रह्मानंद ठाकुर

आजादी से 70 साल बाद हिंदुस्तान का अन्नदाता बदहाल है, देश का पेट भरने वाला किसान खुदकुशी को मजबूर है, फिर भी 7 दशक से हमारी सरकारें किसानों के हितों की रक्षा के लिए कोई कारगर उपाय नहीं तलाश सकीं । ये अलग बात है कि किसानों के नाम पर लूट-खसोट खूब हुई । कभी कर्जमाफी के नाम पर तो कभी फसल बीमा का लालीपॉप दिखाकर किसानों का हितैषी बनने का खेल खेला गया, लेकिन हकीकत में किसानों की दशा और दिशा बदलने की ईमानदार कोशिश शायद ही कभी की गई, लिहाजा किसानों को अब अपने हक की लड़ाई खुद लड़नी होगी। ठीक उसी तरह जैसे 1917 में रूस में किसान और मजदूर संगठन एकजुट होकर जारशाही को उखाड़ फेंकने में सफल हुए उसी तरह हिंदुस्तान में किसानों को एकजुटता दिखाने की जरूरत है और इसकी शुरुआत भी हो चुकी है।
पिछले दिनों अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले देश के किसानों ने दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर संसद मार्ग तक विरोध मार्च निकाला। किसानों का यह आंदोलन देश के 184 किसान संगठनों की ओर से चलाया जा रहा है, जिसमें विभिन्न दल और विचारधारा के लोग शामिल हैं। इनकी मुख्य मांगों में कृषि उत्पादों की लागत का सही आकलन कर पूर्ण लाभकारी कीमत पाने का कानूनी अधिकार देने, उत्पादन लागत पर कम से कम 50 प्रतिशत मुनाफा जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने और व्यापक कर्ज माफी के साथ कर्ज से आजादी की मांग शामिल है। आजादी के बाद देश के इतिहास में यह पहला अवसर है जब देश भर के विभिन्न किसान संगठनों ने एकजुट होकर अपने हक की आवाज बुलंद की है। किसान आंदोलन में अहम भूमिका निभा रहे योगेंद्र यादव ने कहा है कि ये पहली बार हो रहा है जब देश के हर कोने से और हर विचारधारा के किसान एक मंच पर आए हैं और ये बदलाव का बड़ा संकेत है ।

अब ये किसान आंदोलन की रणनीति का हिस्सा है या एक संयोग क्योंकि रूस में नवंबर क्रांति ने वहां के किसानों और मजदूरों की दशा और दिशा बदल दी थी और हिंदुस्तान में शुरू हुआ किसान और मजदूरों का ये आंदोलन भी नवंबर महीने में ही शुरू हुआ है ।

किसान संसद में महाराष्ट्र से आए एक युवा किसान पूजा मोरे ने कहा कि उनकी यह लडाई सरकार बदलने की नहीं, व्यवस्था बदलने की लड़ाई है। जाहिर है हमारे देश के किसान देर से ही सही, पूंजीवादी व्यवस्था और कृषि विरोधी चरित्र को समझने लगे हैं। वे यह भी समझ चुके हैं कि पूंजीपतियों और कारपोरेट्स की हितैषी सरकारें किसानों की समस्याओं का स्थाई निदान नहीं करने वाली हैं। मुंशी प्रेमचंद का प्रसिद्ध उपन्यास गोदान तो भारतीय किसान की दारुण गाथा ही है। कमोवेश नवंबर क्रांति से पहले रूस में किसानों की हालत ऐसी ही थी ।
सोवियत रूस में नवंबर क्रांति से पूर्व जारशाही के लम्बे शासन के दौरान किसानों की स्थिति काफी दयनीय थी। बड़े भूस्वामी, सामंत और जमींदार किसानों का शोषण करते थे। किसानों को जमीन का मालिकाना हक नहीं था। उनकी तमाम उपज सामंत और जमींदारों की भेंट चढ़ जाती थी। किसानों को न साल भर दो जून भोजन मयस्सर हो पाता था न तन पर वस्त्र। उनके बच्चों के लिए शिक्षा की बात तो बेमानी ही थी।

नवम्बर क्रांति के बाद सोवियत संघ में जिस तरह से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन हुए, उससे प्रेमचंद और विश्व कवि रविंद्र नाठ टैगोर काफी प्रभावित थे। इसका उल्लेख भी उनकी रचनाओं में भी मिलता है। जारशाही के पतन के बाद नवगठित समाजवादी सोवियत संघ की कृषि और किसान की बदली दशा उल्लेख विश्वकवि रवि बाबू ने ‘रूस से पत्र’ नामक अपने एक आलेख में किया है। यह पत्र उन्होंने मास्को से 20 सितम्बर 1930 को लिखा था।

वे लिखते हैं, समाजवादी क्रांति से पूर्व रूस में तरह तरह के किसान थे। कुछ गरीबी और भुखमरी में रहते थे और कुछ ऐसे भी थे जो अमीर बन जाते थे। प्रत्येक गांव में बहुत सारे खेतिहर मजदूर थे, बहुत से कंगाल किसान थे तो उनके साथ धनी किसान भी थे जो खेत मजदूरों से काम करवाते और जमीन खरीदते थे। कई वर्षों के लिए पट्टे पर जमीन लेते और बडे भूखंड महंगे किराए पर गरीब किसानों को खेती करने के लिए देते थे (आज यह स्थिति आजादी के 70 साल बाद अपने देश में बनी हुई है )। गरीब किसान बेबसी में अपनी जमीन छोड़ने को मजबूर थे क्योंकि उनके पास खेती करने का साधन नहीं था। रूस के कुल किसानों का दो तिहाई ऐसे ही गरीब किसान थे। नवम्बर क्रांति के बाद द्वितीय पंचवर्षीय योजना पूरी होते-होते सोवियत संघ में कृषि और किसानों का कायापलट हो गया। सामूहिक फार्म प्रणाली अपनाए जाने के बाद 1937 में किसानों के पास 91 करोड़ एकड से ज्यादा जमीन हो गई। राजकीय फार्मों के पास 17 करोड़ एकड कृषि भूमि थी। कुलक और जमीदारों से जमीने छीन ली गई। मशीन, ट्रैक्टर एवं अन्य यंत्रों से खेती शुरू हुई । किसानों को इन मशीनों के चलाने और रख-रखाव का प्रशिक्षण दिया गया। पशुपालन में भी उन्नत तकनीक अपनाई गयी। इस तरह वहां उत्पादन में आशातीत वृद्धि दर्ज की गई । यही नहीं रूस ने वितरण की समस्या के समाधान का भी नायाब तरीका निकाला। राज्य की देनदारी चुकाने और सामाजिक कोश में अंशदान चुकाने के बाद शेष बचे उत्पादन या आमदनी को सामूहिक फार्म द्वारा कार्यदिवस के हिसाब से सहकारी संघ के सदस्यों के बीच बांट दिया जाता था। सामूहिक फार्म के किसानों की आमदनी उनके कार्य दिवस के अनुपात में होती थी। इस पर किसी तरह का टैक्स नहीं था। सामूहिक फार्म प्रणाली के आधार पर सोवियत संघ के गांव-देहात की तस्वीर बदल गई थी। सामूहिक फार्म की आमदनी 1933 में 57 लाख रुबल से बढ़ कर 1940 में 2 करोड 7 लाख रुबल और 1953 में 4 करोड़ 96 लाख रुबल तथा 1954 में 6 करोब 33 लाख रुबल हो गई थी। इसके अतिरिक्त वहां के किसान अपने घर के निकट पूरक खेत से नकद आमदनी प्राप्त करते थे। सामूहिक फार्म और व्यक्तिगत जोत से प्राप्त आय से किसान सरकारी और सहकारी दुकानों से निश्चित कीमत पर अपने व्यक्तिगत उपयोग के सामान खरीदते थे जिसका मूल्य भी क्रमश: घटता जाता था। महंगाई का नामोनिशान तक नहीं था। सामूहिक फार्म प्रणाली ने वहां के गांवों की तस्वीर और तकदीर ही बदल डाली। वहां के किसान अब नये युग के किसान बन चुके थे।

आजादी के 70 सालों बाद हम जब भारत के गावों, किसानों, खेतिहर मजदूरों और बेरोजगार युवाओं की ओर नजर डालते हैं तो स्थिति बड़ी दारुण दिखाई देती है। खेती-किसानी घाटे का व्यवसाय बन चुकी है। किसानों को उनके उत्पाद का लाभकारी मूल्य नहीं मिलता। न्यूनतम समर्थन मूल्य इनके लिए धोखा है। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश जिसमें कृषि की उपज के लागत में 50 प्रतिशत जोड़ कर मूल्य निर्धारण की अनुशंसा की गई है, आज तक वह रिपोर्ट ठंडे वस्ते में है। फसल बीमा योजना से किसान के बदले बीमा एजेन्सियां लाभान्वित हो रहीं है। कर्ज के बोझ से दबे किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहें हैं। बड़ी तायदाद में गरीब किसान-मजदूरों के बच्चों को शिक्षा से वंचित कर उनके भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। इस पूंजीवादी साम्राज्यवादी लोकतंत्र की सरकारें इनकी जायज मांग को भी अनसुनी करती रही हैं। ऐसे में दिल्ली में आयोजित देश भर के किसानों के किसान संसद के दौरान महाराष्ट्र के युवा किसान पूजा मोरे का यह कथन कि यह आन्दोलन सरकार बदलने का नहीं, व्यवस्था बदलने का आंदोलन है, काफी मायने रखता है। जरूरत है किसान मुक्ति आंदोलन को उस अंतिम मुकाम तक पहुंचाने की जहां शोषण,उत्पीडन की कोई गुंजाइश ही न रहे। इसके लिए सतत समझौता रहित संघर्ष जारी रखना होगा।


ब्रह्मानंद ठाकुर। BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।