अरुण यादव

कृषि उन्नति मेला 16 से 18 मार्च पूषा कृषि अनुसंधान केंद्र में आयोजित हुआ

पिछला हफ्ता देश के किसानों के लिए काफी अहम रहा। एक तरफ महाराष्ट्र में किसानों की एकता के आगे सरकार को झुकना पड़ा तो वहीं दिल्ली में अन्नदाता को सक्षम बनाने के लिए मेला लगा यानी किसान उन्नति मेला। मैंने सोचा चलो हम भी चलते हैं किसानों की उन्नति का मेला देखते हैं। मेट्रो की मदद से राजेंद्र प्लेस पहुंचा और फिर मेला ग्राउंड जाने के लिए पैदल निकला। पूषा कृषि अनुसंधान केंद्र के गेट पर पहुंचा तो सोचा सरकार ने कुछ खास इंतजाम किए होंगे, जिससे यहां आने वाले किसानों को मेला ग्राउंड तक पहुंचने में आसानी हो, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था।

मेन गेट से मेला ग्राउंड की दूरी तकरीबन 3 किलोमीटर थी । लिहाजा अब हमारे पास दो रास्ते थे या तो पैदल मेला ग्राउंड पहुंचता या फिर ऑटो करता, पैदल जाने में वक्त लगता और थकान लगती सो अलग। मेला भी घूमना था लिहाजा पैदल चलने का विकल्प छोड़ ऑटो तलाशने लगा। तभी एक ऑटो वाला आया और उसको हाथ देकर मेला ग्राउंड चलने की बात कही। ऑटो में पहले से एक सवारी बैठी थी, फिर भी ऑटो वाले ने कहा मैं वहीं जा रहा  हूं, मैंने पूछा भैया कितना पैसा लोगे, ऑटो वाले ने पहले 60 रुपये बोला, लेकिन मैंने मना कर दिया, दो मीटर आगे बढ़कर ऑटो वाले ने फिर मुझसे कहा 50 रुपये फिर 40 रुपये आखिर में उसने पीछे बैठी सवारी को नजर अंदाज करते हुए तीन उंगली दिखाई तो मैं भी सोचा चला तीन किलोमीटर के लिए 30 रुपये बुरा नहीं।

मेन गेट से अंदर दाखिल होते ही बायी तरफ रजिस्ट्रेशन काउंटर बना था। मुझे लगा यहां रजिस्ट्रेशन कराना होगा, लिहाजा मैं स्टॉल पर पहुंचा और पूछा भाई मेला घूमना है क्या करना होगा। उसने तपाक से एक विजिटर कार्ड और एक पट्टा मेरी तरफ बढ़ा दिया। ना कोई एंट्री और ना ही कोई कॉन्टैक्ट डिटेल्स दर्ज किए गए। बड़े-बड़े पंडाल सड़क के दोनों ओर बने थे और बीच में ग्रान कारपेट किसानों के लिए बिछा था। सोचा कहां से शुरुआत की जाए। सामने पूसा की ओर से लगे पंडाल में घुसा तो वहां पूसा के वैज्ञानिकों की ओर से शोध कर तैयार किए गए बीज और उनके उत्पादों को बेहतरीन तरीके से सजाया गया था। एक अच्छी बात ये दिखी कि कृषि वैज्ञानिक और स्टॉल पर मौजूद कर्मचारियों का व्यवहार किसानों के साथ बेहद ही दोस्ताना था। आखिर यही मौका होता है जब ये वैज्ञानिक सीधे किसानों से मिल पाते हैं। अलग-अलग हॉल में अलग-अलग विषय पर किसानों को कृषि वैज्ञानिक आमदनी बढ़ाने के बारे में बता रहे थे तो वहीं सफल किसानों को भी मंच पर जगह दी गई थी, जिससे किसान खुद दूसरे किसानों को अपने अनुभव से प्रेरित कर सके ।

एक पंडाल में कृषि वैज्ञानिकों की मौजूदगी में प्रधानमंत्री फसल बीमा से लेकर बीजों की नई प्रजातियों के बारे में बताया जा रहा था।तभी दिल्ली के बाहर से आए एक बजुर्ग किसान खड़े हुए और उन्होंने सवाल किया कि आखिर आप लोग कोई बीज पर रिसर्च करते हैं तो आखिर उसके पीछे क्या सोच होती है उसका आधार क्या होता है। कृषि वैज्ञानिकों ने किसान के सवाल को ये कहते हुए टाल दिया कि इस विषय पर दूसरे हॉल में चर्चा हो रही है लिहाजा आपको वहां इसका समाधान मिलेगा। किसान के सवाल से एक बात तो साफ हो गई कि हमें ये समझना होगा कि हमारी सरकारें जो योजनाएं किसानों के लिए बनाती हैं उसमें आम किसानों की कितनी भागीदारी या राय ली जाती है।

घूमते हुए करीब 2 घंटे बीत चुके थे। वॉशरूम के बारे में पूछा तो गार्ड ने सामने की ओर इशारा किया। वहां जैसे ही पहुंचा तो अपलक नेत्र से टॉयलेट को निहारता रहा। बाथरूम के बाहर बना वाशबेसिन किसी मॉल या रेस्टोटेंट से कहीं बेहतर नजर आया। बड़े-बड़े ग्लास और सफेद रंग का चमचमाता वॉश बेसिन। कुछ पल उसे निहारने के बाद अंदर घुसा तो वहां का नजारा देख बिल्कुल अलग एहसास हो रहा था। एक पल के लिए मैं सोच में पड़ गया कि क्या ये सब किसानों के लिए है ? अगर किसानों के लिए है तो फिर इतना विरोधाभास क्यों? इन्हीं किसानों के लिए सरकार महज 12 से 17 हजार रुपये में गांव में टॉयलेट का निर्माण कराती है और यहां का नजारा देख ऐसा लग रहा था जैसे लाखों खर्च किया गया हो।

थोड़ी दूर आगे बढ़ा तो एक पंडाल में VIP गैलरी नजर आई। मैं फिर सोच में पड़ गया कि किसानों के मेले में वीआईपी लॉन्ज की क्या जरूरत। एक तरफ हम वीआईपी कल्चर को खत्म करने की बात कर रहे हैं दूसरी तरफ हमारा सिस्टम वीआईपी कल्चर को छोड़ना नहीं चाहता। हो सकता है मैं गलत हूं लेकिन सवाल ये है कि जब लाखों रुपये के चमचमाते टॉयलेट बनवाये जा सकते हैं, आयोजन पर भारी भरकम खर्च किया जा सकता है तो फिर किसानों को मेला ग्राउंड तक पहुंचने के लिए कोई खास इंतजाम क्यों नहीं किया जाता। क्यों देशभर से आए किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।

देशभर से किसान ये सोचकर यहां आते हैं कि उन्हें ऐसे आयोजनों से काफी कुछ सीखने को मिलेगा। ऐसे में उन्हें सुविधाएं आलीशान नहीं बल्कि जरूरत के हिसाब से चाहिए होती हैं। आपको एक उदाहरण देता हूं। मैं जौनपुर का रहने वाला हूं। मेरे जिले से करीब 85 किसानों का समूह दिल्ली में किसान मेला देखने आया। इन लोगों ने बाकायदा यूपी सरकार के मंत्री से लेटर लिखवाकर ट्रेन का कोच बुक करने की अर्जी दी लेकिन हुआ कुछ नहीं। आखिर में उनको दो बस करनी पड़ी, जिसमें समय और पैसा दोनों की बर्बादी हुई। हालांकि किसानों को दिल्ली लाने का जिम्मा कृषि विभाग ने एक किसान मंच के साथ मिलकर उठाया था। जाहिर है सरकार की तरफ से कुछ बजट भी आया होगा । अगर बस की बजाय ये किसान ट्रेन से आते तो शायद पैसे और समय दोनों की बचत की जा सकती थी, लेकिन सरकारी मशीनरी की उदासीनता की वजह से ऐसा हो ना सका।

वहीं किसानों के सामने दूसरी समस्या आई दिल्ली में एक दिन ठहरने के इंतजाम की। टीम बदलाव ने जौनपुर से इन किसानों को दिल्ली में रुकवाने के लिए उड़ान एसोसिएट्स की मदद से इंतजाम किया। उड़ान के संचालक अरविंद यादव के पास करीब 10 कमरे खाली पड़े थे। लिहाजा उन्होंने किसानों से बिना कुछ चार्ज लिए उन्हें दो दिने के लिए देने की हामी भर दी। सवाल फिर वही है कि अगर दिल्ली में किसान मेला लग रहा है और किसान बड़ी संख्या में दिल्ली आ रहे हैं तो उनके ठहरने का भी इंतजाम होना चाहिए। अगर सरकार ने कोई इंतजाम कहीं कर भी रखा था तो फिर किसानों को इस बात की सूचना क्यों नहीं दी गई?

अगर किसानों के लिए मेला ग्राउंड के आस-पास ही रुकने का इंतजाम किया जाता तो वो ज्यादा से ज्यादा वक्त मेले में बिता पाते और अपने हित से जुड़ी जानकारी भी जुटा पाते।


arun profile1अरुण यादव। उत्तरप्रदेश के जौनपुर के निवासी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र। इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय।

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