कीर्ति दीक्षित के उपन्यास का विमोचन 23 को

टीम बदलाव

23 जुलाई को कीर्ति दीक्षित के उपन्यास का विमोचन।
23 जुलाई को कीर्ति दीक्षित के उपन्यास का विमोचन।

युवा पत्रकार और लेखिका कीर्ति दीक्षित के पहले उपन्यास जनेऊ के विमोचन का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। 23 जुलाई 2016, दोपहर 2 बजे दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में उपन्यास जनेऊ का विमोचन होगा। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता शिक्षाविद और वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर ओपी शर्मा करेंगे। मुख्य अतिथि के तौर पर पद्मश्री रमाकांत शुक्ल और विशिष्ट अतिथि के तौर पर डॉक्टर सरोजिनी प्रीतम, प्रोफेसर रमाकांत पांडेय, प्रोफेसर गिरीश नाथ झा, डॉक्टर रामप्रकाश शर्मा कार्यक्रम में शिरकत कर रहे हैं। कार्यक्रम की संयोजक अनुराधा प्रकाशन की संरक्षक कविता मल्होत्रा हैं जबकि मंच संचालन प्रियंका के जिम्मे होगा। अनुराधा प्रकाशन से प्रकाशित ये पुस्तक पाठकों के लिए AMAZON.IN पर भी उपलब्ध हो गई है।

जनेऊ की लेखिका कीर्ति दीक्षित
जनेऊ की लेखिका कीर्ति दीक्षित

बुन्देलखण्ड की आंचलिक पृष्ठभूमि पर आधारित यह उपन्यास कथामात्र न होकर एक ऐसी मनोवृत्ति है, जो धीमे जहर की भाँति  समाज को निगलती जा रही है। गाँव की सरल सहज गलियों में असमानता, घृणा एवं आवेश के ऐसे विष का समावेश हो गया है, जो प्रतिपल इस धरती को रक्तरंजित करने में लगा है। प्रस्तुत कथा एक ऐसे सवर्ण युवक गोकरन की है, जो समाज के नियमों में असहाय खड़ा, अपना सर्वस्व समाप्त होते देखता है। उसके पिता हल्केराम जो आजीवन समाजहित के लिए, अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर रहे, अन्ततः अपमान की ज्वाला उन्हें लील जाती है। गरीबी एवं समाज के कुप्रपंचों में परिवार समाप्त प्राय हो जाता है, तब उस युवक के मन में घृणा एवं निर्लिप्तता के कैसे भाव जन्म लेते हैं, इसका सजीव दृश्यांकन है।

ये उपन्यास एक विमर्श है कि क्या इतिहास के नाम पर वर्तमान को सजा दी जा सकती है? सियासत भी इतिहास के पन्ने, अपनी सहूलियत के अनुसार पलटती है। उसमें तो दूध के लिये बिलखता द्रोणपुत्र भी है और कर्ण भी, सुदामा भी है और एकलव्य भी। कथित तौर पर हम समानता में विश्वास करते हैं, लेकिन समानता है कहाँ?

janeoo1उपन्यास अंश

‘गोकरन के मन में मानवता और करुणा के भाव विदाई से ले रहे थे। आज फिर पिता के धर्म की शिक्षा सामाजिक परिदृश्य में धुंधली पड़ती दिखाई पड़ रही थी। स्वयं से कभी प्रश्न करता कभी इतिहास पर हंसने लगता… क्या फर्क है? इतिहास के कल में और आज के इस कथित समानता, न्याय और लोकतांत्रिक युग में? तब भी रंगभूमि में योग्यता… अपने अधिकार के लिए चीखती रही लेकिन हटकार दी गई और आज भी हारी खड़ी रह जाती है । बस फर्क इतना है…. तब सूतपुत्र का लांछन लगा था और आज ब्राह्मणपुत्र का, तब भी दुत्कार ने घृणा का आलेख लिखकर विध्वंस की पटकथा रच डाली थी, आज भी वैमनस्यता द्वेष जन्म ले रहे हैं, न जाने ये किस परिणाम की ओर अग्रसर होंगे।
वाह रे तन्त्र! बदलाव… ! बदलाव का आडम्बर रचकर उसी धरती पर विराजमान रहते हुए ऐसा छद्मी आडम्बर फैला देते हो कि पूरा समाज प्रसन्न होकर मूर्ख बनता रहता है। काल की एक और पोथी लिख रही है, बस किरदार बदले हैं, भाव तो वही हैं और हम निरे मूर्ख जो इसे उन्नति के प्रमाण मान बैठे हैं।’


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