किन्नरों के मन की पाती बांचती मां और ‘नाला सोपारा’

किन्नरों के मन की पाती बांचती मां और ‘नाला सोपारा’

chintra-mudgalइति माधवी

‘नाला सोपारा’ एक ऐसा उपन्यास जो एक ऐसे समुदाय पर आधारित है जिसके बारे में हर कोई बात करने से कतराता है । समाज का नजरिया उस तबके के लिए आज तक नहीं बदला । यह जानते हुए भी उनके भी मनभाव बाकी लोगों के मनभाव से अलग नहीं है । प्रख्यात लेखिका चित्रा मुद्गल ने अपने नवीन उपन्यास नाला सोपारा के अंश का पटना में अरविंद महिला कॉलेज की छात्राओं के बीच पाठन किया तो वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें छलक आईं । इस नए उपन्यास में लिंगदोषी समाज की समस्या को अत्यंत मानवीय दृष्टि से उठाया गया है।

दरअसल कहानी एक ऐसे बच्चे की है जिसे लिंग दोष के चलते दुनिया के तमाम  झंझावातों से रुबरू होना पड़ता है । विनोद उर्फ बिन्नी उर्फ बिमली उर्फ दीकरा बचपन में सामान्य बच्चों जैसा है। खेलकूद, पढ़ा-लिखाई और शरारत की तो पूछ ही मत यानी हर काम में अव्वल। लेकिन जैसे-जैसे वो बड़ा होता है उसे ये आभास होने लगता है कि वह सामान्य बच्चों से थोड़ा अलग है। उसकी शारीरिक संरचना बाकी बच्चों से जुदा है । यानी वह स्कूल की चारदीवारी के पास पैंट की बटन खोलकर खड़ा नहीं हो सकता। उसके मन में इन सब बातों को लेकर उठापटक जल रही थी तभी जाने कैसे हिजड़ा समुदाय को उसकी खबर लग गई और वे अपनी फौज के साथ आ गए उसे उठाकर ले जाने के लिए । हालांकि उसकी जगह उसके छोटे भाई को दिखा दिया गया। ‘देख लो एकदम नॉर्मल बालक है यह।’ हिजड़े ताली पीटते वापस हो गए, यह कहकर कि खबर गलत हुई तो फिर आएंगे। इस बीच मां ने बच्चे को हॉस्टल में डाल दिया, पर पिता ने तर्क दिया कि चौदह साल बाद अगर हिजड़े नाला सोपारा में प्रकट हो सकते हैं तो हॉस्टल क्यों नहीं आ सकते। लिहाजा विनोद का स्कूल जाना छूट जाता है, फिर भी विनोद को एक दिन उनकी पकड़ में आना ही पड़ा। उसका परिवार बदनामी के डर से घर बदल लेता है और घोषित कर देता है कि एक यात्रा के दौरान दुर्घटना में विनोद की मृत्यु हो गई। उसके अवशेष तक नहीं मिले।⁠⁠⁠⁠

chitraइसके बाद शुरू होती हैं विनोद की ओर से अपनी मां को एकतरफा चिट्ठियां, जिनके माध्यम से वह अपनी समस्त पीड़ा के अलावा अपने प्रश्न भी मां को संबोधित करता है। वह जननांग दोषी समाज की विसंगतियों और सीमित विकल्पों से परिचित है, इसके बावजूद उनकी स्थितियों में परिवर्तन लाना चाहता है। विधायक जी उसे अपनी तरह से इस्तेमाल करना चाहते हैं। विनोद की हार्दिक इच्छा है कि जननांग दोषी समाज के बाशिंदे किसी भी अन्य नागरिक की तरह पढ़ें-लिखें और समाज की मुख्यधारा में सम्मिलित हों। उन्हें अदर्ज की श्रेणी न देकर आरक्षित अथवा अनारक्षित श्रेणी में उनके जन्म के हिसाब से रखा जाए। उसे लिंग-दोषी समुदाय का ताली पीट-पीटकर भीख मांगना नागवार लगता है।

घर से परे जिस अड्डे पर विनोद को रखा जाता है, वहां नृशंस सरदार के अतिरिक्त सायरा, चंद्रा व पूनम जोशी हैं, जिनमें पूनम के मन में विनोद के लिए नारी-सुलभ आकर्षण है। विधायक के लंपट भतीजे बिल्लू और उसके दोस्तों की कामुकता पूनम जोशी के अंग और अस्मिता की काल बनकर प्रकट होती है और पूनम जोशी नाजुक स्थिति में अस्पताल पहुंचाई जाती है। विनोद पूनम जोशी को लेकर चिंतित है तो अपनी मां की अस्वस्थता की खबर पाकर व्यथित भी। वह जब हवाई जहाज पकड़ने सांताक्रूज एयरपोर्ट जा रहा होता है, राजनीति के दरिंदे उसकी हत्या कर डालते हैं, कुछ इस तरह कि उसकी शिनाख्त भी मिट जाती है। विधायक व अन्य राजनीतिक ताकतों की दिलचस्पी इसमें नहीं है कि किन्नर समुदाय का विकास किया जाए। वे तो उन्हें महज वोट बैंक मान कर तुष्टिकरण का खेल रच रहे थे। उनकी शतरंज पर जब विनोद एक चुनौती बनने लगा, उन्होंने उसे रास्ते से हटा दिया।

इस मुश्किल कथानक को चित्रा मुद्गल ने बड़े सधे और सिद्ध हाथों से उठाया है और अंत तक इसका निर्वाह भी किया है। पूरी कथा मां को संबोधित पत्रों की शक्ल में है, जो कहीं भी बोझिल या बेस्वाद नहीं होती। उपन्यास हमें जननांग दोषी समुदाय पर गहरी नजर डालने को बाध्य करता है।⁠⁠⁠⁠ अरविंद कॉलेज में कथा पाठ के बाद छात्राओं के सवालों को सुन ऐसा लगा जैसे उनकी उत्सुकता किन्नरों के अनछुए पहलू को जानने के लिए काफी बढ़ गई हो।


iti madvi

 

इति माधवी। मनोविज्ञान की अध्येता रहीं इति माधवी ने साहित्य की सभी विधाओं में अपनी संवेदनशील उपस्थिति दर्ज की है। आपकी कविताएं, लघुकथा, कहानी, संस्मरण और निबंध कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। हाल ही में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘फिर आएगा बसंत’ साहित्य जगत में काफी चर्चित रहा ।