वीरेन नंदा

बात 1963 की है, तब मैं नौ साल का था और एक फ़िल्म मुजफ्फरपुर के चित्रा टॉकीज में  लगी थी, राज कपूर की संगम। हमउम्र दोस्तों को घर से सख्त हिदायत कि उधर का रुख भी नहीं करना है ! जब हम अपने चौक पर कोई सामान लेने जाते तो ‘संगम’ फ़िल्म का पोस्टर लगा ताँगा बगल से गुजरता। हम उसे अकबका के देखते। चौक से गुजरते लोग ठिठकते, निहारते, तो कुछ के मुँह खुले के खुले रह जाते ! बूढ़े- बुजुर्ग राज कपूर की सात पुश्तों को जम के तारते ! कुछ कनखियाते तो कुछ दबी मुस्की छोड़ते। हमलोगों के लिए यह पोस्टर कौतूहल से कम न था।
आखिर एक दिन हम दोस्तों को भी यह चित्रा टॉकीज तक खींच ले गई। टॉकीज के सामने जब हम खड़े हुए तो सब की सांसें तेज थी। टॉकीज पर एक विशाल पोस्टर टंगा दिखा, जिसमें हीरोइन पानी में और हीरो पेड़ पर बैठा बाजा टाइप की चीज बजा रहा था। इससे ज्यादा कुछ पल्ले पड़ने का सवाल ही नहीं था तब ! बस ‘बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं’ वाला गाना अच्छा लगा। लौटने को जब मुड़े तो मुहल्ले के कई बुजुर्गों को मुँह पर गमछा लपेटे टॉकीज में घुसते देखा। बस इसी उत्सुकता में एक दिन हम सभी साढ़े छह-छह आना का जुगाड़ कर संगम नहा लिए।

देवकीनंदन खत्री की  जयंती 29 जून पर विशेष 

ठीक यही हाल देवकीनंदन खत्री  (1861 – 1913) के उपन्यासों का था। उनके उपन्यास को जितना कोसा जा रहा था, भर्त्सना की जा रही थी ! उससे कहीं अधिक उसे छुप-छुपाकर छोटे-बड़े-बुजुर्ग सभी पढ़ रहे थे। पढ़ने के लिए खड़ी बोली हिन्दी वे भी सीख रहे थे, जिनकी भाषा हिन्दी नहीं थी। तभी न तिलस्मी और ऐयारी उपन्यास के जनक देवकीनंदन खत्री का 4 और 24 खंडों में लिखा गया उपन्यास  ‘चंद्रकांता’ व ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ हॉट केक की तरह बिकने वाली किताबों में आज भी शुमार है। जबकि देवकीनंदन खत्री के तमाम उपन्यास की कथा-वस्तु भारतेन्दु मंडली के अनुसार यथार्थवादी सोच के बिलकुल उलट मानी जा रही थी। आज यह और भी आश्चर्यचकित करने वाली बात लगती है कि उनकी पुस्तकों का लेखकीय कॉपी राइट जब समाप्त हो गया तब सभी छोटे-बड़े प्रकाशकों में इसे छाप कर बेचने की होड़ लग गई ! यह क्रम अब भी जारी है। 1974 तक इसका 60 वां संस्करण निकल चुका था।
हैरी पॉटर

”हैरी पॉटर” से कम चर्चित किताब नहीं थी चंद्रकांता संतति ! हैरी पॉटर जहां अपने तमाम स्टारडम के बाद भी अवैज्ञानिक और अलौकिक चमत्कारों से भरी कथा है, वहीं देवकीनंदन खत्री के उपन्यास में दैविक, जिन्न, परी, जादू-टोना या अलौकिक चमत्कार जैसी कोई बात कहीं नहीं है। वे चमत्कार को मनुष्य के बुद्धि-कौशल और हाथ की सफाई मानते थे, जिसे थोड़े प्रयास से कोई भी कर सकता था। उनका तिलिस्म अलौकिक नहीं, हाथ का हुनर था। ऐयारों (जासूस) के हाथों में होश में लाने वाला पदार्थ ‘लकलका’ था। उनके पात्रों द्वारा प्रयुक्त अस्त्रों में कल के इंजीनियरिंग के कल-पुर्जे थे, गेंदनुमा हथगोला था। वैज्ञानिक शोध के उपकरण थे ! और सबसे महत्वपूर्ण कि यह अवाम की भाषा में लिखा गया ऐसा अविस्मरणीय उपन्यास था जिसने भारतीय हिन्दी-साहित्य के इतिहास में लोकप्रियता के सारे मापदंड ध्वस्त कर दिये। उनके इसी तिलिस्मी साहित्य और लोकप्रियता के कारण उन्हें हिन्दी का जुले वर्न, एच.जी.वेल्स, एलेक्जेंडर ड्यूमा, सर वाल्टरकास्ट तक कहा गया।

इन सब के बावजूद, हिन्दी साहित्य के महान माने जाने वाले आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने देवकीनंदन खत्री को साहित्यकार ही नहीं माना, उनकी किसी भी रचना को साहित्य की कोटि में रखने से इंकार कर दिया। शुक्ल ने उस समय के लेखक किशोरी लाल गोस्वामी को उनसे श्रेष्ठ मानते हुए वरीयता दी थी और देवकीनंदन खत्री को तिरस्कृत किया था । आज किशोरी लाल गोस्वामी को कोई जानता नहीं, लेकिन देवकीनंदन खत्री बतौर बेस्ट-सेलर के रूप में आज भी हिंदी-उपन्यास के शीर्ष पर विराजमान हैं। आलोचक से कृतियां महान नहीं होती, लोकजन की रुचि से महान बनती हैं।
यह आश्चर्यजनक है कि “गुप्तगोदना” का एक भाग लिखने के बाद देवकीनंदन खत्री की मृत्यु-पश्चात उसे पूरा करने वाले वही किशोरीलाल गोस्वामी थे, जिन्हें उनसे श्रेष्ठ करार दिया था आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने। दूसरे बड़े आलोचक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी उनका सही मूल्यांकन करने की जहमत नहीं उठाई। उन्होंने जिस लोक भावना की दुहाई देकर कबीर-सूर-तुलसी को स्थापित किया, वहीं देवकीनंदन खत्री का मूल्यांकन करते समय लोक मन की उपेक्षा कर दी। जबकि लोक मन की भावना के आधार पर ही उन्होंने भक्तिकाल पर गम्भीर विमर्श किया था। हिन्दी के इन दोनों आचार्य ने देवकीनंदन खत्री की घनघोर उपेक्षा कर अपने दायित्व का निर्वाह नहीं किया, जो हिन्दी-साहित्य के इतिहास की कलंकित घटना है।

नवजागरण काल में संकीर्ण हिन्दू मानसिकता का बोलवाला था, जिस कारण देवकीनंदन खत्री का विरोध इस आधार पर भी किया गया कि उनकी भाषा उर्दू मिश्रित थी यानी हिंदुस्तानी जुबां में लिखा गया उपन्यास था। जबकि खत्री जी का मानना था कि उपन्यास पढ़ने वालों को भाषा के स्तर पर कोई कठिनाई न हो। इसीलिए वे भारतेन्दु की भाषा को पैसेंजर कहते, तो अपनी भाषा को मेल। उनका कहना था – “किसी दार्शनिक ग्रंथ या पत्र की भाषा के लिए यदि किसी बड़े कोष को टटोलना पड़े तो कुछ परवाह नहीं, परन्तु साधारण विषयों के लिए भी कोष को टटोलना पड़े तो निःसन्देह दोष की बात है। मेरी हिन्दी किस श्रेणी की हिन्दी है इसका निर्धारण मैं नहीं कर सकता, परन्तु मैं यह जानता हूँ कि इसके पढ़ने के लिए कोष की तलाश नहीं करनी पड़ती….”। देवकीनंदन खत्री की भाषा-नीति के पदचिन्हों पर चलकर ही कथा के सिरमौर प्रेमचंद को इतनी ख्याति मिली। प्रेमचंद ने अपनी सौ श्रेष्ठ पसंद की पुस्तकों में चन्द्रकांता को यों ही नहीं शामिल किया था।

भारतेन्दु और उनके समकालीनों ने ब्रिटिश शासन की स्तुति में ढेरों रचनाएं लिखीं, किन्तु देवकीनंदन खत्री के बारे में कोई यह नहीं कह सकता है कि ब्रितानी हुकूमत के पक्ष में एक शब्द भी कभी कहीं लिखा हो ! लेकिन उनकी इस बात के लिए भी किसी ने कोई प्रशंसा नहीं की, फिर भी वे अपनी रचना के बल पर अमर हो गए। लाखों लोगों को अपनी रचना के तिलिस्मी आकर्षण और भाषा से अभिभूत करने वाले देवकीनंदन खत्री का विद्वत-जनों ने उपहास किया तो लोक-जन ने आत्मसात। लोक-जन में व्याप्त रचना केवल भाषायी तिलिस्म के बल पर इतने लंबे समय तक नहीं टिकती ! वह लोक-जन की रुचि पर टिकती है। यही लोक-रुचि उनकी लोकप्रियता का संबल रहा।
भारतेंदु का निधन 1885 में हुआ था। महावीर प्रसाद द्विवेदी का 1901 में पदार्पण हुआ। भारतेंदु-काल के बाद सीधे द्विवेदी-काल कहना कहाँ तक न्यायसंगत है ? काल विभाजन करने वाले 1885 से 1901 के बीच के काल को भी भारतेंदु-काल क्यों कहते है ? इस काल को “खत्री-काल” क्यों नहीं कहा जाता ? जबकि सच यही है। यह हिन्दी साहित्य के इतिहास का एक बड़ा सवाल है।


वीरेन नन्दा।  बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति समिति के संयोजक। खड़ी बोली काव्य -भाषा के आंदोलनकर्ता बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री पर बनी फिल्म ‘ खड़ी बोली का चाणक्य ‘ फिल्म के पटकथा लेखक एवं निर्देशक। ‘कब करोगी प्रारम्भ ‘ काव्यसंग्रह प्रकाशित। सम्प्रति स्वतंत्र लेखन। मुजफ्फरपुर ( बिहार ) के निवासी। आपसे मोबाइल नम्बर 7764968701 पर सम्पर्क किया जा सकता है।