पूंजीवादी युग में एक ‘फकीर’ का जिंदा होना !

पूंजीवादी युग में एक ‘फकीर’ का जिंदा होना !

वीरेन नंदा

“कोरोना के इस गहराते संकट के समय कुछ नई किताब पढ़ने के लिए आलमारी टटोल रहा था तब एक किताब पर नजर पड़ी- “सिक्स एकड़ एंड ए थर्ड”। ओड़िया भाषा के महान लेखक फकीर मोहन सेनापति’ लिखित यह उपन्यास निकाल कर पढ़ने लगा। पढ़ते हुए तब की स्मृतियाँ कौंधी और उस समय ली गई कुछ तस्वीर भी। ये बात करीब दो साल पहले ओडिशा दौरे की हैं । ओडिशा दौरे के दौरान एक दिन समंदर किनारे सैर पर निकला, तभी मेरे कदम रास्ते में एक कॉलेज के पास लड़के लड़कियों की ठिठोली देख रुक गया। कॉलेज के विशाल गेट पर ओड़िया भाषा में लिखे नामपट्ट पर नजर पड़ी। लिहाजा समझ बढ़ाने के लिए पूछा तो पता चला कि यह “फकीर मोहन यूनिवर्सिटी’ है। यूनिवर्सिटी के गेट से घुसते ही एक बड़ी सी आदमकद मूर्ति पर नजर पड़ी। वह फकीर मोहन सेनापति की थी। उनके बारे में पूछने पर पता चला कि ओड़िया भाषा के वे महान साहित्यकार थें। आश्चर्य हुआ कि एक लेखक के नाम पर इतनी विशाल यूनिवर्सिटी । लिहाजा एक साहित्यकार होने के नाते अब उन पर लिखी पुस्तक पाने की बेचैन हो उठा । बहुत खोजने के बाद अंग्रेजी में अनुदित एक पुस्तक हाथ लगी- “सिक्स एकड़ एंड ए थर्ड”। पेंगुइन से छपी इस पुस्तक को झट खरीद लाया। बालेश्वर से लौटने के बाद यह पुस्तक अलमारी के एक कोने में दुबक गई। लिहाजा लॉकडाउन में मेरे लिए इसे पढ़ने से बेहतर अवसर कोई और नहीं । लिहाजा किताब पढ़ने के दौरान फकीर मोहन सेनापति जैसे कालजयी लेखकों के बारे में जितना समझा उसका कुछ हिस्सा आपके साथ साझा कर रहा हूं ।            

ओड़िया कथा-सम्राट : फकीर मोहन 

आधुनिक उड़िया भाषा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले फकीर मोहन सेनापति (1843 – 1918) उड़िया भाषा के ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यास में दीन हीन और नगण्य समझे जाने वाले लोगों का बेबाक चित्रण कलात्मक ढंग से किया था। यह चकित करने वाली बात है कि उन्होंने समाज में व्याप्त असमानता, जमींदारी प्रथा, लोभ, लालच, स्वार्थ, अमानवीय शोषण और व्यभिचार के विरुद्ध अपनी आवाज रूस के अक्टूबर क्रांति से काफी पहले अपनी कथा में व्यक्त किया । उनका लिखा सबसे चर्चित उपन्यास ‘छ मण आठ गुण्ठ’ ( छः बीघा जमीन ) के बारे में कहा जाता है कि भारत में लिखा गया वह पहला उपन्यास है, जिसमें भूमिहीन किसानों का जमींदारों द्वारा किये जा रहे शोषण का निर्भीकता से चित्रण किया गया है। यहाँ, यह भी गौर तलब है कि उस समय तक भारत में मार्क्सवाद का पदार्पण भी नहीं हुआ था, जब वे आम जन के जीवन को अपनी कहानियों में उकेर रहें थे। ‘छ मण आठ गुण्ठ’ उपन्यास इस कदर चर्चित हुई कि इसका अंग्रेजी अनुवाद ‘सिक्स एकर्स एंड ए थर्ड’ नाम से कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी ने प्रकाशित करते हुए इसे क्लासिक उपन्यास की श्रेणी दी गई !

आधुनिक उड़िया भाषा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले फकीर मोहन सेनापति (1843 – 1918) उड़िया भाषा के ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यास में दीन हीन और नगण्य समझे जाने वाले लोगों का बेबाक चित्रण कलात्मक ढंग से किया था। यह चकित करने वाली बात है कि उन्होंने समाज में व्याप्त असमानता, जमींदारी प्रथा, लोभ, लालच, स्वार्थ, अमानवीय शोषण और व्यभिचार के विरुद्ध अपनी आवाज रूस के अक्टूबर क्रांति से काफी पहले अपनी कथा में व्यक्त किया । उनका लिखा सबसे चर्चित उपन्यास ‘छ मण आठ गुण्ठ’ ( छः बीघा जमीन ) के बारे में कहा जाता है कि भारत में लिखा गया वह पहला उपन्यास है, जिसमें भूमिहीन किसानों का जमींदारों द्वारा किये जा रहे शोषण का निर्भीकता से चित्रण किया गया है। यहाँ, यह भी गौर तलब है कि उस समय तक भारत में मार्क्सवाद का पदार्पण भी नहीं हुआ था, जब वे आम जन के जीवन को अपनी कहानियों में उकेर रहें थे। ‘छ मण आठ गुण्ठ’ उपन्यास इस कदर चर्चित हुई कि इसका अंग्रेजी अनुवाद ‘सिक्स एकर्स एंड ए थर्ड’ नाम से कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी ने प्रकाशित करते हुए इसे क्लासिक उपन्यास की श्रेणी दी गई !

  फकीर मोहन सेनापति ग्रामीण पृष्ठभूमि पर रचित अपनी कथा में जाति प्रथा, ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी, शोषण, अत्याचार, महाजनी, न्याय-अन्याय, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, कर्मकांड, नारी शोषण आदि का दर्दनाक बयान किया है, जो उस वक्त के उड़िया समाज की सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अवस्था को स्पष्ट रूप से चिन्हित करता है। आधुनिक उड़िया साहित्य के जनक और प्रेमचन्द की तरह उड़िया के कथा-सम्राट कहे जाने वाले फकीर मोहन सेनापति की विधिवत अच्छी शिक्षा नहीं हुई किन्तु अपने अध्ययन के बलपर उन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी और बांग्ला भाषा पर न केवल पांडित्यपूर्ण अधिकार किया, बल्कि  मूल संस्कृत से महाभारत, रामायण, गीता, उपनिषद आदि का उड़िया भाषा में अपना मूल लेखन करते हुए उसका अनुवाद भी किया, जो उड़िया साहित्य की थाती है। व्यास कृत महाभारत के अनुवाद करने के बाद उन्हें ‘व्यास कवि’ कहा जाने लगा।

ग्रामीण पृष्ठभूमि पर रचित उनकी ‘रेवती’ कहानी में अंधविश्वास और जमीनदारों के शोषण को रेखांकित करते हुए पहली बार उन्होंने नारी शिक्षा की बात उठाई। नवजागरण काल में यह नारी जागरण की कथा है जो उस वक्त हिंदी पट्टी में शायद देखने को नहीं मिलती है। सन् 1898 ई. में छपी ‘रेवती’ को उनकी पहली कहानी माना जाता है किन्तु उनकी आत्मकथा ‘आत्मजीवनचरित’ के अनुसार उन्होंने पहली कहानी 1960 में ‘लछमानियाँ ‘ नाम से लिखी, जो ‘बोध दायिनी’ पत्रिका में छपी थी। लेकिन यह कहानी उपलब्ध नहीं है अन्यथा यह भारत की पहली आधुनिक कहानी कही जाती। फकीर मोहन सेनापति ने कहानी, उपन्यास के अतिरिक्त कविताएँ भी लिखीं। उत्कल भ्रमनं, धूलि, पूजा फूल, पुष्पमाला शीर्षक कविताओं का उनका संग्रह बताया जाता है। उनकी कविता ‘अबसर-बासरे’ और ‘बौद्धावतार काव्य’ में उनकी कलात्मकता का परिचय मिलता है। सन् 1892 ई. में उन्होंने ‘उत्कल भ्रमनं’ नामक कविता लिखी थी, जिसमें उस समय की उड़ीसा की स्थिति का व्यंग्यात्मक लहजे में वर्णन है।

उनकी लिखी ढेरों कहानियों में डाक मुंशी, अधर्म बित्ता, पेटेंट मेडिसिन और सभ्य जमींदार प्रमुख हैं। छ मण आठ गुण्ठ, मामूँ, प्रायश्चित, लछमा आदि उनके चर्चित उपन्यास है। छ मण आठ गुण्ठ’ उपन्यास पर फिल्म भी बनी और इसे एनएसडी ने मंचित भी किया था।

उड़ीसा समाज के उत्थान के लिए उन्होंने सन् 1868 ई. में ‘उत्कल प्रेस’ की उन्होंने स्थापना की, जहाँ से ‘बोध दायिनी’ एवं ‘संबाद बाहिका’ नामक पत्रिकाएं निकाल साहित्य सेवा करते हुए लोगों को जागरूक करने की भी मुहिम चलायी। वे अंग्रेजों की क्रूरता के कट्टर आलोचक रहे और जब भुइयां जाति का वहाँ आंदोलन शुरू हुआ तब उसमें उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

  ‘उत्कल साहित्य समाज’ के स्तंभ कहे जाने वाले कथा-सम्राट और समाज सुधारक फकीर मोहन का जन्म 14 जनवरी 1843 ई. को बालेश्वर जिला के मल्लिकाशपुर गाँव में एक संपन्न व्यावसायिक परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम लछमण चरण सेनापति और माँ तुलसी देवी थी। डेढ़ वर्ष की उम्र में पिता और करीब तीन वर्ष की उम्र में माँ चल बसी। माता-पिता की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने इनकी संपत्ति छीन ली। इनकी दादी कुचिला देवी ने मुश्किलें झेल इनका लालन-पालन किया। सात वर्ष की आयु में गंभीर बीमारी की चपेट में आने के कारण उनके बचने की उम्मीद न देख दादी उन्हें बालासोर के एक पीर दरगाह पर ले गई। करीब सात दिनों बाद जब वे ठीक हुए तो दादी ने उनका नाम ब्रजमोहन से बदल कर फकीर मोहन कर दिया। फकीर मोहन के चाचा उन्हें पढ़ाने के खिलाफ थे इस कारण उनकी पढ़ाई 9 वर्ष की उम्र में आरंभ हुई। बालेश्वर के बाराबती स्कूल में उनकी शिक्षा प्रारंभ हुई। स्कूल की फीस पूरा करने वे बाल मजदूर बने और उसी स्कूल के एक शिक्षक के घर में काम करते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी। 

     क्रिस्चन स्कूल में जब वे प्रधानाध्यापक हुए, उसी दौरान वहाँ के जिलाधीश जॉन बीम के संपर्क में आएं। जॉन बीम उनसे ओड़िया भाषा सीखने लगे। ओड़िया भाषा सीखने क्रम में जॉन बीम उनसे इस कदर प्रभावित हुए कि उन्हें 1871 ई. में एक हजार की तनख्वाह पर नीलगिरी का दीवान नियुक्त कर दिया। वे 1871 ई. से 1905 ई. तक उड़ीसा के नीलगिरी, दमापाडा, ढेंकानाल, दस्पल्ला, पल्लाहद, क्योंझर आदि क्षेत्रों में दीवान के रूप में कार्यरत रहे। यह कार्य करते हुए उन्होंने अपना लेखन जारी रखा और उड़िया समाज के लिए सदैव चिंतित रहें। 

 13 वर्ष की उम्र में इनकी शादी लीलावती से हुई जो इनके दीवान बनते ही गुजर गई। पुनः इनकी दूसरी शादी कुमरी देवी से हुई जिनसे एक लड़का और एक लड़की जन्मी। दूसरी पत्नी भी 1894 ई. में चल बसीं। फकीर मोहन सेनापति अपनी पूरी जिंदगी लेखन और समाज की सेवा करते हुए 75 वर्ष की उम्र में 14 जून 1918 ई. को दुनिया से कूच कर गए। 

 आज उड़ीसा में बच्चा-बच्चा उनके नाम से अवगत है। जहाँ देश में राजनेताओं के नाम पर कॉलेज या यूनिवर्सिटी खोलने की परंपरा रही हो वहाँ उड़ीसा के बालेश्वर में फकीर मोहन सेनापति जैसे बड़े लेखक के नाम पर ‘फकीर मोहन यूनिवर्सिटी’ देखना सुखकर लगा। देश के सबसे गरीब इस राज्य की ऐसी अमीर चेतना पर मुझ जैसे हिन्दी समाज से आये इस नाचीज़ को रश्क भी हो रहा था और फक्र भी।

वीरेन नन्दा/ बदलाव के जून माह (2019) के अतिथि संपादक, बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति समिति के संयोजक। खड़ी बोली काव्य -भाषा के आंदोलनकर्ता बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री पर बनी फिल्म ‘ खड़ी बोली के भगीरथ‘ फिल्म के पटकथा लेखक एवं निर्देशक। ‘कब करोगी प्रारम्भ ‘ काव्यसंग्रह प्रकाशित। सम्प्रति स्वतंत्र लेखन। मुजफ्फरपुर ( बिहार ) के निवासी। आपसे मोबाइल नम्बर 7764968701 पर सम्पर्क किया जा सकता 

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