ब्रह्मानंद ठाकुर

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ मुहिम को वास्तविकता के धरातल पर उतारने वालों में शुमार है बिहार का कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय । बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के विष्णुपुर मेहसी में बना है कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय । बुधवार को कस्तूरबा गांधी की जयंती के मौके पर विद्यालय से पास आउट हो चुकी छात्राओं को बुलाया गया था, जिसमें इस विद्यालय की पहली बैच की छात्राओं से लेकर हाल में 8वीं पास कर कॉलेज में दाखिला लेने वाली छात्राएं शरीक हुईं। ये विद्यालय 8वीं तक की छात्राओं को शिक्षित कराता है । इसी कड़ी में एक और बैच यहां से पास आउट हुआ ।

बंदरा प्रखंड के गोसाईं टोला सकरी गांव  के खेत मजदूर नवल पासवान और फूलो देवी की बेटी नीलम कुमारी  ने इस  आवासीय विद्यालय से 2011  में आठवीं कक्षा पास किया था। वह नीलम इस विद्यालय की प्रथम बैच की छात्रा थी। उसका नामांकन 2008  में छठी कक्षा में हुआ था। अब नीलम स्नातक  अंतिम वर्ष की छात्रा है। गरीबी के कारण नीलम के मां-बाप उसे पढ़ाने की स्थिति में नहीं थे। जब प्रखंड क्षेत्र में कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय खुला तो पडोसियों की देखादेखी फूलो देवी ने भी इस विद्यालय में उसका नाम लिखा दिया। सारी सुविधाएं मिलने लगी। नीलम की पढ़ाई के प्रति रूचि भी यहीं से पैदा हुई। नीलम ने जब आठवीं पास किया तो फिर मुड़कर नहीं देखा। नीलम स्नातक गृहविज्ञान प्रतिष्ठा की छात्रा है।  उससे छोटी तीन बहनों पर भी नीलम की पढ़ाई का असर पड़ा और वे तीनों पढ़ाई में पूरी मुस्तैदी से जुटी हुई हैं। नीलम के गांव के ही योगेन्द्र राम की बेटी शोभा भी इसी कस्तुरबा गांधी आवासीय विद्यालय की छात्रा है। इंटर करने के बाद उसकी नियुक्ति गांव के आंगनवाड़ केन्द्र में सहायिका के पद पर हो गई।

फिलहाल शोभा भी उमा पाण्डेय कालेज पूसा से  ग्रेजुएशन करने की सोच रही है।  उसके ससुराल वाले यह कहते हुए आगे की पढाई का विरोध कर रहे हैं कि अब तो नौकरी कर रही हो, आगे पढ़ने से क्या होगा, लेकिन  शोभा  उनसे सहमत नहीं है। वह हर हाल में आगे अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है।  उसके चेहरे पर इस आशय का संकल्प साफ झलकता है ।  इसी प्रखंड के बैगरा गांव का ट्रैक्टर ड्राइवर  सुरेश राम की तीन बहनों में सबसे छोटी बहन स्नातक कर रही है । संयोग से इस लड़की का नाम भी शोभा है । दोनों बड़ी बहनें पढ़ाई-लिखाई नहीं कर सकीं, लिहाजा शोभा को इस बात का मलाल जरूर है।

शोभा भी कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय से 8वीं तक की पढ़ाई पूरी की थी । मसलन इन सभी लड़कियों में विद्यालय के वातावरण ने शिक्षा के प्रति उत्साह का संचार किया और सभी ने पढ़ने की जिद ठान लिया। आज ये लड़कियां साइकिल से कालेज जाती है। किसी के कमेंट की परवाह नहीं करती। पीरापुर मधैया गांव के मनोज राय निम्न मध्यम वर्गीय किसान हैं। उनकी बेटी काजल ने इसी कस्तूरबा विद्यालय से  आठवीं कक्षा पास करने के बाद वाणिज्य इंटर कालेज, मुजफ्फरपुर से इंटर कर रही है। गांव में रहकर भी धारा प्रवाह अंग्रेजी ऐसी बोलती है जैसे शहर के किसी निजी स्कूल में पढ़ने वाली लड़की ।

वार्डन के साथ काजल

कस्तूरबा गांधी की जयंती समारोह को काजल ने अंग्रेजी और फिर हिन्दी में सम्बोधित कर लोगों को अभिभूत कर दिया। उसका सपना डॉक्टर बनने का है। कुछ ऐसी ही कहानी साधना  नेहाश्री, कंचन भारती जैसी बालिकाओं की है, जो कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय से अपनी शिक्षा की शुरुआत कर ऊंचा मुकाम हासिल करने की कोशिश में जुटी हुई है। जिले के सभी 16 प्रखंडों में कस्तूरबा आवासीय बालिका विद्यालय संचालित है।  यहां अभिवंचित और दलित वर्ग की बच्चियों जिनकी उम्र 11 से 14 साल के बीच है, उनका दाखिला होता है ।

स्कूल के छात्रावास में इनके लिए नाश्ता, भोजन, वस्त्र और पाठ्यसामग्रियों की व्यवस्था नि: शुल्क होती है। एक कस्तूरबा आवासीय  विद्यालय में 100 छात्राओं के नामांकन का प्रावधान है। प्रतिवर्ष जितनी छात्राएं 8  वीं उत्तीर्ण होती हैं, उसकी जगह उसी लक्ष्य समूह की बालिकाओं का छठी कक्षा में नामांकन होता है। बीते दस वर्षों के दौरान यहां से 248  छात्राएं आठवीं की परीक्षा पास करने के बाद आगे की पढ़ाई कर रही हैं। इस साल यहां से 37   छात्राओं ने आठवीं पास किया है। इसबार यहां से तीन दिव्यांग छात्राएं मनीषा, चांदनी और जूली ने भी आठवीं कक्षा पास किया है। स्कूल की  वार्डेन रूबी कुमारी ने समारोह में उपस्थित पूरवर्ती छात्राओं को मेडल देकर सम्मानित किया। इसके साथ ही इस वर्ष उत्तीर्ण होने वाली छात्राओं को स्कूल बैग एवं पाठ्यपुस्तक समेत अन्य पाठ्य सामग्री प्रदान की गई। इस अवसर पर प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी रामविनोद झा, बीडीओ विजय कुमार ठाकुर, रालोसपा दलित महादलित प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष फेंकू राम सहित अनेक जनप्रितिनिधि और गण्यमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन विद्यालय के प्रधानाध्यापक मृत्युंजय कुमार ने किया।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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