ब्रह्मानंद ठाकुर

कश्मीरी मूल के हिन्दी लेखक डाक्टर निदा नवाज पिछले दिनों मुजफ्फरपुर आए। डाक्टर निदा नवाज को उनकी पुस्तक ‘ सिसकियां लेता स्वर्ग ‘ के लिए  इस वर्ष के अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया है। मुजफ्फरपुर में उनका यह आगमन इसी सम्मान समारोह के लिए हुआ था। लिहाजा सम्मान समारोह के दूसरे दिन अयोध्या प्रसाद स्मृत समिति के संयोजक- कवि, साहित्यकार डाक्टर वीरेन नन्दा के  मुजफ्फरपुर स्थित आवास पर डाक्टर निदा नवाज से  बदलाव मुजफ्फरपुर के संयोजक ब्रह्मानंद ठाकुर की लम्बी बातचीत हुई। यह बातचीत  मुख्य रूप से कश्मीर के वर्तमान हालात पर केन्द्रित रही। डाक्टर नवाज ने खुद भी घाटी के माहौल के भुक्तभोगी रहे हैं।  तीन – तीन बार उनका अपहरण हो चुका है , बड़ी बेबाकी से उन्होने वहां के  हालात बयान किए।

बदलाव-  कश्मीर के वर्तमान हालात की जड़ आप कहां देख रहे हैं ?
डॉक्टर निदा नवाज – कश्मीर में आतंकवाद  की वजह वहां के चुनावों में धांधली रही है। वहां आज तक जितने भी चुनाव कराए गये, सबों में धांधली हुई। केन्द्र वहां अपनी मर्जी और पसंद की  सरकारें बनवाती रही। 1987 के चुनाव में तो हद  ही हो गई जब  बहुमत से जीत रही मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट को हारा हुआ घोषित कर, जो पार्टी चुनाव हार रही थी उसे ही विजयी घोषित कर दिया गया। इसी के साथ कश्मीर मेंं 1989  से आतंकवाद शुरू हुआ।  सीमा पार पाकिस्तान वाले तो इसी ताक मे थे कि कब कश्मीरी दिल्ली से नाराज हो जाएं और उसे इनको अपने हित में इस्तेमाल करने का मौका मिले। केन्द्र ने इस पर ध्यान नहीं दिया और इसे चंद उपद्रवियों का काम समझ सख्ती से दबाने की कोशिश की जाने लगी।
बदलाव- आज आम कश्मीरियों की सबसे बड़ी समस्या क्या है ?
डॉक्टर निदा नवाज – कश्मीर के आम आदमी की सबसे बड़ी समस्या उसकी सुरक्षा की है। दोहरे संदेह के दायरे में जी रही है कश्मीरी आवाम। उन्हें सुरक्षाबल और आतंकी संगठन दोनों शक की निगाह से देखते हैं। फौज को हर किसी पर आतंकी या आतंकियों का मददगार होने का शक है और आतंकी मारते हैं मुखबिरी के संदेह में।
बदलाव-आतंक और भय के साए में आज वहां की नई पीढी किस रूप में विकसित हो रही है ?
डॉक्टर निदा नवाज जिस समाज में गोलियों की तड़तड़ाहट, बमों के धमाके, हथगोलों की आवाज अहर्निश गूंज रही हो, हर दिन कोई न कोई गोलियों और बमों से मारा जा रहा हो, उस समाज में बच्चों की मनोदशा को सहज ही समझा जा सकता है। डर, दहशत और अनिश्चितता हर समय मन में समाई रहती है। घर से निकले, मगर लौट कर वापस आने की गारंटी नहीं होती। कश्मीर घाटी में आज जो युवा वर्ग है, जो पत्थरबाज हैं, वह तो बंदूकों – गोलियों की इसी तड़तड़ाहट में जन्मा है, पला-बढा है। उसके सामने एक सामान्य समाज की चेतना नहीं है। जिस समाज में जान के लाले पड़े हों उस समाज का युवा वर्ग कैसे अपने प्रोफेशनल करियर को लेकर संजीदा हो सकता है ? यहां की नई पीढी आम कश्मीरियों की तरह ही बिखराव का शिकार है।
बदलाव – जम्मू कश्मीर में साम्प्रदायिकता को आप किस नजरिए से देख रहे हैंं ?
डॉक्टर निदा नवाज देखिए ,साम्प्रदायिकता जम्मू कश्मीर में बिल्कुल भी नहीं है। धार्मिक कट्टरवाद तो है मगर इनटॉलरेंस नहीं है। वहां बंगाली, बिहारी, नेपाली  मजदूर  हजारों की तादाद में हैं। उनसे  उनकी जाति और धर्म के बारे में कुछ भी नहीं पूछा जाता। उनके साथ  बिना किसी भेद -भाव  के सम्मानजनक व्यवहार किया जाता है। पिछले 30 सालों के आंकड़े पर यदि गौर किया जाए तो हम पाते हैं कि वहां इस अवधि में अब तक 60 हजार लोग मारे गये हैं। मनरे वालों में कश्मीरी हिंदुओं की संख्या मात्र 219 है।
बदलाव – क्या आप कश्मीर समस्या को किस रूप में देखते हैं?
डॉक्टर निदा नवाज कश्मीर एक भौगोलिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक समस्या है। मजहबी तो कतई नहीं। इसे धार्मिक रंग देने का काम तो पाकिस्तान कर रहा है। इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि जब  जेहाद की बात की जाती है तो आजादी की बात नहीं, किसी धर्म विशेष की बात की जाती है। उन लोगों से पूछा जा सकता है कि जब आप जम्मू-कश्मीर में इस्लामी शासन की बात करते हो तो उस समय जम्मू, लद्दाख या कारगिल के शिया समुदाय आपके साथ नहीं होते। वे भारत के साथ होते हैं। आज विश्व में धर्म के नाम पर किसी भी देश में शासन व्यवस्था नहीं चलाई जा सकती।
बदलाव आपकी राय में इस समस्या का समाधान कैसे सम्भव है ?
डॉक्टर निदा नवाज केन्द्र सरकार के लिए यह सबसे जरूरी है कि आम कश्मीरियों के बीच जाकर उसकी बुनियादी समस्याओं को समझा जाए। उसकी नाराजगी दूर करने का हर सम्भव प्रयास किया जाए। तभी कश्मीर समस्या का हल निकल सकता है। जम्मू-कश्मीर से बाहर देश भर में पिछले चंद वर्षों से जो एक कट्टरवाद फैलाया जा रहा है, बांटने की जो चाल खेली जा रही है, उसका सीधा प्रभाव कश्मीर घाटी पर पड़ रहा है। मेरी राय में आज की तारीख में कश्मीर के लिए भारत के अलावा कोई विकल्प नहीं है। शर्त यह कि भारत सही मायने में एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक तरीके से इस समस्या का समाधान करे।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

संबंधित समाचार