ब्रह्मानंद ठाकुर

बात उन दिनो की है जब देश को आजाद हुए दसबारह साल ही हुए थे। गांव सच्चे अर्थों में गांव था। आडम्बर, तड़कभड़क और दिखावे से काफी दूर मनोरंजन के आधुनिक साधनों की दस्तक हमारे गांव में नहीं हुई थी यहां तक कि रेडियो तक भी सबकी पहुंच आसान नहीं थी नाच, कीर्तन, आल्हा, नाटक और विवाह कीर्तन जैसे साधन ग्रामीणों के मनोरंजन के साधन हुआ करते थे। कभी कभी रामलीला का भी आयोजन गांव में होता था। यह लगातार डेढ़ महीने तक चलता रामलीला का सम्बंध धार्मिक आस्था से जुड़े होने के कारण इसमें लोग खूब बढ़चढ़ कर दान करते। पिछले दिनों मुजफ्फरपुर शहर के आम्रपाली आडिटोरियम में धर्मवीर भारती की चर्चित काव्य कृति कनुप्रियारचना पर केन्द्रित नुपूर कलाश्रम की ओर से एक नृत्य नाटिककनुप्रिया : एक शाश्वत प्रेम कथा का मंचन हुआ तो मुझे अपना बचपन याद गया

चित्र- रवि वर्मा

तब मैं 6-7 साल का था। मेरे गांव में रामलीला की टीम बुलाई गयी थी दरभंगा जिले के किसी गांव की वह पार्टी हमारे गांव  से कुछ दूर दूसरे गांव में आयी हुई थी। वहां रामलीला देखने हमारे गांव से कुछ लोग जाते थे। एक दिन उन लोगों ने अपने गांव में उस पार्टी को बुलाने के लिए विचारविमर्श किया और तय हुआ कि उसे अपने गांव में बुलाया जाए। दूसरे दिन सबेरे गांव के कुछ सम्मानित लोग वहां जा कर व्यास जी से मिले और उन्हें सम्मान पूर्वक अपने गांव में रामलीला करने का निमंत्रण दिया। जिस दिन कलाकारों को उनके साजोसामान के साथ हमारे गांव मे आना था, उस दिन दो बैलगाड़ी भी भेजी गयी थी। पार्टी को आते ही उन्हें गांव के पूरब एक बड़े से बगीचे में जगह दी गयी और मंच के लिए घरों से चौकी उपलब्ध कराई गयी। कलाकारों की संख्या 15 के करीब थी रामलीला के नाम पर गांव में बड़ा उत्साह था हम बच्चों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा शाम होते ही घरों में लोग खाना खा कर तैयार हो जाते थे। महिलाएं भी रामलीला देखने बड़ी संख्या में पहुंचती थी। प्रति दिन आधा  खेल हो जाने के बाद कोई एक कलाकार मंच पर दोनों हाथ में दो माला ले कर उपस्थित होता और दर्शकों से माला उठाने की गुजारिश करता इस माला उठाने का तात्पर्य होता था, सभी कलाकारों के भोजन की व्यवस्था करना ।एक माला उठाने वाला आदमी एक शाम और दोनों माला उठाने वाला दो शाम का भोजन देता था। भोजन मतलब चावल, दाल ,सब्जी, तेल, मशाला, दूध, दही, घी आदि। इन सामग्रियों की मात्रा निश्चित होती थी। कभीकभी तो ऐसा होता कि चार चार दिन का अग्रिम माला ठा लिया जाता था

हमारे गांव में इस रामलीला पार्टी के आने का क्रम तीन चार साल तक चला लेकिन मनोरंजन के आथुनिक साधनों के आगमन के साथ ही लोगों के उत्साह और कलाकारों के सम्मान में कमी आने लगी। बाद मे यह क्रम पूरी तरह से टूट गया। उसकी जगह रामानंद सागर के धारावाहिक रामायण ने ले ली। मेरा खुद का मानना है कि रामलीला के उन पुराने कलाकारों की तुलना में रामानंद सागर का टीवी धारावाहिक रामायण उतना जीवंत नहीं हो सका, लेकिन कनुप्रिया नृत्य नाटिका में कृष्ण और राधा की उनुभूतियों की भावपूर्ण प्रस्तुति ने दर्शकों को अभिभूत कर दिया। त्याग और मोह में फंसे कृष्ण और राधा के  मनोभावों, वैचारिक और संवेदनात्मक संदर्भों, पनघट लीला, राधा की विरह वेदना, कृष्ण का गीता का उपदेश आदि की भावपूर्ण प्रस्तुति की गयी। धर्मवीर भारती  ने कनुप्रिया के माध्यम से आधुनिक संदर्भों में नारी अस्मिता से जुड़े जिन सवालों को उठाया है, कलाकारों ने पूरी जीवंतता के साथ उससे दर्शकों के सामने रखा

कनुप्रिया राधा के विभिन्न अनुभूतियों की गाथा है। इसमें कवि ने नारी अस्मिता पर उसके आधुनिक संदर्भों मे विचार करते हुए उसकी परत दर परत खोलने की चेष्टा की है। राधा और कृष्च का प्रणय अनुभूति जन्य है। यह प्रणय गाथा शाश्वत है जिसका कोई आदि अंत नहीं। राधा कोई मूर्त नारी नहीं, नारी के विभिन्न रूपों का समन्वय है। वह मानती है कि कृष्ण ईश्वर के रूप हैं और वह एट पार्थिव शरीर मात्र है। कर्तव्य पालन के बाद तो वे वैकुंठ चले जायेंगे और वह यहां अकेली रह जाएगी राधा को चिंता इस बात की भी है कि नारी और नारायण के बीच की जो यह दीवार है, क्या वह कभी टूट भी सकेगी? उसके मन में एक और द्वन्द्व है   जो उसके निष्काम प्रेम से पैदा हुआ है। वह सोचती है, नारी अगर मानवीय धरातल से उठ कर नारायण तक पहुंच सकती है तो क्या नारायण को भी नारी के सम्पर्क में कर उसमें वात्सल्य और कोमलता क्यों नहीं सकती?  और यही है आधुनिक नारी  की अस्मिता बोध भगवान जब  जब मनुष्य रूप धारण कर इस धरा धाम पर अवतरित हुए हैं, उन्हें भी एक मनुष्य की तरह ही निराशा और वेदना का एहसास हुआ है। ऐसी स्थिति में नारी ने ही उन्हें सहारा दिया राधा ही वह शक्ति है जिसकी चेतना से कृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ।

राधा के प्रेम और त्याग के इसी परस्पर द्वन्द्व, राधा की आत्मिक तलाश, प्रश्नाकुलता और सत्ता को प्रदर्शित करने का भरपुर प्रयास इस नृत्य नाटिका के माध्यम से किया गया। इस में प्रौढ़ कृष्ण की भूमिका में अनिरुद्ध कुमार सिऔह, युवा कृष्ण की भूमिका में हरेन्द्र कुमार भूषण, राधा की भूमिका में नुपूर कलाश्रम की संचालिका रंजना सरकार, रुक्मिणी की भूमिका में निकिता एवं अर्जुन की भूमिका मे विकास पासवान का अभिनय सराहनीय रहा ।इसके अलावे आयुष, लक्षमण, सुशांत, अर्जुन मोनाली, सीमा, रजनी, हर्षिता, आराध्या ने भी विभिन्न किरदारों की भूमिका का निर्वाह किया। निर्देशन और पार्श्व संवाद रंजना सरकार,  डाक्टर संजय, पंकज और मनीष कुमार श्रीवास्तव का था


brahmanand

ब्रह्मानंद ठाकुर/ बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

 

 

 

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