पशुपति शर्मा के फेसबुक वॉल से साभार

तुम जिसे
कुचलने
मसलने
और मिटा देने पर
आमादा हो…
वो याद आएगा
हमेशा
वो जिंदा रहेगा
हमेशा

जब कभी
जुल्मो-सितम से
तुम छटपटाओगे
वो याद आएगा
जब कभी
मालिकों से सताए जाओगे
वो याद आएगा
जब कभी
नेताओं से छले जाओगे
वो याद आएगा
जब कभी
पुलिसवालों से मार खाओगे
वो याद आएगा
जब कभी
इंसाफ़ की चौखट से दुत्कारे जाओगे
वो याद आएगा
सच कहता हूं
कुचल नहीं पाओगे
वो फिर-फिर
फुनग आएगा

जब कभी मंदी का झूठा राग सुनोगे
वो याद आएगा
जब कभी
नौकरी से निकाले जाओगे
वो याद आएगा
जब कभी
किसानों के आंसू देखोगे
वो याद आएगा
जब कभी
मजदूरों का दर्द समझोगे
वो याद आएगा
जब कभी
‘निर्भया’ की चीखें सुनोगे
वो याद आएगा
सच कहता हूं
मसल नहीं पाओगे
वो फिर-फिर
उठ खड़ा होगा

तुम जो
बाघों की प्रजाति बचाने का ढोंग रचते हो
तुम जो
दहाड़ने वाले जीवों की रक्षा का प्रपंच करते हो
तुम जो
अभ्यारण्य में उनमुक्त जीवों का षडयंत्र रचते हो
पल भर में हो जाते हो
बेनकाब
तुम्हें पसंद नहीं
दहाड़ने वाली इंसानी प्रजातियां
तुम्हें गंवारा नहीं
सवाल करने वाले इंसानी अभ्यारण्य

लेकिन सच कहता हूं
जेएनयू
महज
ईंट-गारे से बनी इमारत नहीं
वो एक सांस्कृतिक
और वैचारिक
इबारत है
तुम मिटा नहीं पाओगे
वो जिंदा रहेगा
हमेशा
पीड़ितों के
सीने में
दबे-कुचलों की
आवाज़ में
प्रतिरोध करने वालों की
जमात में

सच कहता हूं
नहीं
कुचल पाओगे
नहीं
मसल पाओगे
नहीं
मिटा पाओगे
ओ हुक्मरानों
समझ सको तो
समझ लो
एक छोटा सा सच।

-पशुपति शर्मा (23 नवंबर, 2019)