ब्रह्मानन्द ठाकुर

झिझिया बिहार में खासकर मिथिला और बज्जिकांचल का प्रमुख लोकनृत्य है। इसका आयोजन शारदीय नवरात्र में किया जाता है। यह पूरी तरह से महिलाओं का आयोजन है। इसमें गांव की महिलाएं अपनी सहेलियों के साथ गोल घेरा बनाकर नृत्य और कथा का सस्वर गायन करतीं हैं। नृत्य के समय महिलाओं द्वारा निर्मित गोलाकार घेरे के मध्य एक महिला अपने माथे पर चार-पांच घड़ा लिए खड़ी रहती है। घड़े मे अनेक छिद्र बने होते हैं और उसके अंदर दीपक जल रहा होता है। महिलाएं एक साथ तालियां बजाती, थिरकती हुई जब नृत्य और कथा गायन करती हैं तो अदभुत समा बंध जाता है। इस लोकनृत्य के पीछे गीतों की भरमार होती है। गीत की शुरुआत भगवती वंदना ‘ तोहरे भरैसे माई रे झिझियो बनई ली,  माई हे झिझिया पर होइअऊ न सहाय’ जैसे गीत से की जाती है और इसका अंत  ‘दीर गे डईनी दुर बेटखौकी, काहेला गुन-धुन सिखले गे जैसे गीत रात भर महिलाएं गाती हुई,  नाचती हुई भोर में इस गीत के साथ ‘ चल चल गे डईनी कदम तर तोरा बेटा के खबऊ ‘दूसरी रात तक के लिए अपने आयोजन को विराम दे अपने-अपने घरों को लौट जाती हैं। यह सिलसिला कलश स्थापन से नवमी तक चलता है। विजयादश्मी के दिन कुंवारी कन्याओं को भोजन कराने के बाद यह अनुष्ठान पूरा होता है।

झिझिया एक पौराणिक लोककथा पर आधारित लोकनृत्य है। इसका सम्बंध 17 वीं शताब्दी में मुगल सम्राट औरंगजेब के काल से जुड़ा हुआ बताया जाता है। रूपनगर के राजा चित्रसेन की बहन चित्रावली का विवाह नेपाल के राजा धरनीधर के पुत्र सुजान से हुआ था। कुछ दिनों बाद चित्रावली ने एक सुन्दर बालक को जन्म दिया। माता-पिता ने उस बालक का नाम रखा – बालरूप । यह बालक देखने में जितना सुंदर था उतना ही सुशील। गोरा रंग,  घुघराले बाल , बड़ी-बड़ी आंखे। देखने वाला इस बालक को एक नजर देख कर ही मोहित हो जाता। उसका दुर्भाग्य रहा कि जब वह 6 साल का ही था तो उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई। अनाथ बालरूप दर-दर की ठोकरें खाने लगा। उसके मामा चित्रसेन को जब इस घटना के बारे में पता चला तो वह उसे अपने घर ले आए। अपने मामा चित्रसेन के संरक्षण में रहते हुए बालरूप जब बचपन से किशोरावस्था में पहुंचा तो उसकी सुन्दरता और शारीरिक गठन पहले से भी आकर्षक हो गया। जिसपर वालरूप की मामी भी मोहित हो गई । कहते हैं कि उससे बालरूप में अपने वश में करने की बहुत कोशिश की लेकिन जब वो नाकाम रही तो वो उसे मारने का आदेश दे दी ।

उधर कसाई जब बालरूप को लेकर मारने के लिए जंगल की ओर चला तो उसके निष्कलंक रूप को देख वह भी मोहित हो गया। उसके मन में बालरूप के प्रति ममत्व पैदा हो गया । उसने उसे सारी बातें बता दी और कहा कि वह अब इसी जंगल मे छुप कर अपना जीवन व्यतीत करे। मामा के यहां लौटने पर उसकी जान पर हमेशा खतरा बना रहेगा। इतना कहकर वह कसाई जंगल में एक सियार को मार, उसका कलेजा निकाल लिया और रनिवास में आकर उस कलेजे को रानी को सुपुर्द कर दिया। रानी तो यही चाहती थी कि किसी तरह बालरूप मारा जाए ताकि उसको चैन मिले। उसने दासी से कहकर सियार के उस कलेजे को बाहर फेंकवा दिया। दूसरे दिन ही वह पूर्ण स्वस्थ हो गई।

उधर बालरूप को मारे भूख-प्यास के जंगल मे भटकते हुए दूर कहीं फूस की एक कुटिया दिखाई पड़ी। वह किसी तरह उस कुटिया के पास पहुंचा। उस कुटिया में एक बुढिया अकेली रहती थी । वह भी अव्वल दर्जे की डाईन थी। कोई दूसरा उपाय न देख कर बालरूप बुढ़िया के साथ उसी कुटिया में रहने लगा। वह भी उसे बेटे के समान मानने लगी। बालरूप जंगल से कंद- मूल खोज कर लाता और उसी से दोनों का गुजारा होता।

कहते हैं कि औरंगजेब की सेना जब 1672ई0 में इसी जंगल के रास्ते कहीं आक्रमण करने जा रही थी तो उसकी नजर उस बुढिया पर पड़ी। उन लोगों ने उसे सनातनी सम्प्रदाय का समझ कर उसकी हत्या कर दी। उसी सेना के हाथों बालरूप भी मारा गया। इसी लोककथा के आधार पर बज्जिकांचल समेत मिथिलांचल के गांवो में झिझिया आज भी अपनी पहचान कायम किए हुए है। गुजरात में इसे गरबा नृत्य के रूप में शासकीय मान्यता प्राप्त है। बिहार में इस पारम्परिक लोकनृत्य को बचाने और इसे एक ब्रांडेड लोकनृत्य के रूप मे मान्यता देने की दिशा में कोई शासकीय पहल नही की जा रही है ।

इन लोक कलाओं का सही मायने में विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक हर किसी के जेहन में ये रच-बस ना जाएं । ऐसे में आज के परिवेश के मुताबिक इसमें कोई परिवर्तन करने हों तो वो किए जाने चाहिए ताकि हर किसी की भागीदारी सुनिश्चित हो सके । कोई भी कला या संस्कृति अगर वक्त के साथ खुद में कुछ बदलाव नहीं लाती है तो वो अपना अस्तित्व खो देती है ।इसमें कोई संदेह नहीं कि बिहार में गांव जवार की टीम कला और संस्कृति को संजोने का जो कार्य कर रही है वो काबिले तारीफ है । ऐसे में हमें उनका साथ देना चाहिए ।


ब्रह्मानंद ठाकुर। BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।