ब्रह्मानंद ठाकुर

जार्ज फर्नान्डिस एक ऐसा नाम जो 60-70 के दशक में मजदूरों की बुलंद आवाज बनकर उभरा और देखते ही देखते हिंदुस्तान के सियासी पटल पर अपनी अमित छाप छोड़ गया । राजनीति का एक ऐसा लड़ाका जिसका हाव भाव और पहनावा बिल्कुल आम इंसान जैसा रहा । वो सिर्फ बातों से ही नहीं बल्कि विचारों और व्यवहार से भी समाजवादी थे । जार्ज साहब आज के समाजवादियों से बिल्कुल अलग थे । सादगी जिसकी पहचान रही। पूंजीवादी सत्ता के खिलाफ वो हमेशा लड़ते रहे । जार्ज फर्नांडिस का तेवर जुझारू था और इसी जुझारू तेवर के कारण वे कांग्रेसी हुकूमत की आखों में खटकने लगे। समाजवादियों की पहचान है कि उनसे पूंजीवादी राजसत्ता हमेशा भय खाती रहती है। जार्ज साहब से इमरजेंसी वाली कांग्रेस हुकूमत भी भयभीत थी। 1975 में देश में इमरजेंसी घोषित होने के बाद बडौदा डायनामाइट कांड में 10 जून 1976 को जार्ज साहब को कलकत्ता से गिरफ्तार कर तिहाड़ ल में बंद कर दिया गया ।

जब इमरजेंसी हटाई गई और 1977 में चुनाव की घोषणा हुई तो कांग्रेस का मुकाबला इसी जनता पार्टी से हो रहा था। जार्ज मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार थे। खुद तो वे तिहाड़ जेल में कैद की सजा काट रहे थे और मुजफ्फरपुर में जार्ज साहब को रिकार्ड मतों से जिताने का चुनावी अभियान चलाया जा रहा था। निर्वाचन क्षेत्र के हर गांव, कस्बे और गली-गली जार्ज फर्नांडिस की जंजीर से जकड़ी तस्वीर वाला पोस्टर दिखाई दे रहा था। मुझे याद है कि जार्ज फर्नांडिस की जंजीरों से जकड़ी तस्वीर वाला पोस्टर देख सुदूर देहात की एक बुजुर्ग महिला अचानक श्रीमती इंदिरा गांधी को कोसने लगी और कहने लगी ‘अरे बापरे बाप, एहन सुन्नर जवान लड़िका आ एकरा गतर -गतर जंजीर में के। ‘बान्ह क जेल मे ध देलक ? भला न होतई निरदइया के ।’ चुनाव का खर्च भी मतदाताओं और कुछ संगठनों ने जुटाया था। परिणाम घोषित हुआ तो जार्ज साहब जीत गये वो भी तीन लाख से अधिक वोटों से। बिना अपने नेता को देखे जनता ने उन्हें जो प्यार दिया वैसा उसके बाद शायद ही किसी को मिला हो। केन्द्र में जनतापार्टी की सरकार बनी। जार्ज साहब उद्योगमंत्री बनाए गये। सरकार ने डायनामाइट कांड वाला मुकदमा वापस ले लिया तब जार्ज साहब मुजफ्फरपुर आए।

गजब का उत्साह देखा मैंने इस समाजवादी नेता में। सुबह से देर रात तक अपने निर्ववचन क्षेत्र का दौरा। मतदाताओं और कार्यकर्ताओं से मिलना-जुलना । कभी थकने का नाम नहीं। गांव की ओर जब उनका काफिला निकलता तो लोग सड़क के दोनों ओर घंटों अपने इस नेता का इंतजार करने लगते। जार्ज साहब के आते ही ‘जार्ज फर्नांडिस जिंदावाद का नारा गूजने लगता और लोग अपने प्रिय नेता को दोनों हाथ से पकड़ कर ऊपर उठा लेते थे। उन्होंने मुजफ्फरपुर को मुम्बई बनाने की बात कही थी। मुजफ्फरपुर को उन्होंने आईडीपीएल कारखाना दिया । भारत बैगन कम्पनी ( बटलर कम्पनी ) का राष्ट्रीयकरण जार्ज साहब की ही देन रही। हालांकि जिस एनडीए के कभी वे संयोजक हुआ करते थे, उसी के शासन में यह कारखाना बंद हो गया । कांटी थर्मल पावर भी जार्ज साहब की ही देन है।मुजफ्फरपुर दूरदर्शन केन्द्र की स्थापना में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। भले ही जार्ज फर्नांडिस अब नही हैं मगर ये उपलब्धियां उनके खाते में हमेशा रहेगी।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।