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वीरेन नंदा

किस्सागोई के पिछले अंक में आपने पढ़ा कि कैसे कहानीकार को लेखक की कीताबों की समीक्षा का सुझाव मिलता और उसपर अमल भी शुरू हो जाता है और वो समीक्षा एक पत्रिका में प्रकाशित भी हो जाती है । फिर क्या लेखक और कहानीकार को बैठकी का नया अड्डा मिल गया, और अब आगे…

चोरवा प्रकाशन से बाहर आए तो खुली हवा के झोंको ने मन को थोड़ा शांत किया। हम आगे बढ़े। बढ़ते हुए सोच रहे थे कि हम दोस्तों के साथ तो ये एक क्षण भी ऐसा बर्दाश्त नहीं करते । झगड़ पड़ते हैं किन्तु आज शांत कैसे । पत्रिका में विस्फोटक सम्पादकीय लिखने वाले, जुल्म और अपमान के विरुद्ध विद्रोह की धारदार कहानियां लिखने वाले की वाणी का ओज आज किधर लुप्त हो गया ? ऐसी बेइज़्ज़ती पर इस क़दर खामोशी । मेरे कोंचने पर भी खुले नहीं । तब ट्यूबलाइट की तरह भुकभुकाया दिमाग । बात तब समझ में आई कि आज तरल का आचमन तो हुआ नहीं अब तक । तभी सुप्त है इनकी सारी इन्द्रियाँ । गया होता तो अब तक बब्बर शेर हुए होते। कण्ठ भूखा तो वाणी सूखी । उन्हें पान लेना था । टहलते हुए हमलोग कल्याणी चौक की ओर टहल गए। कल्याणी की ओर बढ़ते हुए रास्ते भर मलामत की, लेकिन क्या मजाल कि लब खुलते । कल्याणी पहुंच वे पान लेने लगे इसी बीच मेरा एक परिचित सामने से टकराया। नमस्कार कर शिकायत की – ‘ दुकान के उदघाटन में आये नहीं ‘। मौके की नजाकत भाँप उसे धर दबोचा  – ‘ तो चलिये आज चलता हूँ ‘- वो दुकान बढ़ा कर लौट रहा था लेकिन मेरा मुरीद होने के कारण खुशी-खुशी चल कर पुनः दुकान खोली।

वह दूकान नहीं पूरा ऑफिस था। शीशे का बड़ा सा टेबल। रिवॉल्विंग चेयर जिसकी पन्नी अभी हटी नहीं थी। नई अलमारियां, फाइलिंग कैबिनेट। खिड़कियों पर चमकते पर्दे । हमलोग अंदर आ बैठें तो वह झटपट बोतल, पानी, गिलास की व्यवस्था कर चखना के इंतेज़ाम में निकल गया। लेखक को बहुत बुरा भला कहा कि मित्रों से छोटी छोटी बात पर अपमानित हो जाते हैं । लड़ने पर उतारू हो जाते हैं और उस टँगरी पसारे फ्रोफेसर के दुस्साहसिक हरकत पर मौन । सारी हेकड़ी निकाल दी आप की । ऐसी बेइज्जती…..फिर भी मौनी बाबा मौन ही रहे । दुकानदार चखना लेकर लौटा और जाम बना हमारी तरफ बढ़ाया। जाम थामते लेखक की बांछे खिल उठी। एक सांस में गटक कर उठे और -‘ पांच मिनट में आता हूँ ‘….कह कर बाहर निकल गए। दुकानदार से उसके नये व्यवसाय के बारे में बातें होने लगी। इसी बीच चिकेन चिली आ गया। गिलास खाली था , उसने दूसरा पैग बनाया। तब तक लेखक भी पधार गए। चिकन चिली का एक टुकड़ा मुँह में डाल दूसरा पैग सटक कर उन्होंने बैग से एक कागज, कार्बन, कलम निकाली और दूसरे टेबल पर बैठते हुए -‘मुझे कुछ देर डिस्टर्ब न करें’…कह कर कागज़ के नीचे कार्बन रख कर कुछ लिखने में तल्लीन हो गए। जाम चलता रहा वो भी चिकन चेंप-चांप- चुस्की लेते रहे, लिखते रहे। लिखना खत्म कर फिर वे जोशोखरोश के साथ हमारे बीच आ गए। रात गहराने लगी थी। बोतल का तरल भी तलछट चूम रहा था। हमलोग वहाँ से करीब बारह बजे छक- छका कर निकले तो हम सब के क़दम लड़खड़ा रहे थे।

दुकानदार विदा ले अपनी बाइक स्टार्ट कर बढ़ चला और हम मुझको यारों माफ़ करना गाते, लड़खड़ाते, रिक्शा तलाशते छोटी कल्याणी होते हुए राजवंशी पान की दुकान तक जा पहुंचे।

राजवंशी दुकान समेट रहा था। वहां पान खाते हुए एक रिक्शा आता दिखा। हाथ के इशारे से उसे रोका और उस पर आलुढ़ हो हमलोग चल पड़े। सड़क पर सन्नाटा पसर गया था। बियर और विस्की का मिलन कमाल कर रहा था। ये कॉकटेल भी कमाल की चीज है। रिक्शा आगे बढ़ा तो शहर की बिजली कट गई। अंधेरे में बढ़ते हुए जब हाथी चौक से आगे बढ़ने लगे तो लेखक ने रिक्शा दाहिने तरफ मोड़ने को कहा। दाहिने मिठनपुरा थाना था। रिक्शा अंदर जाने के लिए मुड़ा, किन्तु घुप्प अंधेरे में किसी को आता देख उसने ब्रेक लगाई कि उधर से तेज आवाज गूंजी-  ‘ कौन ‘ ?

‘मैं हूँ …मैं…लेखक ‘- उससे भी तेज आवाज में लेखक बोल पड़े। तरल उनकी खामोशी को रुख़सत कर चुका था ! ‘ बड़े भाई नमस्कार ! इतनी रात को ?’- इंस्पेक्टर की मदहोश आवाज़ इन्हें देख मिमियायी।

‘ हाँ, इतनी रात को ! यह एफ.आई.आर.है ‘- रिक्शा से उतर कर उन्होंने इंस्पेक्टर को कागज बढ़ाते बोले- ‘ एक साहित्यिक तस्कर के विरूद्ध !’

‘ तस्कर ?’ – चौंक कर पूछा इंस्पेक्टर ने -‘ किस चीज की तस्करी करता है ‘ ?    ‘लेखन की ‘ – लेखक ने कहा। मेरा दिमाग चकराने लगा ! ये क्या कह रहे हैं !  ‘ कहाँ रहता है ?  – इंस्पेक्टर ने पूछा।                                                                ‘बहार यूनिवर्सिटी के कैंपस में ‘ – लेखक ने बताया। इंस्पेक्टर कागज जेब में डालते हुए बोला -‘ साले को टँगवा के मंगवाता हूँ कल सबेरे…. फोर्स भेजकर ! रात बहुत हो चुकी, आप जायें। बाकी मुझ पर छोड़ दें’। उसने आदरपूर्वक लेखक को रिक्शे पर सहारा दे कर बैठाया। रिक्शा चल पड़ा।

‘ इंस्पेक्टरबा भी फुल वॉल्यूम में था ‘ – रिक्शा जब थाना से आगे बढ़ गया तो लेखक ने ठहाका मार कहा। ‘ कुछ समय पहले तक तो बोली फूट नहीं रही थी…..’- मेरे यह कहते ही खीझ उठे और…’ इसे घर पर आराम से पढ़ कर कल लौटा देंगे ‘ – मेरी बात काटते हुए बेग से एक कागज निकाल मुझे थमाते हुए कहा…’इंस्पेक्टर को जो कागज दिया है उसी की कार्बन कॉपी है, मुझे अपमानित करने का मज़ा उसे कल मालूम पड़ेगा !’ ….तरल अब अपने शबाब पर था -‘ उसने मुझको …मेरे जैसे….इस राष्ट्रीय लेखक को ! जिसे पूरा देश सलाम करता है….है किसी की हिम्मत ! जो मुझे कुछ कह सके…और उ दो कौड़ी का प्रोफेसरा की इतनी हिम्मत !  ….उसे अपने किये की ऐसी सज़ा मिलेगी….ऐसी मलामत होगी, कि अपने टांग पर खड़ा न हो पायेगा जिसे वो स्साला हिला रहा था….मुझे बेइज्जत करेगा ! वो भी सबके सामने ….क्या समझ रक्खा है ? …मेरी चिट्ठी ले-ले कर देश की बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में लेख छपवाता रहा और मुझी से म्याऊं !’

….और उनका यह म्याऊं-म्याऊं घर पहुंचने तक जारी रहा ! अपने घर के मोड़ पर जब रिक्शा रूकवाया तो कहने लगे-‘मुझे घर तक छोड़ दें’…जबकि सामने ही उनका घर था लेकिन रिक्शावाले को पैसा न देना पड़े इस कारण अपने दरवाजे तक रिक्शा ले गए आखिर ! पैसा चुकता कर विदा होते मैंने कहा – ‘भई, दारू भी कमाल की चीज होती है ‘। इस पर वे मुड़े और लिपट कर कहा – ‘ क्या चीज पिलाई हो द्वारिका वाले स्टाइल में..’ कि मेरा शर्ट उनके पान के छींटों से भर गया। …..


वीरेन नन्दा/ बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति समिति के संयोजक। खड़ी बोली काव्य -भाषा के आंदोलनकर्ता बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री पर बनी फिल्म ‘ खड़ी बोली का चाणक्य ‘ फिल्म के पटकथा लेखक एवं निर्देशक। ‘कब करोगी प्रारम्भ ‘ काव्यसंग्रह प्रकाशित। सम्प्रति स्वतंत्र लेखन। मुजफ्फरपुर ( बिहार ) के निवासी। आपसे मोबाइल नम्बर 7764968701 पर सम्पर्क किया जा सकता 

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