ब्रह्मानंद ठाकुर

छठ पर्व जितना आस्था और विश्वास का पर्व है उतना है वैज्ञानिक भी । छठ का प्रकृति से गहरा नाता है इसीलिए छठ व्रत में इस्तेमाल होने वाली सामग्री हो या फिर पूजन का स्थान सभी प्राकृतिक और नैसर्गिक होती हैं । खास बात है ये कि जिस छठी मईया का व्रत रखा जाता है उसके लिए उस सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है जिसकी वजह से ही जीवन का वजूद टिका है । ये अलग बात है कि पौराषणिक और लोक कथाओं के हिसाब से अलग-अलग समय-काल में संसार में कई मान्यताएं प्रचलित हुई । इन्हीं तमाम मान्यताओं की चर्चा छठ के मौके पर करना जरूरी है । ऐसी मान्यता है कि षष्ठी (छठी मईया ) बच्चों की रक्षा करती हैं, रोगी को आरोग्य प्रदान करती हैं। बीमार को स्वस्थ काया और निर्धन को धन देने वाली देवी हैं। देवी भागवत में इससे सम्बंधित एक कथा है। एक राजा था प्रियव्रत। उसने किसी कारण से राज-काज छोड़ कर सन्यास ले लिया। उसकी पत्नी उस समय गर्भवती थी। समय पूरा होने पर उसने एक मृत बालक को जन्म दिया। मां करुण क्रंदन करती हुई उस मृत बालक को श्मशान ले गई। जब वह श्मशान में अन्त्येष्ठि की तैयारी कर रही थी, तभी शुभ्र वस्त्र धारण किए एक सुंदर रमणी अचानक वहां प्रकट हुई। उन्होंने रानी को ढांढस बंधाते हुए उसके मृत बालक का उपचार शुरु कर दिया। कुछ ही देर में मृत बालक जीवित हो उठा। उस देवी ने बालक का नाम सुव्रत रखा और पूछने पर अपना परिचय षष्ठी के रूप में दिया।

एक मान्यता ये भी है कि महर्षि च्यवन की पत्नी सुकन्या ने षष्ठी व्रत करके ही अपने अंधे पति की दृष्टि लौटाई थी। लोक देवता कारिख ने भी अपने पिता ज्योति की तलाश से पूर्व षष्ठी का व्रत किए थे। लोक आस्था के इस महापर्व के बारे में किंवदन्ती हैं कि इसे सबसे पहले अत्रि मुनि की धर्मपत्नी अनुसूइया ने किया था। कृष्ण के पुत्र शाम्ब को जब स्वयं कृष्ण के शाप से कुष्ठ हो गया तो षष्ठीव्रत करने से ही उन्हें इस रोग से मुक्ति मिली थी। बज्जिकांचल समेत मिथिलांचल में  छठी मईया को लोक मातृका का दर्जा प्राप्त है। इन्हें सौर संस्कृति की वाहिका और लोक संस्कृति की संरक्षिका कहा गया  है। इसे सूर्य षष्ठी भी कहा जाता है। इस पर्व में गाए जाने वाले लोकगीतों में सूर्य और षष्ठी का सम्बंध भाई-बहन का बताया गया है-‘कोपी-कोपी बोलथिन छठी मईया, सुन हो सुरूज भइया/हंसी-हंसी बोलथिन सुरूज भइया, सुनहु हे छठी बहिनी/हम रउरा मनसा पुराएब, त करब वरत रउरा। ‘

इस पर्व में मूल रूप से अर्ध्य सूर्य को प्रदान किया जाता है और गीत छठी माई के गाए जाते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि जिस तरह कौशिक मुनि ने बहन कौशिकी, कोयला ने बहन कमला की, गोरैया ने बहन बन्नी की और भैरव ने बहन काली की पूजा की थी, ठीक उसी तरह सूर्य ने बहन षष्ठी की पूजा की। दोनों आपस में इस तरह एकाकार हैं कि षष्ठी को सूर्योपासना का व्रत मान लिया गया। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि पृथ्वी के समस्त जीवधारी प्राणियों के लिए सूर्य की किरणें जीवनदायिनी होती हैं। जिसकी किरणों से धरती में उर्वरा शक्ति पैदा होती है। फल-फूल और फसलें पैदा होती हैं और पृथ्वी का जीवन चक्र सतत गतिमान बना रहता है। इस लिए आवश्यक भी है कि धरती से उत्पन्न होने वाली वस्तुएं पहले सूर्य को प्रतीकात्मक रूप से अर्पित की जाएं। यह प्रकृति षष्ठी का छठा अंश माना गया है। इसी ने धरती और आकाश की एकता कायम की है। पौराणिक आख्यान के मुताबिक यह व्रत-विधान मूलत: प्रकृति पूजा से सम्बंधित है। सूर्य पूजा का सम्बंध आर्यों से भी माना गया है। बिहार में सूर्योपासना से सम्बद्ध अनेक  प्राचीन स्थल हैं जिसमें देवार्क (देव), अवलार्क (पटना), पुण्यार्क (पण्डारक), कमला दिल( मधुबनी) प्रमुख हैं। षष्ठी का एक रूप षष्ठी मातृका भी है जो उसके छठे अंश से उत्पन्न माना गया है।

धार्मिक निष्ठा, शुचिता, सामाजिक सौहार्द और समता मूलक मनोवृति के कारण छठ व्रत अन्य व्रतों की तुलना में काफी महत्वपूर्ण है। इस पर्व में केला का उतना ही महत्व होता है, जितना अन्य पूजन सामग्रियों का। व्रती काफी पहले से ही पर्व के उपयोग में लाए जाने वाले केले के घौद की सुरक्षा में तत्पर हो जाते हैं। बगान में एक घौद निकला है। बगान की मालकिन ने उस घौद को रौना माई के नाम अर्पित कर दिया है।

सूर्य षष्ठी का चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व कठोर आत्मसंयम का पर्व है। इसका सम्बंध वैदिक काल से भी है। वाल्मीकि रामायण में इस बात का उल्लेख है कि अगस्त ऋषि ने भगवान राम को यह व्रत करने की सलाह दी थी। ताकि वह अपने अभियान में सफल हो सकें। नहाए-खाए से शुरू हो कर खरना, सांध्यकालीन अर्घ्य और चौथे दिन प्रात: कालीन अर्घ्य के साथ इस पर्व का समापन होता है। इस दौरान शुचिता पर विशेष ध्यान रखा जाता है। इस अवधि में तेल का स्पर्श, नीला वस्त्र धारण, मांस भक्षण, कलह, जुआ खेलना, शव दर्शन, असत्य भाषण, शोक, क्रोध, लोभ,और गरिष्ठ भोजन वर्जित होता है। इसका मूल विधान प्रकृति पूजा से सम्बंधित है। इसमें विभिन्न नदियों और तालाबों के किनारे उस मौसम में उत्पन्न होने वाले फल-फूलों से सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य के उगने की बड़ी बेसब्री से व्रतियों को प्रतीक्षा रहती है ‘उग हो सुरूज देव भेल अरघ के बेर।’  हो भी आखिर क्यों नहीं, आखिर सूर्य की यही ज्योति तो जीवन देने वाली है।


ब्रह्मानंद ठाकुर। BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

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