फ़ाइल फोटो

अजीत अंजुम

फिरोज-इंदिरा और नेहरु के रिश्तों के कई उलझे तार इंदिरा और फिरोज पर लिखी किताबों में दिखते हैं। कहीं-कहीं फिरोज के वर्ताव से ऐसा मतलब भी निकाला गया है कि इंदिरा के बेहद शक्तिशाली होते जाने और कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद फ्रस्ट्रेट रहने लगे थे। उन्हें इंदिरा से जलन होने लगी थी। हालांकि इसे गलत साबित करने वाले कई लोग हैं। कुछ लोगों का ये भी मानना है कि फिरोज को नेहरु से उतनी परेशानी नहीं थी,  जितनी इंदिरा से थी। उस दौर के मशहूर नेता मीनू मसानी के मुताबिक एक बार मौत से कुछ दिन पहले फिरोज ने उनसे पीएम हाउस का जिक्र करते हुए कहा था- “ मीनू, आप तो अक्सर उस बूढ़े आदमी ( नेहरु ) से मिलने जाते हो। मैं तुम्हें बता दूं कि उस घर में वो सबसे जहीन आदमी हैं। “तभी मीनू मसानी को फिरोज ने ये भी बताया था कि वो पीएम के बुलाने पर सिर्फ रविवार की सुबह ब्रेकफास्ट पर वहां जाते हैं, ताकि अपने बच्चों से मिल सकें। मीनू मसानी के मुताबिक “फिरोज गांधी देशभक्त थे। उनमें कमाल का सेंस ऑफ ह्यूमर था। कभी किसी पर धौंस नहीं जमाते थे। उन्हें जितना मिला, उससे ज्यादा के वो हकदार थे“ फिरोज गांधी के बंगले के ठीक बगल वाले उस समय के डिप्टी मिनिस्टर बलिराम भगत के मुताबिक “वैचारिक तौर पर फिरोज नेहरु के करीब थे लेकिन वामपंथी नेताओं से भी उनकी काफी दोस्ती थी। वो खुद वामपंथी नहीं थे लेकिन वैचारिक तौर पर प्रोग्रेसिव थे। आम लोगों की तरह रहना और उनकी समस्याओं को समझकर संसद में उठाना उन्हें अच्छा लगता था। उस दौर के बड़े-बड़े नेता भी फिरोज की वाकपटुता और संसद में बोलने की शैली को पसंद करते थे“

फ़ाइल फोटो

फिरोज नेहरु के दामाद थे। ये जमाने के लिए अंतिम सत्य था, लेकिन फिरोज पीएम के दामाद होने के ठप्पे से निकलने की कोशिश करते हुए अक्सर देखे गए। ये नेहरु की कद्दावर इमेज और अपनी ताकतवार पत्नी के नाम से अलग अपना नाम बनाने की कवायद थी। यही संघर्ष दोनों के रिश्तों को भी ले डूबा। इंदिरा पर लिखी गई गई किताबों में फिरोज के बारे में ऐसे कई किस्से हैं, जिससे पता चलता है कि वो एक सांसद के तौर पर, एक नेता के तौर पर, एक इंसान के तौर पर अपनी अलग छवि गढ़ना चाहते थे।

ऐसे कई दिलचस्प वाकये हैं, जब फिरोज ने अपनी अलग लकीर खींचने की कोशिश की। 1956 में एक बार सोवियत यूनियन के सबसे बड़े नेता ख़्रुश्चेव और बुलगनिन दिल्ली आए हुए थे। दिल्ली में उनके भाषण का एक कार्यक्रम था। इंदिरा तो अपने प्रधानमंत्री पिता के साथ वहां वीआईपी ट्रीटमेंट में पहुंच गई। सुरक्षा कारणों से फिरोज गांधी समेत कुछ सांसदों को कार्यक्रम स्थल तक जाने नहीं दिया गया। फिरोज ने अगले दिन संसद में इस मुद्दे पर हंगामा कर दिया। नतीजा ये हुआ कि नेहरु को सदन में सांसदों से माफी मांगनी पड़ी। ऐसा ही वाकया एक बार और हुआ। एआईसीसी के एक कार्यक्रम में नेहरु को भाषण देना था। आगे की सीट पर नेहरु के साथ इंदिरा भी बैठी थीं। वहां कांग्रेस के कुछ नेता अपने परिवार के सदस्यों को लेकर आ गए। जबकि ये पारिवारिक कार्यक्रम नहीं था। पीछे की सीट पर बैठे फिरोज चिल्लाए -“ मैं अपनी पत्नी को लेकर नहीं आया हूं।“ उनके कहने का मतलब ये था कि नेहरु अपनी बेटी को लेकर आए हैं। फिरोज के इस वर्ताव से ठहाके गूंजने लगे। फिरोज-इंदिरा के बारे में लिखने वालों का ये भी कहना है कि शुरुआती दिनों में नेहरु ने फिरोज को स्टैबलिश करने की कई कोशिशें की। चाहे नेशनल हेरल्ड में मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया जाना हो या रामनाथ गोयनका से कहकर एक्सप्रेस की नौकरी दिलानी हो, लेकिन फिरोज अपनी जिंदगी को उस तरह से प्लान करने में नाकाम हो रहे थे, जैसे इंदिरा गांधी चाहती थीं।

फ़ाइल

फिरोज की कुछ कमजोरियां भी थी। इंदिरा गांधी की जीवनी लिखने वाली कैथरीन फ्रैंक के मुताबिक खाना, पीना और से*क्स उनकी कमजोरी थी। उनकी किताब में इस बात का जिक्र है कि फिरोज रंगीन मिजाज भी थे। कई महिलाओं से उनकी दोस्ती थी। उनकी छवि वू*मनाइजर वाली थी। प्रणय गुप्ते ने लिखा है कि फिरोज के बारे में कहा जाता था कि सियासी सर्किल में उपलब्ध खूबसूरत महिलाओं से उनकी काफी दोस्ती थी। फिरोज की इस छवि के बारे सारी खबरें इंदिरा तक पहुंचती थीं। वो इन बातों से काफी नाराज होती थी। इंदिरा को लगता था कि फिरोज अपनी इमेज और राजनीति को लेकर बिल्कुल सीरियस नहीं हैं। फिरोज गांधी की महिला मित्रों की लिस्ट में उस जमाने की सांसद और सदन की ग्लै*मर गर्ल कही जाने वाली तारकेश्वरी सिन्हा, महमुआना सुल्ताना, सांसद सुभद्रा जोशी समेत कई महिलाएं थी। इनमें ऑल इंडिया रेडियो के लिए काम करने वाली नेपाली महिला भी थी। उस दौर के मशहूर पत्रकार निखिल चक्रवर्ती के हवाले से फिरोज, द फॉरगोटेन गांधी में लिखा गया है – दिल का दौरा पड़ने से फिरोज के निधन के बाद तीन मूर्ति भवन में उनके शव को रखा गया था। फिरोज की सभी गर्ल फ्रेंड वहां उनके शव के पास चीख-चीखकर रो रही थी। इंदिरा गांधी शव के पास पत्थर की मूर्ति की तरह बैठी थी।“

1912 में जन्मे फिरोज गांधी की मौत महज 48 साल में हो गई। 1960 का वो साल था, 7 सितंबर को उन्हें तीसरी बार संसद में दिल का दौरा पड़ा था। वहां से उन्हें विलिंगटन अस्पताल लाया गया। इंदिरा गांधी उस दिन केरल दौरे पर थीं। जब तक वो दिल्ली पहुंचीं, तब तक फिरोज की मौत हो चुकी थी। अंतिम संस्कार उसी तीन मूर्ति से हुआ, जिसे दो साल पहले छोड़कर वो अकेले रहने राजेन्द्र प्रसाद रोड के बंगले पर आ गए थे।


10570352_972098456134317_864997504139333871_nअजीत अंजुम। बिहार के बेगुसराय जिले के निवासी। पत्रकारिता जगत में अपने अल्हड़, फक्कड़ मिजाजी के साथ बड़े मीडिया हाउसेज के महारथी। बीएजी फिल्म के साथ लंबा नाता। स्टार न्यूज़ के लिए सनसनी और पोलखोल जैसे कार्यक्रमों के सूत्रधार। आज तक में छोटी सी पारी के बाद न्यूज़ 24 लॉन्च करने का श्रेय। इंडिया टीवी के पूर्व मैनेजिंग एडिटर।

संबंधित समाचार