सांकेतिक तस्वीर

ब्रह्मानंद ठाकुर

मनकचोटन भाई के दलान पर सांझ होते ही हमेशा की तरह  आज भी टोला के लोगों का जुटान होने लगा। परसन कक्का और बटेसर भाई भी  साथ आए थे। उसके बाद फुलकेसर, भगेरन चच्चा, बिल्टुआ, चुल्हन भाई भी बारी-बारी से पहुंच गये। हल्की ठंड आ गई है तो अलाव के पास बैठकी लग गई तभी घोंचू भाई भी वहां पहुंच गए और मनकचोटन भाई की तरफ ताकते हुए पूछा- आज किस बात पे मंथन हो रहिल बा ?  हमलोग तो इसी बात पर विचार कर रहे हैं कि सूखे से धान की फसल तो मारी ही गई। अब रबी की खेती पर भी आफत है। हथिया  निछत्तर के नहीं बरसने से खेत मे तनिको नमी नहीं है।  खूब जोर से खेत में कोदारी मारो त ठक की आवाज के  साथ कोदारियो ऊप्पर में उछल जात है। बिना पानी पटैले एमरी  बाओ का कोई उपाए नहीं बुझाता हय।  खाद महंगा, बीज महंगी और डीजल का दाम बढ़ने से तो इसबार ट्रैक्टर से खेत जुताई भी  पिछले साल की तुलना में डेओढा हो गया है । डीएपी  और पोटाश  का दाम  सवइया बढ़  गया  है। ऊपर से बाओ से पहले खेत की सिंचाई अलग।  इससे किसान जिएगा कि मरेगा ?

घोंचू उवाच पार्ट -21

पिछला साल अपने गांव में सुकेसर, हरखुआ, मंगरु सहित अनेक छोटे किसानों ने ठीका-बटाई पर हाईब्रिड मकई का खेती किया था।  खूब खाद-पानी दिया । हाथ-हाथ भर लम्बा बाल में एक्को गो दाना नहीं आया। जब काफी हो हल्ला हुआ तब बडका-बडका हाकिम और किरसी वैज्ञानिक खेत देखने आए और इसके लिए मौसम को जिम्मेवार बताकर लौट गये। सरकार को रिपोर्ट भी भेजी गई मुआवजा के लिए मगर आजतक किसी किसान को मुआवजा तक नहीं मिला। जानते हैं घोंचू भाई, साढे चार सौ से पांच सौ रूपये किलो मकई का बीज खरीद कर ई लोग बुआई किया था और हाईब्रिड प्रभेद कितना खाद-पानी खोजता हय से त आप जनबे करते है।  जब फसल काटने का समय आता हय तब किसान माथ-कपार पीटने लगता हय। कोई उपाए नहीं सूझ रहा है कि  क्या किया जाए ?   इस बार कहां से मकई का बीज खरीदें कि फिर धोखा न हो। घोंचू भाई बड़े ध्यान से मनकचोटन भाई के मुंह से किसानों की पीड़ा सुन रहे थे। मनकचोटन भाई की बात पूरी होते ही वहां बइठे सबों की नजर घोंचू भाई पर टिक गई। मानो वे सब उनसे इस समस्या के निदान जानना चाह रहे हों। ऐसा इसलिए भी कि पिछले कुछ सालों से घोंचू भाई हाईब्रिड प्रभेदों की खेती का जम कर मुखालफत करते आ रहे हैं। उन्होंने खुद हाईब्रिड प्रभेद से तोबा कर लिया है।

वे इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि यह मनकचोटन भाई , परसन कक्का, बिल्टु और बटेसर जैसे  कुछ छोटे  किसानों की पीड़ा नहीं, देश के लाखों, करोड़ों किसानों की पीड़ा है। आज किसान हाईब्रिड  प्रभेदों के जाल में बुरी तरह फंस चुके हैं। उनकी मिहनत की कमाई से  मुठ्ठी भर पूंजीपति मालामाल हो रहे हैं और किसान कंगाल होते जा रहे हैं।  अब त नवतुरिया लड़िकन से खेती-पथारी छोड़ दूर शहर में दिहाड़ी करने चल जाता हैं। घोंचू भाई ने  बतकही को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘मनकचोटन भाई, यह सही है कि 1970 के दशक में देश में खाद्यान उत्पादन के मामले में  खेती में हाईब्रिड कल्चर की शुरुआत हुई और  किसानों  ने ब़ड़े उत्साह और उम्मीद से इसे अपनाया भी।  यह भी सही है कि परम्परागत बीजों की तुलना में हाईब्रिड प्रभेद की उपज क्षमता भी अधिक है।लेकिन यह जान लो कि  खेती में हाईब्रिड कल्चर भविष्य में टिकाऊ खेती के लिए एक बड़ी बाधा है। इसमें अधिक पानी, अधिक रासायनिक उर्वरक, अधिक कीटनाशक और अधिक सूक्ष्म  पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इससे जमीन की उर्वराशक्ति का भी अनियंत्रित दोहन होता है।

आज से 10 साल पहले 40 किलोग्राम प्रति बीघा की दर से डीएपी खेतों में डाल कर जितनी उपज लेते थे आज उतनी ही उपज पाने के लिए  80 से 100 किलोग्राम डीएपी खेतों में देना पड़ रहा है।  ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानसून अनियमित हो चुका है। न पहले वाला जाड़ा है, न गर्मी और न बरसात। और जब बर्षा नहीं होगी तो जमीन के नीचे  का पानी भी गायब हो जाएगा।वही आज हो रहा है। फसल की सिंचाई के लिए बड़े पैमाने पर किसान बोरिंग का उपयोग करते हैं। इससे भूगर्भ जलस्तर का बहुत अधिक मात्रा में दोहन होता है। फिर एक समय आता है कि बोरिंग फेल हो जाती है। हाईब्रिड प्रभेद वाली फसलों को कीट व्याधि से बचाने के लिए बड़ी मात्रा में कीट नाशक का प्रयोग करना पडता है। आप देखिए रहे हैं कि बटेसर भाई अपना बैगन  की फसल में जिस दिन कीटनाशक दबाई का छिडकाव करते हैं तो दो दिनों तट नाक पर गमछा रख कर खेत के बगल से गुजरना पडता है। आखिर यह दुर्गंध वायुमंडल को ही न खराब करता है ?

जब से हाईब्रिड बीजों का प्रचलन हुआ है तब से नया-नया खर पतवार की बाढ आ गई है। हमारा पारम्परिक खर पतवार ठोकरा, तेतारी, सामी,  मकड़ा घास जिसे माल मवेशी हरा चारा के रूप में बड़ा चाव से खाता था, कब और कैसे गायब हो गया ? कभी हमलोगों ने सोंचा है इसके बारे में ? हाईब्रिड प्रभेदों के साथ कुछ नई किस्म की जंगली घास भी आ गयी हैं, जिनसे फसलों को बचाने के लिए खर पतवार नियंत्रक  विभिन्न रसायनों का छिड़काव करना पड़ता है। इससे सेहत और पैसा दोनों की बर्बादी होती है। छोटे और मझोले किसान बिना भविष्य की चिंता किए अधिक उपज के लोभ से अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे हैं। नतीजा सामने है, हम और कंगाल होते जा रहे हैं। ज्यों-ज्यों हम रासायनिक खाद की मात्रा खेतों में बढाते  जा रहे हैं, जमीन की उर्वराशक्ति घटती जा रही है। अब तत्काल तो हम परम्परागत बीजों के प्रयोग की तरफ लौट नहीं सकते  मगर, विकल्प है हमें इस विकल्प को अपनाना चाहिए। हम तो इसे पूरीतरह अपना चुके हैं। ‘घोंचू भाई के इतना कहते  ही परसन कक्का बोल उठे   ‘वह विकल्प क्या है, घोंचू भाई, बताइए तो जरा हमलोग भी जान लें।

घोंचू भाई ने कहना शुरू किया-  डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय द्वारा उत्पादित विभिन्न फसलों का बीज।हालांकि पूरे राज्य के किसानों के बीज की जरूरत यह विश्वविद्यालय पूरा नहीं कर सकता लेकिन अपने आस- पास के जिलों के किसान तो इससे लाभ उठा ही सकते हैं।धान, मक्का , गेहूं, तोरी, सरसो, सहित विभिन्न दलहनी, तेलहनी, सब्जी बीज वहां मिलता है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का  450 से 500 रूपये किलो वाले जिस बीज की बात आप कर रहे हैं, इस कृषि विश्वविद्यालय द्वारा उत्पादित मक्के के बीज की कीमत  अधिक से अधिक  150 से 175 रूपये किलो होती है और उपज भी बडी कम्पनियों वाले बीज के समान। मैंने तो इस बार वहां से मक्के का नया प्रभेद शक्तिमान-5   का बीज लाया । जानते हो इसकी उपज क्षमता 40 क्विन्टल प्रति बीघा है। यह भी हाईब्रिड प्रभेद ही है। गेहूं का कोई भी प्रभेद यहां से ले सकते हो। फाउन्डेसन बीज लोगे तो 5 रूपये किलो अधिक दाम लगेगा लेकिन अगले तीन साल तक इसी को बीज के रूप में इस्तेमाल कर सकते हो। तीन साल तक बीज खरीदने के झंझट से छुटकारा।

गेहूं की कटाई के बाद खेत में धैंचा बाओ कर दो। दो-ढाई महीना बाद उसकी जुताई कर  खेत में सिंचाई कर दो। धैंचा सड़ कर अच्छा खाद बन जाएगा। मिट्टी की उर्वरा शक्ति इससे बढती है। हमलोग पुआल और ठठेरा जला देते हैं। उसका उपयोग गोबर के साथ वर्मी कम्पोस्ट बनाने में करें। 60 दिन में यह कम्पोस्ट तैयार हो जाता है। हर फसल में वर्मी कम्पोस्ट के साथ खाद की मात्रा थोड़ी-थोड़ी घटाते जाएं पांच-छ फसल के बाद  जमीन में इतनी उर्वरता आ जाएगी कि अलग से रासायनिक खाद देने का झंझटे खतम। लेकिन इसके लिए बहुराष्ट्रीय  बीज उत्पादक कम्पनियों के मायाजाल से  पहले मुक्त  होना होगा।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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