फाइल चित्र

ब्रह्मानंद ठाकुर

हिंदी दिवस से एक दिन पहले मैंने पूरा दिन 11-4 बजे तक एक उच्च विद्यालय में बिताया। हिन्दी की तीन कक्षाएं लीं। विद्यालय के प्रधान मुझे पहले दसवीं कक्षा में ले गये। इस विद्यालय में करीब 10 वर्षों से हिन्दी के शिक्षक नहीं हैं। अंग्रेजी और संस्कृत विषय के भी शिक्षक यहां नहीं हैं। कभी हिन्दी के जो शिक्षक थे वे विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक हो गये।  पुराने शिक्षक हैं सो कार्यालय की व्यस्तता के बावजूद थोड़ा वक्त निकाल छात्रों को हिन्दी पढ़ा दिया करते हैं, जो किसी विषय की सम्यक जानकारी के लिए पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।

हिन्दी पर विशेष-2

प्राथमिक कक्षा से ही हिन्दी की जो घोर उपेक्षा हुई है उसके चलते उच्च विद्यालय स्तर पर छात्रों में इस विषय के प्रति कोई खास रुचि या उत्साह नहीं है। आधी सदी बीत गयी, जब हम उच्च विद्यालय के छात्र हुआ करते थे, हिन्दी को किसी अन्य विषय से कमतर नहीं माना जाता था। तब इसके दो पत्र हुआ करते थे,  प्रथम और द्वितीय। प्रथम पत्र में व्याकरण, नेत्रदान (बेनीपुरी) और प्रदक्षिणा पुस्तकें पाठ्यक्रम में थीं और द्वितीय पत्र में एक पाठ्यपुस्तक गद्य-पद्य संग्रह। दोनों पत्र की परीक्षाएं अलग-अलग और दोनों में उत्तीर्ण होना जरूरी था। खैर, यह तो तब की बात थी जब 1949 में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जा चुका था और उसके 16वें साल में हम उच्च विद्यालय में पहुंचे थे।

आज जब हिन्दी का न्यूनतम ज्ञान भी उच्च विद्यालय के 10 वीं कक्षा के छात्रों में नहीं पाया तो  थोड़ा विचलित हो गया। कक्षा के करीब 70 छात्रों में महज 5-6 छात्रों के पास ही हिन्दी की पाठ्यपुस्तक थी। पूछने पर मालूम हुआ कि पढ़ाई नहीं होने के कारण अधिकांश छात्र घर से हिन्दी की किताब नहीं लाते। मैंने छात्रों से पाठ्यपुस्तक से कोई एक कविता सुनाने को कहा। सभी छात्र बगले झांकने लगे। किसी को भी एक कविता याद नहीं, यह जानकर ताज्जुब हुआ कि छात्रों को इस विषय में तनिक भी रूचि नहीं। आखिर क्यों ?

यह सवाल आज देश के रहनुमाओं और हिंदी-हिंदी का जाप करने वाले बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों के सामने है। शायद ही कोई इसका माकूल जवाब दे सके। एक छात्र ने टेबल पर हिंदी की पाठ्य पुस्तक रख दी। उलट-पुलट कर देखा। मुक्त छंद वाली कुछ कविताएं पुस्तक के अंत में मिली। एक भी कविता किसी छात्र को याद नहीं। सोचा जब हिंदी दिवस है तो उसके बारे में भी पूछ लिया जाए। मेरे ऐसे सवालों के सामने छात्र निरुत्तर रह गये। चिंता स्वाभाविक है। फिर मैंने कक्षा में छात्रों के हिन्दी व्याकरण के प्रारम्भिक ज्ञान की  नब्ज टटोलनी चाही। कारक की परिभाषा पूछने पर छात्र निरुत्तर रह गये। हां, अधिकांश छात्रों ने कारक के आठ भेद जरूर बताये और आधी-अधूरी उनकी विभक्ति भी बता दी। फिर मैंने उनसे कर्ता के ‘ने’ चिह्न के प्रयोग के बारे में पूछा। यहां भी निराशा ही मिली।

मैंने जब बताना शुरू किया तो छात्रों की भूतकाल के भेद सम्बंधी अज्ञानता सामने आ गई। फिर संक्षेप में ‘काल’  की तरफ लौटा। उन्हें बताया, भूतकाल के छ: भेद और उनमे से पांच, सामान्य , आसन्न, पूर्ण, संदिग्ध और हेतु-हेतु मद भूत कालों और सकर्मक क्रिया वाले वाक्यों में कर्ता के आगे ‘ने’ चिह्न लगता है और कर्म के लिंग, वचन के अनुसार ही क्रिया का भी रूप होता है। फिर मैंने उदाहरण दिया राम ने रोटी खाई/सीता ने भात खाया। मेरे इस उदाहरण पर छात्रों का माथा चकराया। एक छात्र ने पूछ ही दिया, सर, राम पुल्लिंग है तो आपने ‘रोटी खाई’ और सीता स्त्रीलिंग है तो ‘भात खाया’ क्यों बता रहे हैं। तब मैंने उन्हें समझाया, दोनों वाक्य सकर्मक हैं, कर्ता के आगे ‘ने’ चिह्न भी है, इसलिए क्रिया कर्ता के लिंग, वचन के अनुसार नहीं, कर्म ‘ रोटी’ और ‘भात’ के लिंग, वचन के अनुसार ही होगी। रोटी स्त्रीलिंग और भात पुल्लिंग है इसलिए सही वाक्य हुआ, राम ने रोटी खाई और सीता ने भात खाया।

तबतक घंटी बज चुकी थी। मैं कक्षा से बाहर आया। अब मेरे सामने आज हिंदी दिवस पर एक बडा सवाल मुंह बाए खड़ा है कि जब विद्यालय स्तर पर हिन्दी की यह दुर्दशा है तब हिन्दी का भला कैसे होगा । आज हिन्दी दिवस पर हर जगह सरकारी और गैर-सरकारी आयोजन होते हैं। हिन्दी को महिमामंडित किया जा रहा है।  हिन्दी भाषी क्षेत्र के नेताओं से लेकर बुद्धिजीवी तक हिन्दी के गुणगान में कसीदे पढ़ रहे हैं लेकिन हिन्दी तो अपने ही घर में आज उपेक्षित है। इसलिए हिन्दी की चिंता ऊपर से नहीं नीचे से करनी होगी। विद्यालय स्तर से ही हिंदी को लोकप्रिय बनाना होगा।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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