संगम पांडेय

अक्षरा थिएटर में लाइट्स वगैरह की कई असुविधाएँ भले हों, पर इंटीमेट स्पेस में प्रस्तुति का घनत्व अपने आप काफी बढ़ जाता है। फिर वशिष्ठ उपाध्याय की प्रस्तुति ‘हयवदन’ में पात्र-चयन काफी सटीक होने से कुल कलेवर में एक संतुलन और लालित्य हर समय था। उनके दोनों प्रमुख पात्रों- देवदत्त और कपिल- के वाचिक की जो भी खोट थी, वह उनकी कुल छवियों में गौण हो जाती है। लेकिन जिसे कहना चाहिए तुरुप का पत्ता वह इस प्रस्तुति में नायिका की भूमिका में ज्योति उपाध्याय थीं। नायिका पद्मिनी के कई तरह की विलोम भावदशाओं से युक्त उलझे हुए किरदार को ज्योति ने एक लाजवाब एनर्जी और सहजता से अंजाम दिया है। पति के मित्र की ओर एक वर्जित आकर्षण में पड़ी स्त्री का अभिनय है, जिसके द्वंद्व की स्वाभाविकता यहाँ देखने लायक है।

वशिष्ठ उपाध्याय ने पात्रों की देहभाषा पर अच्छा काम किया है, और उतना ही अतुल जस्सी ने कास्ट्यूम और मेकअप पर। खाली मंच इन पात्रानुरूप कास्ट्यूम मात्र से ही भरा-भरा लगता है। अन्य पात्र, मसलन निद्रा देवी, अंतरात्मा और भागवत भी अपने-अपने स्पेस में अच्छा प्रभाव छोड़ते हैं। और एक खाली मंच पर रोशनी, अभिनय और कास्ट्यूम से एक प्रस्तुति सामने आती है, जिसे शंकर नारायण झा और उमेश यादव के संगीत का अच्छा समर्थन रहा है।

भारतीय, खासकर कन्नड़, लेखक अपने माइथॉलॉजी के किरदारों में द्वंद्व का स्रोत इच्छा को दिखाते हैं। वे उस कांशसनेस की चर्चा नहीं करते, जहाँ से इच्छा संस्कारित होती है। हयवदन का द्वंद्व व्यक्ति की इच्छाओं का द्वंद्व ही है, जिसे सुसंस्कृत मस्तिष्क और बलिष्ठ देह एक साथ चाहिए। विश्व-साहित्य में चेखव जैसे लेखक ने हयवदन जैसे कथ्य को ही ‘सिडक्शन’ जैसी कहानी में क्या खूब सहजता से कहा है। उस सहजता का कारण उनके पात्रों की कांशसनेस ही है, जिसे अपने यहाँ पश्चिम की चीज मानकर त्याज्य समझा जाता है और व्यर्थ की गुत्थी बनाकर अधूरे विमर्श की कहानियाँ लिखी जाती हैं।


संगम पांडेय। दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। जनसत्ता, एबीपी समेत कई बड़े संस्थानों में पत्रकारीय और संपादकीय भूमिकाओं का निर्वहन किया। कई पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। नाट्य प्रस्तुतियों के सुधी समीक्षक। हाल ही में आपकी नाट्य समीक्षाओं की पुस्तक ‘नाटक के भीतर’ प्रकाशित।

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