पीयूष बबेले

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति को बुल्डोज किया गया तो पहले गुस्सा और फिर दुख हुआ। जो लोग एक पार्टी विशेष का झंडा वदन पर लपेटे उस मूर्ति को गिरा रहे थे, वे न तो जारशाही के लोग थे, न वे बहुत बड़े पूंजीपतियों के कारिंदे थे, न वे किसी सामंती व्यवस्था के पोषक थे। वे सब तो वही सर्वहारा लोग थे, जिनका नायक लेनिन था। यानी लेनिन के लोग ही लेनिन की मूर्ति गिरा रहे थे।
आखिर क्या वजह थी कि भाजपा का विजय रथ जब महज दो लोकसभा सीटों जितने आकार वाले त्रिपुरा में पहुंचा तो मूर्तियां गिराई गईं। जबकि भाजपा इससे कहीं बड़े राज्य पिछले चार साल में एक के बाद एक जीतती आ रही है। वहां तो कहीं इस तरह के बर्बर दृश्य नहीं दिखाई दिए। कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि भाजपा ने बाकी राज्य कांग्रेस या कांग्रेस गोत्र की पार्टियों से जीते थे, जबकि यह राज्य उसने सीधे वामपिथियों से छीना। शायद हां। क्योंकि कांग्रेस और कांग्रेस गोत्र की पार्टियों में नेता भले ही गुंडे हो जाएं, लेकिन पार्टी की विचारधारा या डीएनए में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने जब देश को आजाद कराया तब भी हिंसा को सिद्धांत रूप में कभी स्वीकार नहीं किया गया। जहां तक गांधी जी की चली वहां तक हिंसा होने के हालात में लाख नुकसान झेलने के बाद भी आंदोलन वापस ले लिए गए।
दूसरी तरफ भारतीय वामपंथ और दक्षिणपंथ है। इन दोनों के मूल सिद्धांतों में हिंसा का कोई निषेध नहीं है। निषेध क्या, एक तरह से स्वीकार्यता या अनिवार्यता ही है। गांधीजी को दक्षिणपंथियों ने तो बहुत बाद में गोली मारी, उसके बहुत पहले उनकी सभाओं में तोड़फोड़ करने का काम भारतीय वामपंथ कर चुका था। ये सारे तथ्य बहुत अच्छी तरह से डोक्यूमेंटिड हैं। गांधी की अहिंसा का मजाक उड़ाने वाले इन संगठनों को आज जब सत्ता में आमने सामने लड़ने का मौका मिल रहा है, तो वे खुलकर लड़ रहे हैं। तभी पूर्वोत्तर में लेनिन की प्रतिमा ढहाए जाने के अगले दिन ही पश्चिम बंगाल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा को अपमानित किया गया। उधर पेरियार की प्रतिमा भी अपमानित हुई है।
घटनाओं की यह शृंखला असल में इस बात की तरफ इशारा कर रही है, कि ऊपर से बहुत जोशीली नजर आने वाली इन विचारधाराओं के भीतर छुपी हिंसा हमारे लिए कितनी घातक है। लेकिन दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में हमारी सामाजिक चेतना में हिंसा का तेज प्रसार हुआ है। समाज के जो तबके अपने आपको जितना ज्यादा वंचित महसूस करते हैं, वे उतनी ही तेजी से हिंसा के आकर्षण में खिंचे आते हैं। वे जितना इन विचारधाराओं के करीब पहुंचते हैं, उतने ही गांधी से दूर हो जाते हैं और वे जितने गांधी से दूर होते हैं, उतना ही लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। अंत में उनके मन में पनपी हिंसा उन्हीं पर लौट कर आती है। लेनिन से सशस्त्र क्रांति की प्रेरणा लेने वाले मुखर्जी की प्रतिमा पर हमला करते हैं और वीर सावरकर से वीरता सीखने वाले लेनिन की मूर्ति गिराते हैं। लेकिन की हर मूर्ति गिरने के साथ गांधी की विचारधारा तिल-तिल मरती जाती है। हर मूर्ति का गिरना असल में हमारे सामाजिक जीवन में गांधी की मूर्ति का ही गिरना है।


piyush baweleपीयुष बवेले। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। इंडिया टुडे में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी रह चुके हैं। संप्रति दैनिक भाष्कर में राजनीतिक संपादक की भूमिका निभा रहे हैं ।