उर्मिलेश जी के फेसबुक वॉल से साभार

अपने देश के उत्तर और मध्य क्षेत्र में पत्रकारिता, खासतौर पर न्यूज चैनलों का जो हाल है, उससे समाज का बड़ा हिस्सा बुरी तरह प्रभावित है । सही सूचना पाने के इच्छुक लोगों में इससे निराशा भी है । सच ये है कि आज हिन्दी न्यूज़ चैनलों और अखबारों के बड़े हिस्से की पत्रकारिता लोगों को सूचना-संपन्न और ज्ञानवान बनाने की बजाय समाज को अज्ञानता, असहिष्णुता और उद्दंडता के आनंदलोक की तरफ ढकेल रही है।  5 अगस्त को भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने अनुच्छेद 370 के तहत कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को खत्म करते हुए संविधान के उक्त अनुच्छेद को बेमतलब बनाने का जो ऐलान किया, वह न सिर्फ हमारे संवैधानिक मूल्यों अपितु एक आधुनिक भारतीय राष्ट्र निर्माण के इतिहास को भी खारिज़ करता है। 

हिन्दी टीवी पत्रकारिता के बड़े हिस्से की इन प्रवृत्तियों की हल्की सी झलक इधर हिन्दी के साहित्य जगत में भी दिख रही है। मुझे अचरज हो रहा है कि हिन्दी के कुछ प्रतिष्ठित साहित्यकार कल से ही भाजपा सरकार के कश्मीर-विषयक फैसले पर संतोष और खुशी जाहिर करती टिप्पणियां लिख रहे हैं और उन्हें पाठकों के एक हिस्से की सराहना भी मिल रही है। इनमें कुछ साहित्यकार प्रगतिशील रुझान के भी माने जाते हैं। कृपया मुझे ग़लत न समझा जाय। ऐसे साहित्यकार-मित्रों के कश्मीर विषयक सरकारी फैसले पर लिखने या बोलने के अधिकार को मैं चुनौती नहीं दे रहा हूं। उन्हें पूरा अधिकार है, वे सही या ग़लत, कुछ भी लिखें, लिखने पर भला क्या आपत्ति, पर चिंता की बात जरूर है। तरक्की-पसंद सोच के साहित्यकार भी अगर संवैधानिक मूल्यों और इतिहास को नज़रंदाज़ करते सरकारी फैसले के समर्थन में लिखना शुरू कर दें तो सचमुच यह चिंता की बात है। मैं सचमुच समझ नहीं पा रहा हूं कि ऐसे साहित्यकार मित्रों ने अपना यह विचार टीवी खबरों के आधार पर बनाया या सरकार में पदासीन कुछ नेताओं के बयानों के आधार पर बनाया? 

क्या इन साहित्यकार मित्रों ने कश्मीर के आधुनिक इतिहास, खासकर कश्मीर के भारत में सम्मिलन (इंस्ट्रूमेंट आप एक्सेसन), आर्टिकल 370 के संवैधानिक इतिहास और कश्मीर से जुड़े बाद के राजनीतिक-प्रशासनिक घटनाक्रमों को पढ़ने समझने के बाद अपना विचार और मिजाज़ बनाया है?  संवेदनशील और विचारवान भारतीय साहित्यकार के तौर पर क्या उन्होंने कभी कश्मीर घाटी जाकर वहां के हालात को अपनी आंखों से देखने-समझने की कोशिश की है? अगर की है तो क्या सूबे के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की पहल पर हुए ऐतिहासिक भूमि सुधार से समाज में आए बदलाव और सन् 1949 से 1989 के दौर के राजनीतिक-प्रशासनिक घटनाक्रमों का जायजा लिया? सन् 1987 के बाद आतंक और अलगाव की प्रवृत्तियों के पनपने और सन् 1990-91 के दरम्यान घाटी के चिनारों के दहकने की बड़ी वजह जानने की कोशिश की? कश्मीरी पंडितों के बहुचर्चित पलायन या विस्थापन के कारणों की दरयाफ़्त की? बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश या राजस्थान के दलितों या आदिवासियों के पलायन और विस्थापन पर आप जैसे विद्वान मित्रों ने अगर लिखा नहीं तो थोड़ा-बहुत पढ़ा जरुर होगा। आपने जमीन-जायदाद के मालिकाना हक के बारे में नगालैंड, अरुणाचल, मणिपुर, सिक्किम और हिमाचल सहित अनेक राज्यों की असलियत भी आपको मालूम होगी ही।

फाइल फोटो

आप में से कुछ मित्रों को 35A से परेशानी थी। क्या आप लोगों ने उस आर्टिकल को ठीक से पढ़ा? लिंगभेदी और बाहर से आकर बसे लोगों के बारे में उसके कुछ पूर्वाग्रही प्रावधानों से मेरी भी असहमति और विरोध रहा है, कुछ साल पहले इस पर मैंने The Wire YouTube पर एक ‘शो’ भी किया था, लेकिन कुछेक असंगतियों को सुधारने की बजाय यहां तो संविधान के एक अहम अनुच्छेद पर ही हमला हो गया। भारत का एक ऐसा प्रदेश जिसे संविधान से विशेष दर्जा मिला हुआ था, एक झटके में ही उसका प्रशासनिक वजूद खत्म कर दिया गया। भूगोल तक बदल दिया गया। अब वहां पुडुचेरी और राष्ट्रीय राजधानी की महानगरीय सरकार जैसी संरचना होगी। सबकुछ दिल्ली यानी केंद्र से तय होगा। 

आप सभी विद्वान और विचारवान मित्रों से अगर मैं एक अनुरोध करुंगा तो कृपया बुरा नहीं मानेंगे। कश्मीर के इतिहास के एक खास पहलू पर प्रख्यात कानूनविद और लेखक A G Noorani की मशहूर किताब Article 370: A constitutional history ofJammu Kashmir जरुर खरीदें और पढ़ने का कष्ट करें।बाकी कश्मीर के भ्रमण कार्यक्रम पर भी विचार करें। पर इसके लिए आपको फिलहाल हमारी सरकार के शौर्य-प्रदर्शन के स्थगन का इंतज़ार करना होगा।
नोट: अगर उक्त साहित्यकार मित्रों ने कश्मीर के आधुनिक इतिहास, संवैधानिक बहसों को पढ़ने-समझने और घाटी के हालात को देखने के बाद यह विचार बनाए हैं तो उनसे मुझे कुछ भी नहीं कहना। 
सादर!

उर्मिलेश/ वरिष्ठ पत्रकार और लेखक । पत्रकारिता में करीब तीन दशक से ज्यादा का अनुभव। ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘हिन्दुस्तान’ में लंबे समय तक जुड़े रहे। राज्यसभा टीवी के कार्यकारी संपादक रह चुके हैं। दिन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता करने में मशगुल।