पशुपति शर्मा

भावुक हो जाना भला भी है बुरा भी। भावुकता में संतुलन बिगड़ जाता है। भावनाओं पर संतुलन बना या बिगड़ा ये आप तय कीजिए। मैं तो शिक्षक दिवस पर शुरू की गई सीरीज का तीसरा हिस्सा आपसे साझा किए देता हूं।

गुरु बंसी कौल ने अपने गुरु से यूं जोड़ दिया नाता- 3

अज्ञेय ने नेमिचंद्र जैन को लिखी चिट्ठी में बयां किया है-‘सेंटिमेंटल होने से मत डरिए। बीसवीं सदी का एक रोग है सेंटिमेंट से डर।’ इस संदर्भ को हमने नाटक में इस्तेमाल किया है और अब जब मैं इस नाटक (साक्षात्कार अधूरा है) की रचना-प्रक्रिया पर बात कर रहा हूं तो यही डर सता ,Zmg रहा है कि कहीं भावुकता में एक संतुलन तो नहीं खो रहा। बहरहाल, बताता चलूं कि नटरंग के नेमिचंद्र जैन केंद्रित विशेषांक (74-76) ने मुझे नेमिजी की शख्सियत के अलग-अलग पहलुओं को समझने के सूत्र दिए। नेमिजी और मित्रों के बीच पत्राचार, डायरी के पन्नों से, अधूरे आत्म वृतांत और तमाम करीबियों के आलेख। कुछ खुद पढ़े और कुछ बंसी दा के निर्देश के मुताबिक खंगाले।

इस बीच फरीद भाई ने जब पूरे दृश्य ब्लॉक कर लिए तो संदेश आया कि अब एक बार भोपाल आकर देखा जाए कि नाटक ने क्या शक्ल ली है। दादा का मोबाइल पर आदेश-” आपने नाटक लिखा है, आपको देखना चाहिए कि वो कैसा बन रहा है। जाओ देखकर आओ और फिर बात करेंगे। ” दादा की माताजी की तबीयत खराब होने की वजह से वो खुद भोपाल जाकर ठहरने की हालत में नहीं थे। आदेश था तो मैंने भी भोपाल का प्लान बना लिया।यूं तो भोपाल में कई मित्र हैं, लेकिन मैंने सोचा कि इस बार ज्यादा से ज्यादा वक्त रंग-विदूषक के साथ ही दूं। फरीद भाई को फोन किया। सुबह सवेरे ट्रेन पहुंचने से पहले फरीद भाई स्टेशन पर हाजिर थे। उनके साथ घर गया। भाभी ने बेहद आत्मीय माहौल में चाय-ब्रेड खिलाई। फिर पराठे, पुलाव, बैंगनी और मेरी मनपसंद पीली दाल। बातचीत के दौरान बिटिया रानी का भी जिक्र आया। फरीद भाई और भाभी दोनों ही निदा-निदा का जिक्र करते हुए काफी प्रफुल्लित हो रहे थे। इसी बातचीत में पता चला कि निदा दादा की लाडली है और रंग-विदूषक की ‘खबरी’। जो बात फरीद भाई दादा से छिपा जाते, उसकी भी पोल खोल देती है निदा रानी।

21 जुलाई को दोपहर 3 बजे से रात 8.30 बजे तक नाटक की रिहर्सल चली। करीब दो दशक बाद मैं फिर से रंग-विदूषक की रिहर्सल में शरीक था। हर्ष, अमित जैसे कुछ पुराने चेहरे तो संजयजी और नीतिजी जैसे नए चेहरे। और इनके अलावा युवा रंगकर्मियों का पूरा समूह- बेहद उत्साहित। रिहर्सल देख कर लगा कि शुरुआती दृश्यों में जो टेम्पो बन रहा है, वो आखिरी दो दृश्यों में कहीं अटक सा जा रहा है। रिहर्सल में मेरे साथ दस्तक के पुराने साथी और पत्रकार सचिन श्रीवास्तव और पुष्पेंद्र रावत भी मौजूद थे। सचिन ने एक सवाल उठाया कि ‘कहीं अज्ञेय को हम विलेन की तरह तो नहीं पेश कर रहे।’ उसकी ये टिप्पणी बाद में कुछ सुधारों की वजह बनी और नेमि-अज्ञेय के रिश्तों को बयान करते वक्त मैंने सतर्कता बरती।

दो रिहर्सल के बीच चाय की चुस्कियों के साथ हमने कुछ संवादों को रेखांकित किया। ये संवाद बेवजह के विवाद का सबब बन सकते थे। व्यवस्था पर तंज, नेमिजी की निजी जिंदगी की कुछ शिकायतें और जिंदगी में आए तल्खी भरे मोड़, उनको बयां भी करना था और किसी अन्य शख्सियत की निजता की हदें भी नहीं लांघनी थीं। लगातार ये कोशिश रही कि बतौर निर्देशक फरीद भाई की संकल्पना में मेरी एंट्री सीमित ही रहे। कुछ संवादों और दृश्यों पर हमने अंतिम फ़ैसला बंसी दा के लिए ही छोड़ दिया।

रिहर्सल खत्म हुई और थोड़ा वक्त भोपाल के लिए बचा था। बंसी दा के साथ कवि और नाटककार राजेश जोशी का लंबा नाता रहा है। नेमिचंद्र जैन पर नाटक की शुरुआत से ही वो बराबर जिक्र करते रहे कि राजेश जोशीजी से भी बात कर लूं। मौका था तो फरीद भाई ने भी राजेश जोशी जी को फोन मिलाया और वक्त ले लिया। राजेशजी ने नेमिचंद्र जैन से जुड़ी कुछ यादें शेयर कीं। उन्होंने बताया कि कैसे एक नाट्य लेखन कार्यशाला के दौरान नेमिचंद्र जैन ने उनके लिए एक सख्त स्टैंड ले लिया था। कैसे भोपाल में एक कवि गोष्ठी के दौरान नेमिचंद्र जैन ने अध्यक्षता करते हुए बेवजह की टिप्पणी करने से एक वरिष्ठ कवि को रोक दिया था। इसके साथ ही उन्होंने सेंट्रल ट्रूप, रेखा जैन से जुड़े कुछ अन्य आत्मीय किस्से भी साझा किए।

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पशुपति शर्मा ।बिहार के पूर्णिया जिले के निवासी हैं। नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संचार की पढ़ाई। जेएनयू दिल्ली से हिंदी में एमए और एमफिल। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। उनसे 8826972867 पर संपर्क किया जा सकता है।