पुष्यमित्र

अभी जिस ट्रेन से देहरादून से लौट रहा था, वह ट्रेन हावड़ा तक जाती है। जाहिर सी बात है, ट्रेन में कई बंगाली यात्री भी थे। पेन्ट्री कार के एक वेटर ने उनसे चाय की कीमत अधिक मांग ली तो एक बंगाली सज्जन ने वेटर से बिल मांग लिया। फिर पेन्ट्री का हर स्टाफ चलायमान हो गया। एक बार बिल लाया गया, उसमें आईआरसीटीसी का जिक्र और ट्रेन का नाम नहीं था, सो महोदय ने बिल को नकली बता दिया। सुबह से शाम तक बिल प्रकरण चलता रहा। उन बंगाली महोदय की सक्रियता देख कर यूपी और बिहार के कई यात्री कुढ रहे थे, दो-चार रुपये के लिए क्या झिकझिक करना। मगर मुझे यह वाकया काफी प्रेरक लगा।

कोलकाता में कभी रहने का मौका नहीं मिला, मगर यह सुनता हूं कि अगर सरकार बस के किराये में एक रुपये की भी वृद्धि करती है तो लोग सवाल पूछने सड़कों पर उतर जाते हैं और सरकार को जवाब देना पड़ता है। यह नहीं कि दिल्ली के मेट्रो वाले जब तब किराया बढ़ाते चले जायें और कोई सवाल तक न करे। यूपी, बिहार और दिल्ली की जनता जो सोचती है दो-चार रुपये के लिए क्या झिकझिक करना, वे बंगाल के लोगों की राजनीतिक सक्रियता और जेएनयू के छात्रों के आन्दोलन को नहीं समझ सकती। क्योंकि सवाल सिर्फ दो-चार या सौ-दो सौ रुपयों का नहीं, एक जनकल्याणकारी सरकार को कारोबारी कार्पोरेट में बदलने से रोकने का है। पिछ्ले दो-तीन दशकों से यह प्रक्रिया सायास चल रही है। चाहे सरकार इसकी हो या उसकी, वह जनता से हर सुविधा के बदले उसी तरह कीमत वसूलना चाहती है, जैसे प्राइवेट कम्पनियां वसूल रही है। अगर सरकार को भी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में ही बदलना है तो आखिर हमलोग उसे टैक्स ही क्यों देते हैं।

दुनिया की तमाम बेहतरीन सरकार अपने नागरिकों को लगभग मुफ्त में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और परिवहन की सुविधा उपलब्ध कराती है। क्योंकि इन सुविधाओं से अवसर की समानता का सिद्धांत बरकरार रहता है। मगर हमारे देश में सरकार उल्टी दिशा में चल रही है। एक तो वह सरकारी स्कूलों, अस्पतालों और परिवहन व्यवस्थाओं को नष्ट कर इस क्षेत्र में निजी कारोबरियों को पनपने का मौका दे रही है। दूसरी तरफ जो सरकारी संस्थान सरकारी उपेक्षा के बावजूद अपनी साख बचाए हुए हैं, उनकी सुविधाओं को लगातार महंगा करती जा रही है। IIT और IIM की फीस का आपको पता चल ही गया होगा, रेल का किराया लगातार बढ़ाया जा रहा है। उसके निजीकरण की तैयारी अलग से चल रही है। आयुष्मान योजना का एक मकसद यह भी है कि देश की गरीब आबादी इन्स्योरेंश के पैसों से सरकारी अस्पतालों को छोड़कर निजी अस्पतालों की तरफ शिफ्ट हो जाये। सरकारी संस्थाओं को बेचने की कवायद के बारे में हम लगातार सुन ही रहे हैं।

दिलचस्प है कि यह सब किसी एक सरकार में नहीं हो रहा, बल्कि यह उदारीकरण की निरंतर प्रक्रिया का हिस्सा है। आम लोगों की सब्सिडी खत्म करना, सरकारी प्रबंध से चलने वाली कारोबारी संस्थाओं का निजीकरण और श्रम कानूनों में अधिक से अधिक पूंजीपतियों के हित के हिसाब से बदलाव करना। पूरी कार्पोरेट लॉबी इसे लागू कराने के लिए दो दशक से सक्रिय है। मनमोहन सिंह इस लक्ष्य को चाह कर भी अन्जाम नहीं दे पा रहे थे, क्योंकि कांग्रेस के अन्दर और सरकार के बाहर ऐसे तत्वों की संख्या ठीक-ठाक थी जो इस विचार को कार्यान्वित होने से रोकती थी, इसलिये उनकी विदाई हो गयी। मोदी जी ने इसे कार्यरूप देने का फार्मूला ढ़ूंढ़ लिया है। उन्होंने अपने कोर वोटरों को हिन्दुत्व और नकली राष्ट्रवाद का झुनझुना पकड़ा दिया है और आर्थिक मुद्दे पर जो उनका विरोध कर सकते हैं उन्हें राष्ट्रविरोधी और गद्दार साबित कर दिया है। अब सारे बदलाव बड़ी आसानी से हो रहे हैं। हालांकि इसके बावजूद अर्थव्यवस्था उठ ही नहीं पा रही, यह अलग विषय है।

इसलिये, मेरे लिए जेएनयू के छात्रों का यह विरोध महज फीस बढ़ोतरी के विरोध का आन्दोलन नहीं है। यह मौजूदा सरकार की उन प्रवृत्तियों का विरोध है, जिसके तहत सरकार खुद को एक कार्पोरेट कारोबारी में बदलने की कोशिश में जुटी है। सरकार जिस राह पर चल रही है उससे अन्ततः गरीबों को और गरीब होना है और अवसर की समानता के सिद्धांत की बलि चढ़ जाना है। अगर सरकार अपने इस एजेंडे को लागू करने में कामयाब रही तो फिर हमेशा राजा का बेटा ही राजा बनेगा। इसलिये इस प्रक्रिया का कदम-कदम पर विरोध करना होगा।

मैं तो इसी वजह से जेएनयू के साथ हूं। आपको भी होना चाहिये।

पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। प्रभात खबर की संपादकीय टीम से इस्तीफा देकर इन दिनों बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता  करने में मशगुल